Petrol Diesel Prices: पेट्रोल-डीजल के दाम न बढ़ाकर रोक रखा है सैलाब, हर दिन ₹1,600 करोड़ का नुकसान, भारत पर बढ़ता दबाव
नई दिल्ली: भारत में पेट्रोल पंप पर ईंधन की कीमतें अभी स्थिर दिख रही हैं। लेकिन, पर्दे के पीछे कहानी बिगड़ी हुई है। तेल कंपनियां इन कीमतों को ऐसे ही बनाए रखने के लिए भारी नुकसान उठा रही हैं। इंडस्ट्री के जानकारों के मुताबिक, सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियां (ओएमसी) मिलकर हर दिन करीब 1,600 करोड़ रुपये का नुकसान उठा रही हैं। इन कंपनियों में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड शामिल हैं।

यह ऐसे समय में हो रहा है जब 28 फरवरी को ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा है। इसके कारण कच्चे तेल की ग्लोबल कीमतें बढ़ गई हैं। वहीं, भारत में खुदरा ईंधन की कीमतें काफी हद तक जस की तस रही हैं।
ब्रेक के बिना पेट्रोल-डीजल की कीमत कितनी होती?
अगर घरेलू ईंधन की कीमतें कच्चे तेल के वैश्विक रुझानों को पूरी तरह से दर्शातीं तो मौजूदा अनुमानों के अनुसार, पेट्रोल लगभग 113 रुपये प्रति लीटर और डीजल 123 रुपये प्रति लीटर बिक रहा होता। इसके बजाय ओएमसी इस अंतर को खुद वहन कर रही हैं।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रण-मुक्त करने के बावजूद इन कंपनियों ने अप्रैल 2022 के बाद से खुदरा दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। सूत्रों के हवाले से पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, इससे नुकसान बढ़कर पेट्रोल पर लगभग 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर हो गया है।
बना हुआ है बहुत ज्यादा दबाव
मैक्वेरी ग्रुप की एक रिपोर्ट ने इस दबाव की गंभीरता का जिक्र किया। रिपोर्ट में कहा गया, '135-165 डॉलर प्रति बैरल की मौजूदा (स्पॉट) पेट्रोल-डीजल कीमतों पर हमारा अनुमान है कि भारत की तेल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर 18 रुपये और 35 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है।'
रिपोर्ट में आगे कहा गया, 'कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से मार्केटिंग में होने वाला नुकसान लगभग 6 रुपये प्रति लीटर बढ़ जाता है।'
एक समय जब कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं तो दैनिक नुकसान 2,400 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। इसके बाद यह कम होकर मौजूदा 1,600 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया।
इस राहत की बड़ी कीमतसरकार ने इस दबाव को कुछ हद तक कम करने के लिए हस्तक्षेप किया है। लेकिन, इसकी भी एक कीमत चुकानी पड़ी है।
पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क यानी एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती से ओएमसी पर पड़ने वाले बोझ को कम करने में मदद मिली। हालांकि, कंपनियों ने इस लाभ को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के बजाय अपने नुकसान की भरपाई करने के लिए इसे खुद ही रखा।
इसका मतलब है कि सरकार को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। उत्पाद शुल्क में कमी से राजस्व सीधे तौर पर घटता है। इससे राजकोषीय गुंजाइश सीमित हो जाती है।
यहां तक कि उत्पाद शुल्क को पूरी तरह से हटा देने पर भी मौजूदा नुकसान की पूरी तरह से भरपाई नहीं हो पाएगी। अनुमानित खपत के आधार पर इस तरह के कदम से सालाना करीब 36 अरब डॉलर का रेवेन्यू नुकसान हो सकता है। इससे राजकोषीय घाटा काफी बढ़ जाएगा।
क्या है भारत की मुसीबत?
आगे क्या होगा?वित्तीय दबाव ने ओएमसी के पिछले मुनाफे को पहले ही खत्म कर दिया है। उनके आने वाले तिमाही नतीजों पर भी इसका बुरा असर पड़ने की आशंका है। इस बात के भी शुरुआती संकेत मिल रहे हैं कि आगे क्या हो सकता है।
मैक्वेरी की रिपोर्ट में कहा गया है, 'हमें अप्रैल में होने वाले राज्य चुनावों के बाद पेट्रोल पंप पर कीमतें बढ़ने का जोखिम दिख रहा है।'
अभी के लिए भारतीय उपभोक्ता ग्लोबल ईंधन की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से सुरक्षित हैं। लेकिन, यह स्थिरता एक भारी और बढ़ती हुई कीमत पर मिल रही है। एक ऐसी कीमत जिसे तेल कंपनियां और सरकार दोनों ही चुपचाप उठा रहे हैं।
यह ऐसे समय में हो रहा है जब 28 फरवरी को ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा है। इसके कारण कच्चे तेल की ग्लोबल कीमतें बढ़ गई हैं। वहीं, भारत में खुदरा ईंधन की कीमतें काफी हद तक जस की तस रही हैं।
ब्रेक के बिना पेट्रोल-डीजल की कीमत कितनी होती?
अगर घरेलू ईंधन की कीमतें कच्चे तेल के वैश्विक रुझानों को पूरी तरह से दर्शातीं तो मौजूदा अनुमानों के अनुसार, पेट्रोल लगभग 113 रुपये प्रति लीटर और डीजल 123 रुपये प्रति लीटर बिक रहा होता। इसके बजाय ओएमसी इस अंतर को खुद वहन कर रही हैं।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रण-मुक्त करने के बावजूद इन कंपनियों ने अप्रैल 2022 के बाद से खुदरा दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। सूत्रों के हवाले से पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, इससे नुकसान बढ़कर पेट्रोल पर लगभग 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर हो गया है।
बना हुआ है बहुत ज्यादा दबाव
मैक्वेरी ग्रुप की एक रिपोर्ट ने इस दबाव की गंभीरता का जिक्र किया। रिपोर्ट में कहा गया, '135-165 डॉलर प्रति बैरल की मौजूदा (स्पॉट) पेट्रोल-डीजल कीमतों पर हमारा अनुमान है कि भारत की तेल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर 18 रुपये और 35 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है।'
रिपोर्ट में आगे कहा गया, 'कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से मार्केटिंग में होने वाला नुकसान लगभग 6 रुपये प्रति लीटर बढ़ जाता है।'
एक समय जब कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं तो दैनिक नुकसान 2,400 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। इसके बाद यह कम होकर मौजूदा 1,600 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया।
इस राहत की बड़ी कीमतसरकार ने इस दबाव को कुछ हद तक कम करने के लिए हस्तक्षेप किया है। लेकिन, इसकी भी एक कीमत चुकानी पड़ी है।
पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क यानी एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती से ओएमसी पर पड़ने वाले बोझ को कम करने में मदद मिली। हालांकि, कंपनियों ने इस लाभ को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के बजाय अपने नुकसान की भरपाई करने के लिए इसे खुद ही रखा।
इसका मतलब है कि सरकार को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। उत्पाद शुल्क में कमी से राजस्व सीधे तौर पर घटता है। इससे राजकोषीय गुंजाइश सीमित हो जाती है।
यहां तक कि उत्पाद शुल्क को पूरी तरह से हटा देने पर भी मौजूदा नुकसान की पूरी तरह से भरपाई नहीं हो पाएगी। अनुमानित खपत के आधार पर इस तरह के कदम से सालाना करीब 36 अरब डॉलर का रेवेन्यू नुकसान हो सकता है। इससे राजकोषीय घाटा काफी बढ़ जाएगा।
क्या है भारत की मुसीबत?
- भारत की आयातित कच्चे तेल पर भारी निर्भरता है।
- यह उसे वैश्विक कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनाता है।
- भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 88% आयात करता है।
- आयात का एक बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है।
- इसके बाद रूस और अमेरिका का नंबर है।
आगे क्या होगा?वित्तीय दबाव ने ओएमसी के पिछले मुनाफे को पहले ही खत्म कर दिया है। उनके आने वाले तिमाही नतीजों पर भी इसका बुरा असर पड़ने की आशंका है। इस बात के भी शुरुआती संकेत मिल रहे हैं कि आगे क्या हो सकता है।
मैक्वेरी की रिपोर्ट में कहा गया है, 'हमें अप्रैल में होने वाले राज्य चुनावों के बाद पेट्रोल पंप पर कीमतें बढ़ने का जोखिम दिख रहा है।'
अभी के लिए भारतीय उपभोक्ता ग्लोबल ईंधन की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से सुरक्षित हैं। लेकिन, यह स्थिरता एक भारी और बढ़ती हुई कीमत पर मिल रही है। एक ऐसी कीमत जिसे तेल कंपनियां और सरकार दोनों ही चुपचाप उठा रहे हैं।
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