IT सेक्टर में AI का असर, लेकिन नहीं जाएगी नौकरी! इंफोसिस के CEO सलील पारेख ने बताया कंपनी का प्लान
भारत का आईटी सेक्टर पिछले चार दशकों से एक ही 'पिरामिड मॉडल' पर चलता आया है,लेकिन अब इसमें बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। इंफोसिस के CEO सलील पारेख का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इस पुराने ढांचे को बदल सकता है। बिजनेस जर्नलिस्ट जोशेल मेंडोंका से बातचीत में सलील पारेख ने कहा कि कंपनी ने हायरिंग के तरीके में बदलाव शुरू भी कर दिया है। हालांकि, बड़े स्तर पर स्ट्रक्चरल चेंजेस आने में अभी समय लगेगा। सलील पारेख ने यह भी कहा कि AI के बढ़ते असर के बावजूद कंपनी छंटनी (ले-ऑफ) का रास्ता नहीं अपनाएगी। उन्होंने बताया कि इंफोसिस AI के दौर में आगे बढ़ने के लिए हायरिंग और कर्मचारियों को नई स्किल्स सिखाने पर ध्यान दे रही है।

AI के 'डिफ्लेशनरी असर' और Infosys की रणनीति
CEO सलील पारेख का कहना है कि AI के कारण भले ही लागत कम होने का दबाव (डिफ्लेशनरी इफेक्ट) बनता है, लेकिन इससे नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं। कंपनी ने AI सर्विसेज के छह बड़े क्षेत्रों की पहचान की है, जहां उसे करीब 300 बिलियन डॉलर का संभावित बाजार दिखता है। यह पूरी तरह नया काम है, इसलिए इंफोसिस इस क्षेत्र में तेजी से ग्रोथ पर ध्यान दे रही है। इसके साथ ही, कंपनी अपने मौजूदा कामों में भी AI का इस्तेमाल कर रही है, जिसे 'एआई ऑगमेंटेड सर्विसेज' कहा जाता है। इससे कुछ मामलों में उन्हें कंसोलिडेशन (काम का एक जगह आना) और कुछ में क्लाइंट्स के साथ काम का दायरा बढ़ने का फायदा मिल रहा है।
AI से टैलेंट मॉडल (पिरामिड स्ट्रक्चर) में बदलाव
सलील पारेख के अनुसार, AI नौकरियों को कम करने के बजाय नए अवसर पैदा करेगा। इंफोसिस ने पिछले वित्त वर्ष में लगभग 20,000 कॉलेज ग्रेजुएट्स को भर्ती किया था और इस साल भी लगभग उतनी ही भर्ती की योजना है। कंपनी अब नए कर्मचारियों को इस तरह ट्रेन कर रही है कि वे आधुनिक तरीके से सॉफ्टवेयर बना सकें और AI टूल्स, खासकर फाउंडेशन मॉडल्स का सही इस्तेमाल कर सकें। इसके साथ ही, इंफोसिस अलग-अलग स्तरों पर स्पेशलिस्ट्स को भी भर्ती कर रही है। इसका असर यह होगा कि पारंपरिक 'पिरामिड मॉडल' धीरे-धीरे बदलेगा। हालांकि यह बदलाव अचानक नहीं आएगा, लेकिन भविष्य में ज्यादा स्पेशलाइज्ड स्किल्स की मांग बढ़ेगी और टैलेंट स्ट्रक्चर उसी के अनुसार विकसित होगा।
क्या कंपनी अपने स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव करेगी?
इंफोसिस पहले ही 'वन इंफोसिस' मॉडल पर काम कर रही है, जिसका मतलब है कि कंपनी के सभी विभाग मिलकर क्लाइंट के लिए बेहतर समाधान दें। AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ, यह और जरूरी हो गया है कि सभी टीमें आपस में तालमेल के साथ काम करें। कंपनी का साइज भी पहले से काफी बड़ा हो चुका है-लगभग दोगुना। ऐसे में इंटीग्रेशन (सभी हिस्सों का जुड़ाव) और ज्यादा अहम हो गया है। हालांकि, अभी इंफोसिस किसी बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव की योजना नहीं बना रही है। इसके बजाय, वह टीमों के बीच बेहतर सहयोग और इंसेंटिव सिस्टम को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है।
अपने कर्मचारियों को AI टूल्स ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित कर रही कंपनी
मेटा जैसी कंपनियां AI के इस्तेमाल को मापने के लिए 'टोकन यूसेज' जैसे मेट्रिक्स का इस्तेमाल कर रही हैं। इंफोसिस भी इसे ट्रैक करती है, लेकिन कंपनी का मानना है कि यह सिर्फ एक 'बीच का संकेतक' (इंटरमीडिएट मेजर) है। असल मायने यह रखते हैं कि AI से क्लाइंट के बिजनेस पर क्या असर पड़ा। क्या उनकी रेवेन्यू बढ़ी? क्या वे ज्यादा कुशल (एफिशिएंट) बने? यही असली सफलता के पैमाने हैं। इसलिए टोकन यूसेज जरूरी तो है, लेकिन इसे अंतिम मापदंड नहीं माना जा सकता।
इंफोसिस का टोकन यूसेज तेजी से बढ़ रहा है और कंपनी अपने कर्मचारियों को AI टूल्स का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इसका उद्देश्य यह है कि वे बेहतर एप्लिकेशन और कोड डेवलप कर सकें-चाहे क्लाइंट्स के लिए हो या कंपनी के अंदर। हालांकि, कंपनी ने इसके लिए कोई निश्चित लक्ष्य तय नहीं किया है। उनके पास आंतरिक आंकड़े मौजूद हैं, जिन्हें भविष्य में शेयर किया जा सकता है।
पिछले एक साल में इंफोसिस ने नहीं की कोई छंटनी
एक निजी चैनल को दिए एक इंटरव्यू में पारिख ने कहा- पिछले एक साल में हमने कोई छंटनी नहीं की है और हमें आगे भी ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं दिखती, जबकि इंडस्ट्री की कई अन्य कंपनियां ऑटोमेशन के बढ़ते असर के बीच अपने वर्कफोर्स में बदलाव कर रही हैं। इसके बजाय, बेंगलुरु स्थित यह आईटी कंपनी बड़े पैमाने पर कैंपस हायरिंग जारी रखने की योजना बना रही है। इस साल भी करीब 20,000 फ्रेश ग्रेजुएट्स को भर्ती करने का लक्ष्य है, जो पिछले साल के लगभग बराबर है।
AI के 'डिफ्लेशनरी असर' और Infosys की रणनीति
CEO सलील पारेख का कहना है कि AI के कारण भले ही लागत कम होने का दबाव (डिफ्लेशनरी इफेक्ट) बनता है, लेकिन इससे नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं। कंपनी ने AI सर्विसेज के छह बड़े क्षेत्रों की पहचान की है, जहां उसे करीब 300 बिलियन डॉलर का संभावित बाजार दिखता है। यह पूरी तरह नया काम है, इसलिए इंफोसिस इस क्षेत्र में तेजी से ग्रोथ पर ध्यान दे रही है। इसके साथ ही, कंपनी अपने मौजूदा कामों में भी AI का इस्तेमाल कर रही है, जिसे 'एआई ऑगमेंटेड सर्विसेज' कहा जाता है। इससे कुछ मामलों में उन्हें कंसोलिडेशन (काम का एक जगह आना) और कुछ में क्लाइंट्स के साथ काम का दायरा बढ़ने का फायदा मिल रहा है।
AI से टैलेंट मॉडल (पिरामिड स्ट्रक्चर) में बदलाव
सलील पारेख के अनुसार, AI नौकरियों को कम करने के बजाय नए अवसर पैदा करेगा। इंफोसिस ने पिछले वित्त वर्ष में लगभग 20,000 कॉलेज ग्रेजुएट्स को भर्ती किया था और इस साल भी लगभग उतनी ही भर्ती की योजना है। कंपनी अब नए कर्मचारियों को इस तरह ट्रेन कर रही है कि वे आधुनिक तरीके से सॉफ्टवेयर बना सकें और AI टूल्स, खासकर फाउंडेशन मॉडल्स का सही इस्तेमाल कर सकें। इसके साथ ही, इंफोसिस अलग-अलग स्तरों पर स्पेशलिस्ट्स को भी भर्ती कर रही है। इसका असर यह होगा कि पारंपरिक 'पिरामिड मॉडल' धीरे-धीरे बदलेगा। हालांकि यह बदलाव अचानक नहीं आएगा, लेकिन भविष्य में ज्यादा स्पेशलाइज्ड स्किल्स की मांग बढ़ेगी और टैलेंट स्ट्रक्चर उसी के अनुसार विकसित होगा।
क्या कंपनी अपने स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव करेगी?
इंफोसिस पहले ही 'वन इंफोसिस' मॉडल पर काम कर रही है, जिसका मतलब है कि कंपनी के सभी विभाग मिलकर क्लाइंट के लिए बेहतर समाधान दें। AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ, यह और जरूरी हो गया है कि सभी टीमें आपस में तालमेल के साथ काम करें। कंपनी का साइज भी पहले से काफी बड़ा हो चुका है-लगभग दोगुना। ऐसे में इंटीग्रेशन (सभी हिस्सों का जुड़ाव) और ज्यादा अहम हो गया है। हालांकि, अभी इंफोसिस किसी बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव की योजना नहीं बना रही है। इसके बजाय, वह टीमों के बीच बेहतर सहयोग और इंसेंटिव सिस्टम को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है।
अपने कर्मचारियों को AI टूल्स ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित कर रही कंपनी
मेटा जैसी कंपनियां AI के इस्तेमाल को मापने के लिए 'टोकन यूसेज' जैसे मेट्रिक्स का इस्तेमाल कर रही हैं। इंफोसिस भी इसे ट्रैक करती है, लेकिन कंपनी का मानना है कि यह सिर्फ एक 'बीच का संकेतक' (इंटरमीडिएट मेजर) है। असल मायने यह रखते हैं कि AI से क्लाइंट के बिजनेस पर क्या असर पड़ा। क्या उनकी रेवेन्यू बढ़ी? क्या वे ज्यादा कुशल (एफिशिएंट) बने? यही असली सफलता के पैमाने हैं। इसलिए टोकन यूसेज जरूरी तो है, लेकिन इसे अंतिम मापदंड नहीं माना जा सकता।
इंफोसिस का टोकन यूसेज तेजी से बढ़ रहा है और कंपनी अपने कर्मचारियों को AI टूल्स का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इसका उद्देश्य यह है कि वे बेहतर एप्लिकेशन और कोड डेवलप कर सकें-चाहे क्लाइंट्स के लिए हो या कंपनी के अंदर। हालांकि, कंपनी ने इसके लिए कोई निश्चित लक्ष्य तय नहीं किया है। उनके पास आंतरिक आंकड़े मौजूद हैं, जिन्हें भविष्य में शेयर किया जा सकता है।
पिछले एक साल में इंफोसिस ने नहीं की कोई छंटनी
एक निजी चैनल को दिए एक इंटरव्यू में पारिख ने कहा- पिछले एक साल में हमने कोई छंटनी नहीं की है और हमें आगे भी ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं दिखती, जबकि इंडस्ट्री की कई अन्य कंपनियां ऑटोमेशन के बढ़ते असर के बीच अपने वर्कफोर्स में बदलाव कर रही हैं। इसके बजाय, बेंगलुरु स्थित यह आईटी कंपनी बड़े पैमाने पर कैंपस हायरिंग जारी रखने की योजना बना रही है। इस साल भी करीब 20,000 फ्रेश ग्रेजुएट्स को भर्ती करने का लक्ष्य है, जो पिछले साल के लगभग बराबर है।
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