GIFT IFSC में फंड मैनेजमेंट की एंट्री हुई आसान, जानें TPFM कैसे छोटे फंड मैनेजरों के लिए घटा रहा है एंट्री बैरियर?
किसी नए फाइनेंशियल सेंटर में फंड मैनेजमेंट का कारोबार शुरू करना छोटे और उभरते फंड मैनेजरों के लिए आसान नहीं रहा है। GIFT IFSC में भी अब तक किसी फंड मैनेजर को स्वतंत्र रूप से काम शुरू करने से पहले कानूनी और रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करना पड़ता था। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर अपनी मौजूदगी बनाना, जरूरी लोगों की नियुक्ति करना और फंड चलाने के लिए पूरा ऑपरेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना भी जरूरी था। यानी फंड से पर्याप्त पैसा जुटेगा या नहीं, यह बाद की बात थी, लेकिन शुरुआत में ही काफी निवेश और संसाधन लगाने पड़ते थे। खासकर छोटे और नए फंड मैनेजरों के लिए यह तय करना आसान नहीं था कि बिना पर्याप्त एसेट्स जुटाए किसी नए फाइनेंशियल सेंटर में इतना बड़ा सेटअप खड़ा करना व्यावसायिक रूप से सही रहेगा या नहीं।

अब GIFT IFSC में इस तस्वीर में बदलाव की शुरुआत हुई है। इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर्स अथॉरिटी ( IFSCA ) के 2025 फंड मैनेजमेंट रेग्युलेशंस के तहत शुरू की गई थर्ड-पार्टी फंड मैनेजमेंट सर्विसेज ( TPFM ) व्यवस्था फंड मैनेजरों को GIFT IFSC में एंट्री का एक नया रास्ता देती है। इस मॉडल के तहत GIFT IFSC में पहले से रजिस्टर्ड फंड मैनेजमेंट एंटिटी (FME) किसी थर्ड-पार्टी फंड मैनेजर की ओर से एलिजिबल स्कीम लॉन्च और मैनेज कर सकती है। इसी वजह से TPFM मॉडल को तेजी से 'प्लेटफॉर्म प्ले' के रूप में देखा जा रहा है। इसमें एक तरफ होस्ट FME रेग्युलेटरी एंड ऑपरेशनल फ्रेमवर्क उपलब्ध कराता है, तो दूसरी तरफ थर्ड-पार्टी फंड मैनेजर का फोकस अपनी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी और एक्सपर्टीज पर रहता है।
TPFM की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है कि इससे फंड लॉन्च करने की शुरुआती लागत कम हो सकती है। इसका बड़ा बदलाव यह है कि GIFT IFSC में एंट्री करने से पहले किसी फंड मैनेजर को खुद कितना इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा, इसकी जरूरत ही बदल जाती है।
पुरानी समस्या: पहले इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना, फिर उसकी कैपेसिटी साबित करनाकिसी नए सेक्टर में फंड मैनेजमेंट का कारोबार शुरू करने की अर्थव्यवस्था में लंबे समय से एक बड़ी समस्या रही है। खर्च शुरुआत में करना पड़ता है, जबकि उससे होने वाली कमाई काफी बाद में शुरू होती है। एक फंड मैनेजर को उचित रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करने, स्थानीय स्तर पर ऑपरेशन और कारोबारी मौजूदगी बनाने, प्रमुख कर्मचारियों की नियुक्ति करने, कंप्लायंस और गवर्नेंस प्रोसेस तैयार करने, टेक्नोलॉजी और रिपोर्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने और निवेशकों व फंड को सपोर्ट करने के लिए जरूरी ऑपरेशनल कैपेसिटी डेवलप करने में निवेश करना पड़ सकता है।
इनमें से ज्यादातर खर्च प्लेटफॉर्म स्तर के खर्च होते हैं। यानी ये खर्च सीधे इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी की वजह से नहीं होते, बल्कि एक रेगुलेटेड फंड-मैनेजमेंट बिजनेस को ऑपरेट करने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के कारण होते हैं। किसी बड़े संस्थागत फंड मैनेजर के लिए ऐसे खर्चों को संभालना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। लेकिन किसी उभरते हुए फंड मैनेजर के लिए यही खर्च मार्केट में एंट्री की बड़ी बाधा बन सकते हैं। समस्या यह जरूरी नहीं है कि उसकी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी में बिजनेस पोटेंशियल नहीं है। हो सकता है कि स्ट्रैटेजी में पर्याप्त संभावनाएं हों, लेकिन मैनेजर को यह पता चलने से पहले ही काफी संसाधन लगाने पड़ें कि उसकी स्ट्रैटेजी पर्याप्त इन्वेस्टमेंट अट्रैक्टेड कर पाएगी या नहीं।
TPFM: GIFT IFSC को प्लेटफॉर्म में बदलने वाला मॉडलTPFM का फ्रेमवर्क एस्टेब्लिश में एंट्री का एक अलग मॉडल तैयार करता है। अब मैनेजर को अपने फंड-मैनेजमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का हर हिस्सा खुद तैयार करने की जरूरत नहीं होती। इसके बजाय GIFT IFSC में पहले से मौजूद कोई FME वह रेगुलेटेड प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा सकता है, जिसके जरिए थर्ड-पार्टी मैनेजर की स्कीम लॉन्च और मैनेज की जा सकती है। मौजूदा FME रेगुलेटेड फंड-मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म, रेग्युलेटरी और ऑपरेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर, गवर्नेंस और ओवरसाइट फ्रेमवर्क, कंप्लायंस कैपेबिलिटीज और फंड-मैनेजमेंट प्रोसेस उपलब्ध कराता है। वहीं, थर्ड-पार्टी मैनेजर अपनी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी, फंड का प्रस्ताव, इन्वेस्टमेंट एक्सपर्टीज, निवेशकों और फंड जुटाने से जुड़े संबंध व कमर्शियल स्ट्रैटेजी लेकर आता है।
TPFM का मतलब यह नहीं है कि फंड बिना किसी पूंजी आवश्यकता के शुरू किया जा सकता है। फंड को अब भी लागू नियामकीय आवश्यकताओं को पूरा करना होगा, जिसमें संबंधित न्यूनतम कॉर्पस की जरूरत भी शामिल है। छोटे मैनेजरों के लिए रिस्ट्रिक्टेड स्कीम के लिए 3 मिलियन डॉलर का न्यूनतम कॉर्पस खास तौर पर महत्वपूर्ण है। लेकिन यहां फंड कैपिटल और प्लेटफॉर्म कैपिटल के बीच अंतर समझना जरूरी है। फंड कैपिटल वह पैसा है, जिसे सेल्फ-इन्वेस्टमेंट व्हीकल यानी फंड के लिए जुटाना जरूरी है। दूसरी ओर, प्लेटफॉर्म कैपिटल से मतलब उन संसाधनों से है, जो उस रेगुलेटेड फंड-मैनेजमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने और बनाए रखने के लिए जरूरी होते हैं, जिसके जरिए फंड संचालित किया जाता है। TPFM पहले खर्च को खत्म नहीं करता, लेकिन यह दूसरे खर्च की अर्थव्यवस्था को काफी हद तक बदल सकता है।
अब GIFT IFSC में इस तस्वीर में बदलाव की शुरुआत हुई है। इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर्स अथॉरिटी ( IFSCA ) के 2025 फंड मैनेजमेंट रेग्युलेशंस के तहत शुरू की गई थर्ड-पार्टी फंड मैनेजमेंट सर्विसेज ( TPFM ) व्यवस्था फंड मैनेजरों को GIFT IFSC में एंट्री का एक नया रास्ता देती है। इस मॉडल के तहत GIFT IFSC में पहले से रजिस्टर्ड फंड मैनेजमेंट एंटिटी (FME) किसी थर्ड-पार्टी फंड मैनेजर की ओर से एलिजिबल स्कीम लॉन्च और मैनेज कर सकती है। इसी वजह से TPFM मॉडल को तेजी से 'प्लेटफॉर्म प्ले' के रूप में देखा जा रहा है। इसमें एक तरफ होस्ट FME रेग्युलेटरी एंड ऑपरेशनल फ्रेमवर्क उपलब्ध कराता है, तो दूसरी तरफ थर्ड-पार्टी फंड मैनेजर का फोकस अपनी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी और एक्सपर्टीज पर रहता है।
TPFM की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है कि इससे फंड लॉन्च करने की शुरुआती लागत कम हो सकती है। इसका बड़ा बदलाव यह है कि GIFT IFSC में एंट्री करने से पहले किसी फंड मैनेजर को खुद कितना इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा, इसकी जरूरत ही बदल जाती है।
पुरानी समस्या: पहले इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना, फिर उसकी कैपेसिटी साबित करनाकिसी नए सेक्टर में फंड मैनेजमेंट का कारोबार शुरू करने की अर्थव्यवस्था में लंबे समय से एक बड़ी समस्या रही है। खर्च शुरुआत में करना पड़ता है, जबकि उससे होने वाली कमाई काफी बाद में शुरू होती है। एक फंड मैनेजर को उचित रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करने, स्थानीय स्तर पर ऑपरेशन और कारोबारी मौजूदगी बनाने, प्रमुख कर्मचारियों की नियुक्ति करने, कंप्लायंस और गवर्नेंस प्रोसेस तैयार करने, टेक्नोलॉजी और रिपोर्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने और निवेशकों व फंड को सपोर्ट करने के लिए जरूरी ऑपरेशनल कैपेसिटी डेवलप करने में निवेश करना पड़ सकता है।
इनमें से ज्यादातर खर्च प्लेटफॉर्म स्तर के खर्च होते हैं। यानी ये खर्च सीधे इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी की वजह से नहीं होते, बल्कि एक रेगुलेटेड फंड-मैनेजमेंट बिजनेस को ऑपरेट करने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के कारण होते हैं। किसी बड़े संस्थागत फंड मैनेजर के लिए ऐसे खर्चों को संभालना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। लेकिन किसी उभरते हुए फंड मैनेजर के लिए यही खर्च मार्केट में एंट्री की बड़ी बाधा बन सकते हैं। समस्या यह जरूरी नहीं है कि उसकी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी में बिजनेस पोटेंशियल नहीं है। हो सकता है कि स्ट्रैटेजी में पर्याप्त संभावनाएं हों, लेकिन मैनेजर को यह पता चलने से पहले ही काफी संसाधन लगाने पड़ें कि उसकी स्ट्रैटेजी पर्याप्त इन्वेस्टमेंट अट्रैक्टेड कर पाएगी या नहीं।
TPFM: GIFT IFSC को प्लेटफॉर्म में बदलने वाला मॉडलTPFM का फ्रेमवर्क एस्टेब्लिश में एंट्री का एक अलग मॉडल तैयार करता है। अब मैनेजर को अपने फंड-मैनेजमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का हर हिस्सा खुद तैयार करने की जरूरत नहीं होती। इसके बजाय GIFT IFSC में पहले से मौजूद कोई FME वह रेगुलेटेड प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा सकता है, जिसके जरिए थर्ड-पार्टी मैनेजर की स्कीम लॉन्च और मैनेज की जा सकती है। मौजूदा FME रेगुलेटेड फंड-मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म, रेग्युलेटरी और ऑपरेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर, गवर्नेंस और ओवरसाइट फ्रेमवर्क, कंप्लायंस कैपेबिलिटीज और फंड-मैनेजमेंट प्रोसेस उपलब्ध कराता है। वहीं, थर्ड-पार्टी मैनेजर अपनी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी, फंड का प्रस्ताव, इन्वेस्टमेंट एक्सपर्टीज, निवेशकों और फंड जुटाने से जुड़े संबंध व कमर्शियल स्ट्रैटेजी लेकर आता है।
TPFM का मतलब यह नहीं है कि फंड बिना किसी पूंजी आवश्यकता के शुरू किया जा सकता है। फंड को अब भी लागू नियामकीय आवश्यकताओं को पूरा करना होगा, जिसमें संबंधित न्यूनतम कॉर्पस की जरूरत भी शामिल है। छोटे मैनेजरों के लिए रिस्ट्रिक्टेड स्कीम के लिए 3 मिलियन डॉलर का न्यूनतम कॉर्पस खास तौर पर महत्वपूर्ण है। लेकिन यहां फंड कैपिटल और प्लेटफॉर्म कैपिटल के बीच अंतर समझना जरूरी है। फंड कैपिटल वह पैसा है, जिसे सेल्फ-इन्वेस्टमेंट व्हीकल यानी फंड के लिए जुटाना जरूरी है। दूसरी ओर, प्लेटफॉर्म कैपिटल से मतलब उन संसाधनों से है, जो उस रेगुलेटेड फंड-मैनेजमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने और बनाए रखने के लिए जरूरी होते हैं, जिसके जरिए फंड संचालित किया जाता है। TPFM पहले खर्च को खत्म नहीं करता, लेकिन यह दूसरे खर्च की अर्थव्यवस्था को काफी हद तक बदल सकता है।
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