Crude Oil 40% सस्ता हुआ, फिर भी भारत में पेट्रोल-डीजल क्यों नहीं हुए सस्ते? वजह जानकर चौंक जाएंगे
17 जून 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने के लिए ऐतिहासिक 14-सेशल समझौता ज्ञापन (MoU) पर सिग्नेचर किया। इसके बाद अमेरिका में रिटेल पेट्रोल प्राइस की कीमतें तुरंत घटकर 3.9 डॉलर प्रति गैलन हो गई। यह साल के उच्चतम स्तर 4.56 डॉलर प्रति गैलन से काफ कम थीं। वहीं, मिडिल ईस्ट संकट के बाद ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतें अपने उच्चतम स्तर 126 डॉलर प्रति बैरल से लगभग 40% गिरकर 76 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई। इससे अमेरिका उपभोक्ताओं को पेट्रोल पंप पर तत्काल राहत मिली। लेकिन, जहां सबको राहत मिली वहीं भारतीय उपभोक्ताओं के लिए कोई राहत नहीं है।

अधिकारिक तौर पर भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें सालों पहले विनियमन-मुक्त (डीरेगुलेट) कर दी गई। यानी, ये बाजार की परिस्थितियों के अनुसार ऊपर-नीचे होनी चाहिए। लेकिन असलियत में भारतीय उपभोक्ता के लिए कुछ और ही है। भारत में ईंधन की कीमतों में कटौती बहुत कम होती है। वैश्विक कीमतों में आई गिरावट की तुलना में यह कटौती मामूली होती है।
अगर हिस्ट्री देखें तो ब्रेंट क्रूड की कीमतों में भारी गिरावट के साथ अक्सर पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़ा दिया जाता है। इससे केंद्र और राज्य सरकारें फायदा उठा लेती है। केंद्र सरकार की प्रोडक्ट शुल्क (Excise Duty) पूरे देश में समान होता है। जबकि, राज्य सरकारें अलग-अलग वैल्यू एडिड टैक्स (VAT) लगाती है।
पेट्रोल-डीजल की रिटेल कीमतों में टैक्स की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा होने के कारण भारत में ईंधन की कीमतें शायद ही कभी बड़े स्तर पर घटती है। मौजूदा दौर में सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि ग्लोबल कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर तुरंत उपभोक्ता तक न पहुंचे। इससे कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव और अचानक बढ़ोतरी को रोकने में मदद मिली है। लेकिन, रिटेल फ्यूल वैल्यू की हिस्ट्री बताती है कि भारतीय उपभोक्ता एक तरह की हार-हार स्थिति में है। उन्हें साल 2010 में पेट्रोल और 2014 में डीजल पर लागू हुए डीरेगुलेशन सुधारों का फायदा नहीं मिला है।
उदाहरण के लिए जनवरी-अप्रैल 2020 के दौरान कोविड-19 महामारी की शुरुआत में ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतें लगभग 70% गिर गई। इसके बावजूद मई 2020 में केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर 10 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 13 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दिया। बाद में सरकार ने इसे घटाया था। यह कटौती तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के नुकसान की भरपाई के लिए किया गया।
27 मार्च 2026 को जब इंटरनेशनल क्रूड ऑयल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के जवाब में केंद्र सरकार ने पेट्रल और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर का एक्साइज ड्यूटी घटाया तो इसने एक बात साफ कर दी कि यह एक्साइड ड्यूटी की कटौती पेट्रोल पंप पर कीमतों को कम करने के लिए नहीं है। सरकार का उद्देश्य तेल कंपनियों द्वारा की जा रही अंडर-रिकवरी को कम करना है।
वर्तमान में इंटरनेशनल क्रूड ऑयल की कीमतों पर पेट्रोल पर लगभग 26 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 81.90 रुपये प्रति लीटर की अंडर-रिकवरी हो रही है। ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत अप्रैल 2026 में 12.04 डॉलर प्रति बैरल थी। यह मई में घटकर 108.3 डॉलर प्रति बैरल रह गई। जून में यह 80 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि कीमतें 80 डॉलर से भी नीचे जा सकती है। इसके बावजूद ईंधन की कीमतें ऊंची बनी रह सकती है। साथ ही, इससे उपभोक्ताओं तक राहत पहुंचाने की संभावना भी कम है।
भारतीय उपभोक्ताओं के लिए स्थिति यह है कि जब कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो पेट्रोल-डीजल महंगे हो जाते हैं। लेकिन, जब क्रूड ऑयल की कीमत गिरती है तो उसका फायदा शायद ही कभी मिलता है।
संसद में प्रस्तुत आंकड़ो के अनुसार साल 2014-15 से अब तक केंद्र सरकार पेट्रोल-डीजल पर लग रहे एक्साइड ड्यूटी के जरिये 40 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा जुटा चुकी है। इससे ईंधन सरकार के लिए सबसे भरोसेमंद रेवेन्यू सोर्स में से एक बन गया।
कोविड-19 के दौर जब इंटरनेशनल कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 70 फीसदी की गिरावट आई, तह रिटेल कीमत भी उसी रेश्यो से कम नहीं हुआ। इस समय सरकार ने कीमतों में कटौती करने की जगह एक्साइड ड्यूटी बढ़ा दी। सालों तक देखा गया है कि जब भी इंटरनेशनल तेल कीमतें कम होती है तो फ्यूल पर लगने वाला टैक्स सरकार के लिए एक वित्तीय सुरक्षा कवच का काम करते हैं।
यही कारण है कि कई आलोचक कहते हैं कि डीरेगुलेशन केवल कागजों पर मौजूद हैं। सुधार का मूल उद्देश्य यह था कि जब कच्चे तेल की कीमत बढ़े तो उपभोक्ता ज्यादा भुगतान करें। वहीं, जब कीमतों में कटौती हो तो उपभोक्ता को उससे फायदा हो। लेकिन, वास्तव में उपभोक्ता को इस समझौता का केवल एक ही पक्ष का अनुभव हुआ।
अधिकारिक तौर पर भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें सालों पहले विनियमन-मुक्त (डीरेगुलेट) कर दी गई। यानी, ये बाजार की परिस्थितियों के अनुसार ऊपर-नीचे होनी चाहिए। लेकिन असलियत में भारतीय उपभोक्ता के लिए कुछ और ही है। भारत में ईंधन की कीमतों में कटौती बहुत कम होती है। वैश्विक कीमतों में आई गिरावट की तुलना में यह कटौती मामूली होती है।
अगर हिस्ट्री देखें तो ब्रेंट क्रूड की कीमतों में भारी गिरावट के साथ अक्सर पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़ा दिया जाता है। इससे केंद्र और राज्य सरकारें फायदा उठा लेती है। केंद्र सरकार की प्रोडक्ट शुल्क (Excise Duty) पूरे देश में समान होता है। जबकि, राज्य सरकारें अलग-अलग वैल्यू एडिड टैक्स (VAT) लगाती है।
पेट्रोल-डीजल की रिटेल कीमतों में टैक्स की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा होने के कारण भारत में ईंधन की कीमतें शायद ही कभी बड़े स्तर पर घटती है। मौजूदा दौर में सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि ग्लोबल कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर तुरंत उपभोक्ता तक न पहुंचे। इससे कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव और अचानक बढ़ोतरी को रोकने में मदद मिली है। लेकिन, रिटेल फ्यूल वैल्यू की हिस्ट्री बताती है कि भारतीय उपभोक्ता एक तरह की हार-हार स्थिति में है। उन्हें साल 2010 में पेट्रोल और 2014 में डीजल पर लागू हुए डीरेगुलेशन सुधारों का फायदा नहीं मिला है।
उदाहरण के लिए जनवरी-अप्रैल 2020 के दौरान कोविड-19 महामारी की शुरुआत में ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतें लगभग 70% गिर गई। इसके बावजूद मई 2020 में केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर 10 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 13 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दिया। बाद में सरकार ने इसे घटाया था। यह कटौती तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के नुकसान की भरपाई के लिए किया गया।
27 मार्च 2026 को जब इंटरनेशनल क्रूड ऑयल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के जवाब में केंद्र सरकार ने पेट्रल और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर का एक्साइज ड्यूटी घटाया तो इसने एक बात साफ कर दी कि यह एक्साइड ड्यूटी की कटौती पेट्रोल पंप पर कीमतों को कम करने के लिए नहीं है। सरकार का उद्देश्य तेल कंपनियों द्वारा की जा रही अंडर-रिकवरी को कम करना है।
वर्तमान में इंटरनेशनल क्रूड ऑयल की कीमतों पर पेट्रोल पर लगभग 26 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 81.90 रुपये प्रति लीटर की अंडर-रिकवरी हो रही है। ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत अप्रैल 2026 में 12.04 डॉलर प्रति बैरल थी। यह मई में घटकर 108.3 डॉलर प्रति बैरल रह गई। जून में यह 80 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि कीमतें 80 डॉलर से भी नीचे जा सकती है। इसके बावजूद ईंधन की कीमतें ऊंची बनी रह सकती है। साथ ही, इससे उपभोक्ताओं तक राहत पहुंचाने की संभावना भी कम है।
भारतीय उपभोक्ताओं के लिए स्थिति यह है कि जब कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो पेट्रोल-डीजल महंगे हो जाते हैं। लेकिन, जब क्रूड ऑयल की कीमत गिरती है तो उसका फायदा शायद ही कभी मिलता है।
संसद में प्रस्तुत आंकड़ो के अनुसार साल 2014-15 से अब तक केंद्र सरकार पेट्रोल-डीजल पर लग रहे एक्साइड ड्यूटी के जरिये 40 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा जुटा चुकी है। इससे ईंधन सरकार के लिए सबसे भरोसेमंद रेवेन्यू सोर्स में से एक बन गया।
कोविड-19 के दौर जब इंटरनेशनल कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 70 फीसदी की गिरावट आई, तह रिटेल कीमत भी उसी रेश्यो से कम नहीं हुआ। इस समय सरकार ने कीमतों में कटौती करने की जगह एक्साइड ड्यूटी बढ़ा दी। सालों तक देखा गया है कि जब भी इंटरनेशनल तेल कीमतें कम होती है तो फ्यूल पर लगने वाला टैक्स सरकार के लिए एक वित्तीय सुरक्षा कवच का काम करते हैं।
यही कारण है कि कई आलोचक कहते हैं कि डीरेगुलेशन केवल कागजों पर मौजूद हैं। सुधार का मूल उद्देश्य यह था कि जब कच्चे तेल की कीमत बढ़े तो उपभोक्ता ज्यादा भुगतान करें। वहीं, जब कीमतों में कटौती हो तो उपभोक्ता को उससे फायदा हो। लेकिन, वास्तव में उपभोक्ता को इस समझौता का केवल एक ही पक्ष का अनुभव हुआ।
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