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Budget 2026 Expectations: बड़े टैक्स कट या स्मार्ट स्लैब, मिडिल क्लास के लिए क्या है बेहतर


जब भी बजट आता है, तो सबसे बड़ी मांग 'टैक्स रेट में कटौती' की होती है। हर कोई चाहता है कि टैक्स की दरें कम हों। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार केवल दरों में कटौती काफी नहीं होगी। असली समाधान 'स्मार्ट टैक्स स्लैब' में छिपा है।
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ब्रैकेट क्रीप: आपकी जेब पर अदृश्य मार

सबसे पहले हमें एक आर्थिक अवधारणा को समझना होगा जिसे 'ब्रैकेट क्रीप' (Bracket Creep) कहते हैं। मान लीजिए आपकी सैलरी हर साल थोड़ी बढ़ती है। यह बढ़ोतरी अक्सर महंगाई की भरपाई के लिए होती है। लेकिन हमारी टैक्स व्यवस्था में स्लैब (Tax Slabs) कई सालों तक स्थिर रहते हैं।

नतीजा यह होता है कि आपकी आय तो कागजों पर बढ़ जाती है, जिससे आप ऊंचे टैक्स स्लैब में आ जाते हैं और आपको ज्यादा टैक्स देना पड़ता है। लेकिन असल में, महंगाई के कारण आपकी खरीदने की शक्ति (Purchasing Power) नहीं बढ़ी होती। यानी, बिना किसी आधिकारिक टैक्स बढ़ोतरी के भी, सरकार आपकी जेब से ज्यादा पैसा ले लेती है। इसे ही 'ब्रैकेट क्रीप' कहते हैं जो चुपचाप मिडिल क्लास की खर्च करने की क्षमता को कम कर देता है।


मिडिल क्लास का दर्द और अर्थव्यवस्था की जरूरत

भारत में लगभग 5.5 लाख से 20 लाख रुपये सालाना कमाने वाला वर्ग मिडिल क्लास की रीढ़ है। यही वह वर्ग है जो सबसे ज्यादा टैक्स फाइल करता है और यही वह वर्ग है जो सबसे ज्यादा खपत भी करता है।

यह वर्ग ईएमआई (EMI), घर का किराया, बच्चों की स्कूल फीस, मेडिकल खर्च और बढ़ते इंश्योरेंस प्रीमियम के बोझ तले दबा हुआ है। अर्थशास्त्र के नियम कहते हैं कि अगर इस वर्ग के हाथ में थोड़ा भी अतिरिक्त पैसा आए, तो वे उसे बचाने के बजाय खर्च करना पसंद करेंगे। और जब वे खर्च करेंगे, तो बाजार में मांग बढ़ेगी, कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा और अंततः अर्थव्यवस्था को फायदा होगा।


इसलिए, अगर सरकार टैक्स स्लैब को थोड़ा तर्कसंगत बनाती है, तो इसका सीधा असर बाजार में मांग बढ़ने के रूप में दिखेगा।

बड़े टैक्स कट क्यों नहीं?

अब सवाल उठता है कि सरकार सीधे टैक्स की दरें (Rates) कम क्यों नहीं कर देती? इसका कारण है 'वित्तीय घाटा' (Fiscal Deficit)। सरकार ने 2025-26 के बजट में वित्तीय घाटे को जीडीपी के 4.4% तक लाने का लक्ष्य रखा है। यह एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है जो दुनिया भर के निवेशकों को यह भरोसा दिलाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था अनुशासित है।

अगर सरकार बड़े पैमाने पर टैक्स दरों में कटौती करती है, तो सरकारी खजाने में राजस्व की कमी हो जाएगी, जिससे वित्तीय घाटा बढ़ सकता है और देश की साख प्रभावित हो सकती है। इसलिए, 'बड़े कट' के बजाय 'स्मार्ट स्लैब' एक बीच का रास्ता है।

क्या हो सकता है समाधान?

विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को अब तदर्थ राहत (Ad-hoc relief) के बजाय नियम-आधारित बदलावों की ओर बढ़ना चाहिए।


  1. महंगाई से जुड़े स्लैब: अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में टैक्स स्लैब महंगाई दर से जुड़े होते हैं। जैसे-जैसे महंगाई बढ़ती है, टैक्स छूट की सीमा भी अपने आप बढ़ जाती है। भारत में भी हर 2 या 3 साल में स्लैब की समीक्षा की जा सकती है।



  • मध्यम स्लैब का विस्तार: अचानक से 5% से सीधे 20% या 30% के स्लैब में कूदने के बजाय, बीच के स्लैब को चौड़ा किया जा सकता है। इससे आय बढ़ने पर टैक्स का बोझ अचानक नहीं बढ़ेगा।

  • बजट 2026 भारत के लिए अपनी खपत आधारित विकास कहानी को फिर से पटरी पर लाने का एक सुनहरा अवसर है। पिछले कुछ वर्षों में सरकारी खर्च ने अर्थव्यवस्था को संभाला है, लेकिन अब निजी खपत को आगे आना होगा। इसके लिए जरूरी है कि करदाताओं, विशेषकर मध्यम आय वर्ग को, केवल चुनावी वादों वाली राहत न मिले, बल्कि एक ऐसा पारदर्शी और तार्किक टैक्स ढांचा मिले जो उनकी वास्तविक आय और महंगाई को ध्यान में रखता हो। समझदारी भरे टैक्स स्लैब न केवल लोगों की जेब में पैसा डालेंगे, बल्कि देश की आर्थिक नींव को भी मजबूत करेंगे।