India Gold Mine: भारत की इस नई खदान में इतना सोना, मई से शुरू होगा काम, बदल सकती है पूरी पिक्चर

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नई दिल्‍ली: भारत अपने माइनिंग सेक्टर में अहम पड़ाव पर पहुंचने वाला है। आंध्र प्रदेश देश की पहली बड़े पैमाने पर निजी तौर पर विकसित सोने की खदान शुरू करने की तैयारी में है। कुरनूल जिले में जोन्‍नागिरी प्रोजेक्ट के मई में काम शुरू करने की उम्मीद है। यह भारत की आयातित सोने पर निर्भरता में एक अहम मोड़ साबित हो सकता है। सालों से भारत आयात पर बहुत ज्‍यादा निर्भर रहा है। हर साल वह 800 टन से ज्‍यादा सोना मंगाता रहा है। यह एक ऐसा खर्च है जिसका बोझ विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है।
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स्थानीय उत्पादन कम ही रहा है। इसमें हुट्टी गोल्ड माइंस हर साल सिर्फ 1.5 टन का योगदान देती है। साल 2000 में कोलार गोल्ड फील्ड्स के बंद होने से बड़े पैमाने पर माइनिंग में एक गहरा खालीपन आ गया था। जबकि सरकारी कंपनियां ज्‍यादातर विदेश में प्रोजेक्ट्स पर ही ध्यान देती रही हैं।

जियोमाइसोर सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (Geomysore Services India Pvt Ltd) की ओर से विकसित जोन्‍नागिरी प्रोजेक्ट घरेलू उत्पादन क्षमताओं को मजबूत करके इस स्थिति को बदलना शुरू कर सकता है। जोन्‍नागिरी, एर्रागुडी और पागिडीराय गांवों में लगभग 598 हेक्टेयर में यह प्रोजेक्ट फैला है। यह 400 करोड़ रुपये से ज्‍यादा का निवेश आकर्षित कर चुका है। आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू की ओर से इस खदान को औपचारिक रूप से राष्ट्र को समर्पित किए जाने की उम्मीद है।

देश में सोने का भारी आयात, कम घरेलू उत्पादनभारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोने का उपभोक्ता है। इसकी मुख्य वजह गहनों की मांग, निवेश और सांस्कृतिक परंपराएं हैं।

  • सालाना मांग: 700-800 टन
  • घरेलू उत्पादन: 1.5-3 टन
  • आयात: सालाना 700-800 टन से ज्‍यादा जिसकी कीमत अरबों डॉलर में होती है
यह असंतुलन इन चीजों पर दबाव डालता है:

  • विदेशी मुद्रा भंडार
  • व्यापार घाटा
  • रुपये की स्थिरता
  • कच्चे तेल के बाद सोना भारत की सबसे बड़ी आयातित चीजों में से एक है।

खदान में क‍ितना सोना होने का अनुमान?
आंध्र प्रदेश के खान और भूविज्ञान विभाग के प्रधान सचिव मुकेश कुमार मीणा ने इस विकास को बड़ा बदलाव लाने वाला कदम बताया। उन्‍होंने कहा, 'यह एक ऐतिहासिक पल है - न सिर्फ आंध्र प्रदेश के लिए, बल्कि भारत की व्यापक (सोने की) माइनिंग की महत्वाकांक्षाओं के लिए भी।'

इस सुविधा का प्रोसेसिंग प्लांट सिर्फ 13 महीनों में तैयार कर लिया गया, जो इस प्रोजेक्ट की रफ्तार और कुशलता को दिखाता है। त्रिवेणी अर्थमूवर्स के संस्थापक और प्रबंध निदेशक बी. प्रभाकरन ने इसके व्यापक महत्व पर जोर दिया।

उन्‍होंने कहा, 'जोन्‍नागिरी दिखाता है कि जब दूरदृष्टि, तकनीक और काम करने का तरीका एक साथ मिलते हैं तो भारत क्या हासिल कर सकता है। हम सिर्फ एक खदान नहीं बना रहे हैं, बल्कि देश में जिम्मेदार, कुशल और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी माइनिंग के लिए एक मॉडल तैयार कर रहे हैं।'

शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, यहां 13.1 टन सोने का प्रमाणित भंडार है। खोजबीन से पता चलता है कि यह बढ़कर 42.5 टन तक पहुंच सकता है। पूरी क्षमता से काम करने पर इस खदान से अगले 15 सालों तक हर साल 1,000 किलोग्राम तक शुद्ध सोना निकलने का अनुमान है।


बड़े पैमाने पर न‍िवेश आकर्ष‍ित होने की उम्‍मीद
उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि इससे भारत के माइनिंग सेक्टर में और भी ज्‍यादा निवेश आकर्षित हो सकता है।

Geomysore के डायरेक्टर और Deccan Gold के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. हनुमा प्रसाद मोडाली ने इसके व्यापक असर पर जोर दिया। उन्‍होंने बताया, 'इस प्रोजेक्ट की सफलता से कई निवेशकों को सोने और जरूरी खनिजों के सेक्टर में आने का बढ़ावा मिलना चाहिए, जो भारत के लिए अभी की सबसे बड़ी जरूरत है। चाहे वह कमर्शियल तौर पर हो या रणनीतिक तौर पर।' उन्होंने आगे कहा, 'भारत को अगले दस सालों में हर साल कम से कम 50 से 100 टन सोना पैदा करने का लक्ष्य रखना चाहिए।'

इस प्रोजेक्ट में स्थानीय इन्‍फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने के लिए भी कई पहलें शामिल हैं। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, साफ-सफाई, पीने का पानी और कौशल विकास शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट को औद्योगिक प्राथमिकताओं के साथ जोड़ने और मंजूरी दिलाने में सरकारी मदद ने अहम भूमिका निभाई है।

एक्‍सपर्ट्स ने क‍िया आगाह
हालांकि, विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि यह खदान शायद तुरंत आयात कम न कर पाए। लेकिन, यह घरेलू संसाधनों का ज्‍यादा असरदार तरीके से इस्तेमाल करने की दिशा में एक ढांचागत बदलाव को दिखाता है।

इस बीच, वर्ल्‍ड गोल्‍ड काउंसिल के मुताबिक, मार्च की शुरुआत में मौसमी रुझानों, वित्त वर्ष के आखिर के दबाव और कीमतों में उतार-चढ़ाव की वजह से सोने की मांग में कुछ समय के लिए नरमी देखी गई।

कीमतों में तेजी आने पर खरीदार पीछे हट गए। हालांकि, त्योहारों की मांग से कुछ सहारा मिला। खास बात यह है कि पुराने गहनों की अदला-बदली से 40-50 फीसदी लेन-देन हुआ, जबकि सोने की ईंटों और सिक्कों में लोगों की दिलचस्पी बनी रही।