ELSS बनाम टैक्स-सेविंग FD: टैक्स बचाने और ज्यादा रिटर्न के लिए कौन सा विकल्प है सबसे बेहतर?
आज के समय में हर कोई ऐसे निवेश विकल्प की तलाश में रहता है, जहां सुरक्षा के साथ-साथ शानदार रिटर्न मिले और टैक्स भी बच सके। हमारे देश के आयकर नियमों के तहत कई ऐसे ऑप्शन हैं जो टैक्स छूट का फायदा देते हैं। इनमें टैक्स-सेविंग फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (ELSS) सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले विकल्प हैं। दोनों में ही पैसे लगाकर आप टैक्स बचा सकते हैं, लेकिन दोनों के नियम, लॉक-इन पीरियड और रिटर्न में बड़ा अंतर है। आइए इन्हें आसान भाषा में समझते हैं।
टैक्स छूट के नियम: दोनों में क्या है अंतर?
Income Tax Act के सेक्शन 80C के तहत टैक्स-सेविंग एफडी और ELSS दोनों में ही हर साल 1.5 लाख रुपये तक के निवेश पर टैक्स छूट मिलती है। लेकिन इन पर मिलने वाले मुनाफे (रिटर्न) पर टैक्स के नियम अलग-अलग हैं:
अगर आप जरूरत पड़ने पर जल्दी पैसे निकालना चाहते हैं, तो दोनों के लॉक-इन पीरियड को समझना बहुत जरूरी है:
आपके गोल और रिस्क लेने की क्षमता क्या है?
इन दोनों में से सही विकल्प चुनना आपकी जरूरतों और आपके रिस्क लेने की क्षमता पर निर्भर करता है:
निवेश का एक सीधा नियम है कि सारा पैसा एक ही जगह नहीं लगाना चाहिए। फैसला लेने से पहले देखें कि आपका मौजूदा पैसा कहां लगा है:
ELSS एक इक्विटी आधारित स्कीम है, जिसका सीधा मतलब है कि इस पर मिलने वाला रिटर्न शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करता है। दूसरी तरफ, एफडी में रिस्क बहुत कम होता है और रिटर्न तय रहता है। हालांकि, लंबी अवधि में एफडी का रिटर्न आमतौर पर ELSS के मुकाबले कम ही रहता है।
इसलिए निवेश करने से पहले अपने लक्ष्यों और रिस्क लेने की क्षमता को अच्छी तरह परख लें। अगर मन में कोई उलझन हो, तो किसी भरोसेमंद फाइनेंशियल एडवाइजर की सलाह लेने में हिचकिचाएं नहीं।
डिस्क्लेमर : यह जानकारी केवल शिक्षा और जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है। इसे किसी भी तरह की निवेश सलाह या वित्तीय सिफारिश न समझें। शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में निवेश बाजार के जोखिमों के अधीन है। किसी भी योजना में पैसा लगाने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य करें।
टैक्स छूट के नियम: दोनों में क्या है अंतर?
Income Tax Act के सेक्शन 80C के तहत टैक्स-सेविंग एफडी और ELSS दोनों में ही हर साल 1.5 लाख रुपये तक के निवेश पर टैक्स छूट मिलती है। लेकिन इन पर मिलने वाले मुनाफे (रिटर्न) पर टैक्स के नियम अलग-अलग हैं:
- टैक्स-सेविंग एफडी: एफडी से मिलने वाला ब्याज आपकी सालाना इनकम में जुड़ता है और आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से उस पर टैक्स लगता है। हालांकि, सामान्य नागरिकों के लिए 10,000 रुपये तक और वरिष्ठ नागरिकों के लिए 40,000 रुपये तक के सालाना ब्याज पर टैक्स में छूट का नियम है।
- ELSS (म्यूचुअल फंड): ELSS में निवेश करने पर 1 लाख रुपये तक का कैपिटल गेन (मुनाफा) पूरी तरह से टैक्स फ्री होता है। 1 लाख रुपये से ज्यादा के मुनाफे पर केवल 10% की दर से लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स लगता है। इस लिहाज से कई लोग ELSS को ज्यादा फायदेमंद मानते हैं।
अगर आप जरूरत पड़ने पर जल्दी पैसे निकालना चाहते हैं, तो दोनों के लॉक-इन पीरियड को समझना बहुत जरूरी है:
- टैक्स-सेविंग एफडी: इसमें 5 साल का जरूरी लॉक-इन पीरियड होता है। यानी 5 साल से पहले आप अपना पैसा किसी भी हाल में नहीं निकाल सकते।
- ELSS: सेक्शन 80C के तहत आने वाले सभी विकल्पों में ELSS का लॉक-इन पीरियड सबसे कम यानी सिर्फ 3 साल का होता है।
आपके गोल और रिस्क लेने की क्षमता क्या है?
इन दोनों में से सही विकल्प चुनना आपकी जरूरतों और आपके रिस्क लेने की क्षमता पर निर्भर करता है:
- कम रिस्क और तय रिटर्न (FD): अगर आप बिल्कुल भी रिस्क नहीं लेना चाहते और एक तय समय पर निश्चित रकम पाना चाहते हैं, तो बैंक या पोस्ट ऑफिस की टैक्स-सेविंग एफडी आपके लिए सही है।
- ज्यादा रिस्क और ज्यादा रिटर्न (ELSS): अगर आप थोड़ा रिस्क उठा सकते हैं और लंबी अवधि में महंगाई को मात देने वाला बड़ा फंड बनाना चाहते हैं, तो ELSS आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है।
निवेश का एक सीधा नियम है कि सारा पैसा एक ही जगह नहीं लगाना चाहिए। फैसला लेने से पहले देखें कि आपका मौजूदा पैसा कहां लगा है:
- अगर आपका ज्यादातर पैसा पहले से ही बैंक एफडी में जमा है, तो आपको ELSS में निवेश करने के बारे में सोचना चाहिए।
- इसके उलट, अगर आप पहले से ही शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में काफी पैसा लगा चुके हैं, तो अपने पोर्टफोलियो को बैलेंस करने के लिए एफडी में पैसा लगाना एक सुरक्षित कदम होगा।
ELSS एक इक्विटी आधारित स्कीम है, जिसका सीधा मतलब है कि इस पर मिलने वाला रिटर्न शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करता है। दूसरी तरफ, एफडी में रिस्क बहुत कम होता है और रिटर्न तय रहता है। हालांकि, लंबी अवधि में एफडी का रिटर्न आमतौर पर ELSS के मुकाबले कम ही रहता है।
इसलिए निवेश करने से पहले अपने लक्ष्यों और रिस्क लेने की क्षमता को अच्छी तरह परख लें। अगर मन में कोई उलझन हो, तो किसी भरोसेमंद फाइनेंशियल एडवाइजर की सलाह लेने में हिचकिचाएं नहीं।
डिस्क्लेमर : यह जानकारी केवल शिक्षा और जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है। इसे किसी भी तरह की निवेश सलाह या वित्तीय सिफारिश न समझें। शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में निवेश बाजार के जोखिमों के अधीन है। किसी भी योजना में पैसा लगाने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य करें।
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