Stocks: Brigade Enterprises और Sumitomo Chemical में 7% तेजी के संकेत, एक्सपर्ट्स ने बताए Buy Levels
भारत ने एथेनॉल ब्लेंडिंग में जो किया, अब सरकार वैसा ही प्रयोग कंप्रेस्ड बायोगैस यानी CBG के साथ करना चाहती है। फर्क इतना है कि इस बार सिर्फ प्लांट लगाना काफी नहीं होगा। CBG की असली ग्रोथ इस बात पर निर्भर करेगी कि कितने बायोगैस प्लांट पाइपलाइन नेटवर्क से जुड़ पाते हैं।
6 अगस्त 2026 को कैबिनेट ने ₹23,731 करोड़ की गोबरधन स्कीम को मंजूरी दी। ये स्कीम अगले 10 वर्षों तक चलेगी और इसका मकसद भारत में CBG सेक्टर को बड़े स्तर पर खड़ा करना है।

सरकार के सामने एक सफल उदाहरण पहले से मौजूद है। एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम वर्षों तक टारगेट से दूर रहा। 2014 में पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग करीब 1.5% थी। इसके बाद पॉलिसी में कुछ अहम बदलाव हुए और पिछले साल ब्लेंडिंग 20% तक पहुंच गई।
खास बात ये है कि यह टारगेट तय समय से 5 साल पहले हासिल हुआ।
अब सवाल ये नहीं है कि CBG का आइडिया नया है या नहीं। असली सवाल ये है कि क्या एथेनॉल की सफलता का पॉलिसी मॉडल बायोगैस सेक्टर में भी काम करेगा।
एथेनॉल से क्या सीखा गया?भारत में एथेनॉल प्रोग्राम की शुरुआत पायलट प्रोजेक्ट के रूप में 2001 में हुई थी। 2003 में इसे फॉर्मल प्रोग्राम का रूप दिया गया। टारगेट तय हुए, लेकिन कई बार पूरे नहीं हुए।
समस्या सप्लाई की थी।
लंबे समय तक एथेनॉल प्रोडक्शन मुख्य रूप से गन्ने पर निर्भर था। इससे कच्चे माल की उपलब्धता सीमित रही। जब तक एथेनॉल के लिए काफी स्टॉक उपलब्ध नहीं हुआ, टारगेट कागज पर ही बने रहे।
फिर चार बड़े बदलाव हुए-
पहला, 2018 की नेशनल पॉलिसी ऑन बायो फ्यूल्स ने स्टॉक बेस को बढ़ाया। गन्ने के अलावा मक्के और अनाज जैसे विकल्पों को भी एथनॉल प्रोडक्शन में शामिल किया गया।
दूसरा, 2021 में NITI आयोग ने टारगेट का रोडमैप दिया। इससे निवेशक को ये साफ संकेत मिला कि आने वाले वर्षों में डिमांड कितनी होगी।
तीसरा, तेल कंपनियों ने एथेनॉल प्लांट में निवेश को बढ़ावा दिया। साथ ही खरीद की निश्चितता ने प्रोजेक्ट को फाइनेंशियली मजबूत बनाया।
चौथा, फाइनेस और निवेश सपोर्ट ने कैपिसिटी विस्तार करने में मदद की।
यही चार बदलाव अब CBG सेक्टर में भी दिखाई दे रहे हैं।
CBG के लिए वही फॉर्मूलाCBG गोबर, पराली जैसे ऑर्गेनिक वेस्ट से तैयार की जाती है। गैस को प्रोसेस और साफ करने के बाद इसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
नई गोबरधन स्कीम में सबसे पहले डिमांड पर ध्यान दिया गया है।
सिटी गैस कंपनी को अपने CNG और PNG में CBG की हिस्सेदारी बढ़ानी होगी। ये हिस्सा धीरे-धीरे बढ़कर दशक के अंत तक 5% तक पहुंचना है।
इस तरह CBG बनाने वालों के सामने सबसे बड़ी समस्या, यानी खरीदार कौन होगा, कुछ हद तक कम हो सकती है।
दूसरा बड़ा फैक्टर कीमत है।
सीबीजी बनाने वालों को सरकारी रेट मिलेगा, जिसकी अवधि 10 साल की होगी। यह रेट मौजूदा भुगतान स्तर से 40% से अधिक ऊपर है।
यह बदलाव छोटा नहीं है।
CBG की सबसे बड़ी समस्यायहीं एथेनॉल और सीबीजी की कहानी अलग हो जाती है।
एथेनॉल एक लिक्विड ईंधन है। इसे टैंकर के जरिए ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है। फिर इसे पेट्रोल के साथ मिलाया जा सकता है।
CBG के साथ ऐसा नहीं है।
अगर बायोगैस प्लांट पाइपलाइन से जुड़ा है, तो गैस को सीधे नेटवर्क में भेजा जा सकता है। लेकिन पाइपलाइन कनेक्शन नहीं होने पर गैस को हाई प्रेशर के जरिए सड़क से ट्रांसपोर्ट करना पड़ता है।
यह तरीका महंगा है।
ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ती है और प्लांट की कमर्शियल रीच भी सीमित हो सकती है। यही कारण है कि CBG सेक्टर में सिर्फ प्लांट कैपेसिटी बनाना पर्याप्त नहीं होगा।
पाइपलाइन कनेक्टिविटी उतनी ही जरूरी होगी।
भारत में अब तक 207 बायोगैस प्लांट बन चुके हैं। लेकिन इनमें सिर्फ 17 प्लांट पाइपलाइन से जुड़े हैं।
कुछ और प्लांट को कनेक्शन दिया जा रहा है। फिर भी बड़ी संख्या में प्लांट अभी पाइपलाइन से बाहर हैं।
भारत का CBG सेक्टर अभी छोटा है। देश के सबसे बड़े गैस ऑपरेटर की CBG सेल्स भी पूरे फाइनेंशियल ईयर में 2,000 टन से कम रही।
लेकिन छोटा बेस हमेशा कमजोर कहानी का संकेत नहीं होता।
एथेनॉल भी एक समय बहुत छोटे बेस से शुरू हुआ था। 2014 में 1.5% ब्लेंडिंग देखकर शायद ही किसी ने सोचा होगा कि भारत कुछ वर्षों में 20% तक पहुंच जाएगा।
CBG में भी शुरुआती संकेत ग्रोथ के हैं। पिछले 2 वर्षों से कम समय में बायोगैस प्लांट की संख्या दोगुनी से ज्यादा हो चुकी है।
अब गोबरधन स्कीम डिमांड, प्राइसिंग, स्टॉक और फाइनेंस जैसी बड़ी समस्या को सुलझाने करने की कोशिश कर रही है।
लेकिन इंफ्रा का सवाल अभी बाकी है।
सरकार ने पाइपलाइन कनेक्टिविटी को लेकर स्कीम में सपोर्ट का रास्ता जरूर बनाया है। हालांकि, इनपुट के मुताबिक अभी ऐसा कोई स्पष्ट कनेक्शन टारगेट सामने नहीं आया है, जिससे ये पता चले कि कितने CBG प्लांट को पाइपलाइन नेटवर्क से जोड़ा जाएगा।
यही संख्या आगे चलकर सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है।
6 अगस्त 2026 को कैबिनेट ने ₹23,731 करोड़ की गोबरधन स्कीम को मंजूरी दी। ये स्कीम अगले 10 वर्षों तक चलेगी और इसका मकसद भारत में CBG सेक्टर को बड़े स्तर पर खड़ा करना है।
सरकार के सामने एक सफल उदाहरण पहले से मौजूद है। एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम वर्षों तक टारगेट से दूर रहा। 2014 में पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग करीब 1.5% थी। इसके बाद पॉलिसी में कुछ अहम बदलाव हुए और पिछले साल ब्लेंडिंग 20% तक पहुंच गई।
खास बात ये है कि यह टारगेट तय समय से 5 साल पहले हासिल हुआ।
अब सवाल ये नहीं है कि CBG का आइडिया नया है या नहीं। असली सवाल ये है कि क्या एथेनॉल की सफलता का पॉलिसी मॉडल बायोगैस सेक्टर में भी काम करेगा।
एथेनॉल से क्या सीखा गया?भारत में एथेनॉल प्रोग्राम की शुरुआत पायलट प्रोजेक्ट के रूप में 2001 में हुई थी। 2003 में इसे फॉर्मल प्रोग्राम का रूप दिया गया। टारगेट तय हुए, लेकिन कई बार पूरे नहीं हुए।
समस्या सप्लाई की थी।
लंबे समय तक एथेनॉल प्रोडक्शन मुख्य रूप से गन्ने पर निर्भर था। इससे कच्चे माल की उपलब्धता सीमित रही। जब तक एथेनॉल के लिए काफी स्टॉक उपलब्ध नहीं हुआ, टारगेट कागज पर ही बने रहे।
फिर चार बड़े बदलाव हुए-
पहला, 2018 की नेशनल पॉलिसी ऑन बायो फ्यूल्स ने स्टॉक बेस को बढ़ाया। गन्ने के अलावा मक्के और अनाज जैसे विकल्पों को भी एथनॉल प्रोडक्शन में शामिल किया गया।
दूसरा, 2021 में NITI आयोग ने टारगेट का रोडमैप दिया। इससे निवेशक को ये साफ संकेत मिला कि आने वाले वर्षों में डिमांड कितनी होगी।
तीसरा, तेल कंपनियों ने एथेनॉल प्लांट में निवेश को बढ़ावा दिया। साथ ही खरीद की निश्चितता ने प्रोजेक्ट को फाइनेंशियली मजबूत बनाया।
चौथा, फाइनेस और निवेश सपोर्ट ने कैपिसिटी विस्तार करने में मदद की।
यही चार बदलाव अब CBG सेक्टर में भी दिखाई दे रहे हैं।
CBG के लिए वही फॉर्मूलाCBG गोबर, पराली जैसे ऑर्गेनिक वेस्ट से तैयार की जाती है। गैस को प्रोसेस और साफ करने के बाद इसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
नई गोबरधन स्कीम में सबसे पहले डिमांड पर ध्यान दिया गया है।
सिटी गैस कंपनी को अपने CNG और PNG में CBG की हिस्सेदारी बढ़ानी होगी। ये हिस्सा धीरे-धीरे बढ़कर दशक के अंत तक 5% तक पहुंचना है।
इस तरह CBG बनाने वालों के सामने सबसे बड़ी समस्या, यानी खरीदार कौन होगा, कुछ हद तक कम हो सकती है।
दूसरा बड़ा फैक्टर कीमत है।
सीबीजी बनाने वालों को सरकारी रेट मिलेगा, जिसकी अवधि 10 साल की होगी। यह रेट मौजूदा भुगतान स्तर से 40% से अधिक ऊपर है।
यह बदलाव छोटा नहीं है।
CBG की सबसे बड़ी समस्यायहीं एथेनॉल और सीबीजी की कहानी अलग हो जाती है।
एथेनॉल एक लिक्विड ईंधन है। इसे टैंकर के जरिए ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है। फिर इसे पेट्रोल के साथ मिलाया जा सकता है।
CBG के साथ ऐसा नहीं है।
अगर बायोगैस प्लांट पाइपलाइन से जुड़ा है, तो गैस को सीधे नेटवर्क में भेजा जा सकता है। लेकिन पाइपलाइन कनेक्शन नहीं होने पर गैस को हाई प्रेशर के जरिए सड़क से ट्रांसपोर्ट करना पड़ता है।
यह तरीका महंगा है।
ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ती है और प्लांट की कमर्शियल रीच भी सीमित हो सकती है। यही कारण है कि CBG सेक्टर में सिर्फ प्लांट कैपेसिटी बनाना पर्याप्त नहीं होगा।
पाइपलाइन कनेक्टिविटी उतनी ही जरूरी होगी।
भारत में अब तक 207 बायोगैस प्लांट बन चुके हैं। लेकिन इनमें सिर्फ 17 प्लांट पाइपलाइन से जुड़े हैं।
कुछ और प्लांट को कनेक्शन दिया जा रहा है। फिर भी बड़ी संख्या में प्लांट अभी पाइपलाइन से बाहर हैं।
भारत का CBG सेक्टर अभी छोटा है। देश के सबसे बड़े गैस ऑपरेटर की CBG सेल्स भी पूरे फाइनेंशियल ईयर में 2,000 टन से कम रही।
लेकिन छोटा बेस हमेशा कमजोर कहानी का संकेत नहीं होता।
एथेनॉल भी एक समय बहुत छोटे बेस से शुरू हुआ था। 2014 में 1.5% ब्लेंडिंग देखकर शायद ही किसी ने सोचा होगा कि भारत कुछ वर्षों में 20% तक पहुंच जाएगा।
CBG में भी शुरुआती संकेत ग्रोथ के हैं। पिछले 2 वर्षों से कम समय में बायोगैस प्लांट की संख्या दोगुनी से ज्यादा हो चुकी है।
अब गोबरधन स्कीम डिमांड, प्राइसिंग, स्टॉक और फाइनेंस जैसी बड़ी समस्या को सुलझाने करने की कोशिश कर रही है।
लेकिन इंफ्रा का सवाल अभी बाकी है।
सरकार ने पाइपलाइन कनेक्टिविटी को लेकर स्कीम में सपोर्ट का रास्ता जरूर बनाया है। हालांकि, इनपुट के मुताबिक अभी ऐसा कोई स्पष्ट कनेक्शन टारगेट सामने नहीं आया है, जिससे ये पता चले कि कितने CBG प्लांट को पाइपलाइन नेटवर्क से जोड़ा जाएगा।
यही संख्या आगे चलकर सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है।
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