10 मिनट डिलीवरी का सच आया सामने: तेज नहीं, भरोसेमंद डिलीवरी चाहते हैं भारतीय ग्राहक

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भारत में 10 मिनट और 20 मिनट डिलीवरी का ट्रेंड पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। क्विक कॉमर्स कंपनियों ने ग्राहकों को फास्ट डिलीवरी का सपना दिखाकर अरबों रुपये का निवेश आकर्षित किया। लेकिन अब एक नई रिपोर्ट ने इस पूरे मॉडल पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। लॉजिस्टिक्स SaaS कंपनी Fareye की रिपोर्ट कहती है कि ग्राहक सिर्फ सबसे तेज डिलीवरी नहीं चाहते, बल्कि उन्हें सबसे ज्यादा भरोसेमंद डिलीवरी चाहिए। यानी ग्राहक यह जानना चाहते हैं कि उनका सामान कब पहुंचेगा और क्या वह तय समय पर पहुंचेगा या नहीं। यही वजह है कि अब लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री में “स्पीड” से ज्यादा “रिलायबिलिटी” की चर्चा शुरू हो गई है।
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डिलीवरी लागत में बड़ा उछालFareye की रिपोर्ट के मुताबिक मार्च से मई के बीच एशिया-पैसिफिक क्षेत्र, जिसमें भारत भी शामिल है, वहां डिलीवरी लागत में सालाना आधार पर करीब 18.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बाद ईंधन सप्लाई और कीमतों पर दबाव बढ़ा, जिसका सीधा असर लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर पड़ा।

भारत में पहले से ही फ्यूल कॉस्ट, ड्राइवर वेतन और ट्रैफिक जाम जैसी समस्याएं डिलीवरी कंपनियों की लागत बढ़ाती रही हैं। लेकिन रिपोर्ट में सबसे बड़ी चिंता यह बताई गई कि कंपनियों को यह तो पता है कि खर्च कहां हो रहा है, लेकिन यह साफ नहीं है कि असल में लागत पैदा कहां से हो रही है।

पहली बार डिलीवरी फेल होना बना बड़ी समस्यारिपोर्ट में भारत की शहरी डिलीवरी व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी भी सामने आई। घनी आबादी वाले शहरों में पहली बार डिलीवरी फेल होने की दर 20 फीसदी से 30 फीसदी तक पहुंच जाती है। यानी हर 10 में से 2 या 3 ऑर्डर पहली कोशिश में ग्राहक तक नहीं पहुंच पाते।

यह समस्या कंपनियों के लिए बड़ा नुकसान बन रही है क्योंकि हर दोबारा डिलीवरी में ईंधन, समय और कर्मचारियों की लागत बढ़ जाती है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यही कारण है कि कई क्विक कॉमर्स कंपनियां तेज ग्रोथ के बावजूद मुनाफे के लिए संघर्ष कर रही हैं।

ग्राहक फास्ट नहीं, भरोसेमंद डिलीवरी चाहते हैंरिपोर्ट का सबसे दिलचस्प हिस्सा ग्राहकों की पसंद से जुड़ा है। सर्वे में 41 फीसदी ग्राहकों ने कहा कि उन्हें तय समय वाली भरोसेमंद डिलीवरी ज्यादा पसंद है, जबकि केवल 22 फीसदी ग्राहकों ने सबसे तेज डिलीवरी को प्राथमिकता दी।

इसका मतलब साफ है कि ग्राहक अब सिर्फ “10 मिनट डिलीवरी” के विज्ञापन से प्रभावित नहीं हो रहे। वे चाहते हैं कि कंपनी जो समय बताए, उसी समय सामान पहुंचे। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्पीड इंफ्रास्ट्रक्चर पर जो भारी निवेश हो रहा है, उसका कुछ हिस्सा शायद गलत दिशा में जा रहा है। असली प्रीमियम प्रोडक्ट अब “भरोसा” बनता जा रहा है, न कि सिर्फ “रफ्तार”।

ग्राहक बेहतर डिलीवरी के लिए ज्यादा पैसे देने को तैयाररिपोर्ट में यह भी सामने आया कि भारतीय ग्राहक कुछ खास परिस्थितियों में अतिरिक्त डिलीवरी शुल्क देने को तैयार हैं। करीब 60 फीसदी ग्राहकों ने कहा कि वे जरूरी दवाइयों, ग्रॉसरी, तय समय वाली डिलीवरी, महंगे सामान या भारी प्रोडक्ट्स की डिलीवरी के लिए ज्यादा भुगतान कर सकते हैं।

वहीं भारत की 70 फीसदी कंपनियों का मानना है कि ग्राहक बेहतर और भरोसेमंद डिलीवरी के लिए प्रीमियम देने को तैयार हैं। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में लॉजिस्टिक्स कंपनियां सिर्फ सस्ती और तेज डिलीवरी पर नहीं, बल्कि बेहतर ग्राहक अनुभव पर भी फोकस बढ़ा सकती हैं।

500 से ज्यादा लॉजिस्टिक कंपनियों पर आधारित है रिपोर्टफेयरआई की यह रिपोर्ट 500 से ज्यादा लॉजिस्टिक कंपनियों के सर्वे पर आधारित है। इनमें करीब 14 फीसदी कंपनियां भारत से थीं। रिपोर्ट से साफ संकेत मिल रहे हैं कि भारत का क्विक कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स सेक्टर अब नए बदलाव के दौर में प्रवेश कर सकता है, जहां “सबसे तेज” की जगह “सबसे भरोसेमंद” डिलीवरी जीत का नया फॉर्मूला बन सकती है।

(अस्वीकरण: विशेषज्ञों द्वारा दी गई सिफारिशें, सुझाव, विचार और राय उनके अपने हैं। ये इकोनॉमिक टाइम्स हिन्दी के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।)