कोर्ट में AI लागू करने से पहले संसद बनाए कानून : क्यों जरूरी है स्पष्ट कानूनी ढांचा

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विराग गुप्ता
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने लंदन में कहा है कि AI को सहयोगी की भूमिका निभानी चाहिए। कुछ दिनों पहले AI कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार सभी अदालतों में AI के इस्तेमाल के लिए ड्राफ्ट नियम जारी किए गए हैं। इस मसौदे पर 20 जून तक लोग राय दे सकते हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने भी AI की मदद से मुकदमों के बोझ से मुक्ति और जल्द न्याय की बात कही है। अदालतों में AI के इस्तेमाल से जुड़े 6 अहम पहलुओं को समझना जरूरी है।
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संवैधानिक संकट का अंदेशा
अनुच्छेद 145 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के लिए 2013 में नियम बने थे। इसी तरह राज्यों की हाई कोर्टों में अनुच्छेद 225 और 227 के अनुसार नियम बनाए गए हैं। लेकिन AI के मसौदे में यह नहीं लिखा कि कानून की किस प्राधिकृत व्यवस्था (Authority) के अनुसार इन्हें देश की सभी अदालतों में लागू किया जाएगा? गौरतलब है कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) के गठन से प्रशासनिक कुशलता बढ़ने के साथ न्यायिक सुधार हो सकता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट न्यायिक आदेश जारी नहीं कर रहा क्योंकि हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के अधीन नहीं माने जाते। सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक आदेश से हाई कोर्टों और जिला अदालतों में AI लागू करने से संवैधानिक संकट की स्थिति बन सकती है।

जिला अदालतों में इंफ्रास्ट्रक्चर
20 हजार से ज्यादा जिला अदालतों में 4.92 करोड़ मुकदमे लंबित हैं। जिला अदालतों को राज्य सरकारों से फंड और इंफ्रास्ट्रक्चर मिलता है। संविधान के अनुसार इन पर संबंधित हाई कोर्ट का प्रशासनिक नियंत्रण रहता है। हाई कोर्टों को सुप्रीम कोर्ट के अधीन नहीं माना जाता है। जिला अदालतों में पीने का पानी, शौचालय और बैठने की बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। फिर AI के लिए रातों-रात जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर कैसे विकसित होगा?

डेटा सुरक्षा कानून
अनेक जज AI के दुरुपयोग से बढ़ रही अराजकता के खिलाफ चिंता जता चुके हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने सभी जिला अदालतों को आदेश दिया है कि ChatGPT, Gemini और Meta जैसे AI प्लेटफॉर्म का कानूनी रिसर्च और न्यायिक फैसलों में इस्तेमाल नहीं हो सकता। भारत में अभी तक डेटा सुरक्षा से जुड़ा DPDP Act, 2023 कानून और उसके नियम लागू नहीं हैं। लंबित और पुराने मामलों में करोड़ों लोगों के संवेदनशील न्यायिक और Sensitive Personal Data का AI के माध्यम से व्यावसायिक इस्तेमाल असंवैधानिक होगा। इसके लिए वादकारियों और वकीलों की स्पष्ट सहमति जरूरी है।

डेटा का व्यावसायिक इस्तेमाल
कोरोना के दौरान अदालतों में आनन-फानन में ऑनलाइन सुनवाई और मुकदमों का सीधा प्रसारण शुरू हो गया। लेकिन 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के फैसले के अनुसार अभी तक नियमों में जरूरी बदलाव नहीं हुए। न्यायिक सुनवाई के डेटा के व्यावसायिक इस्तेमाल को रोकने के लिए स्पष्ट नियमों के अभाव में न्यायिक प्रशासन पर हमले बढ़ रहे हैं। अदालतों में WhatsApp, Zoom और YouTube जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म के असुरक्षित इस्तेमाल के खिलाफ संघ विचारक के. एन. गोविंदाचार्य ने याचिका दायर की थी। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि दो साल के भीतर स्वदेशी टेक प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल होगा, लेकिन उस पर अभी तक अमल नहीं हुआ।

डेटा सुरक्षा के लिए एक्ट बने
AI के सभी बड़े प्लेटफॉर्म विदेशी हैं। भारत की बैंकिंग प्रणाली को माइथॉस जैसे AI की सुनामी से बचाने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और रिजर्व बैंक के गवर्नर चिंतित हैं। AI के दुरुपयोग को रोकने के लिए IT Act, 2000 में भी स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। मसौदे में डेटा की सुरक्षा और शिकायत निवारण के जरूरी प्रावधान नहीं होने से जिला अदालतों में वकील और जजों की उलझनें बढ़ सकती हैं।

संसद में कानून बने
प्रधानमंत्री मोदी ने तकनीक और AI के इस्तेमाल से गरीब कैदियों की रिहाई और मुकदमों के बोझ से मुक्ति का आह्वान किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मसौदे में AI के माध्यम से न्यायिक सुधार, छोटे मुकदमों के जल्द निस्तारण और आम जनता को जल्द न्याय देने का रोडमैप नहीं है। Bar Council के अनुसार AI को कानूनी मान्यता नहीं है। इसलिए Advocates Act के तहत AI से बनाई गई किसी भी गलत सामग्री के लिए वकील ही जिम्मेदार होंगे। जनता, सरकार, न्यायिक प्रशासन, वकील और जज—इन पांचों स्तंभों के साथ परामर्श के बाद संसद से कानून बने और सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्टों के नियमों में बदलाव हो।

वैसे आपको क्या लगता है, क्या संसद से कानून, डेटा सुरक्षा, जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और जजों की ट्रेनिंग सुनिश्चित करने के बाद अदालतों में AI का इस्तेमाल होना चाहिए?

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं और डिजिटल कानून, साइबर नीति तथा डेटा सुरक्षा से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं। वे "डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत" के लेखक हैं और तकनीक तथा कानून के अंतर्संबंधों पर नियमित रूप से लेखन करते हैं।

अस्वीकरण : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इनका उद्देश्य सार्वजनिक विमर्श को समृद्ध करना है। प्रकाशित विचार आवश्यक नहीं कि द इकनॉमिक टाइम्स हिंदी या उसके संपादकीय दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हों।