LPG LNG Imports: भारत का खाड़ी देशों से संपर्क टूटा तो अमेरिका से आने लगे गैस के टैंकर, LPG और LNG भेजने में बना नंबर वन
नई दिल्ली: मई के महीने में अमेरिका भारत को लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) और लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा देश बनकर उभरा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (होर्मुज जलडमरूमध्य) में बढ़ते तनाव और यातायात बाधित होने के कारण खाड़ी देशों से भारत आने वाली खेप में भारी गिरावट आई है।
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए पहले हमले के बाद से ही इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग यानी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर संकट मंडरा रहा है। सीएनबीसी के मुताबिक भारत अपनी जरूरत का 60% एलएनजी (LNG) और लगभग पूरा एलपीजी (LPG) इसी रास्ते से आयात करता है। भारत एलपीजी का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा, कच्चे तेल का तीसरा और एलएनजी का चौथा सबसे बड़ा आयातक देश है।
आंकड़ों में अमेरिका की बढ़तऊर्जा इंटेलिजेंस फर्म केपलर (Kpler) के अनुसार भारत में अमेरिका से एलएनजी और एलपीजी का आयात बढ़ गया है।
LPG आपूर्ति
अमेरिका का बढ़ता दबदबाविशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के इस युद्ध ने अमेरिकी निर्यात को तो बढ़ावा दिया ही है, साथ ही यह भारत को अधिक अमेरिकी ऊर्जा बेचने की वाशिंगटन की व्यापक रणनीति का भी हिस्सा है। युद्ध से पहले भी दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार गहरा रहा था।
केपलर के लीड रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने बताया कि आगे चलकर भारत-अमेरिका ऊर्जा व्यापार का मुख्य फोकस गैस पर ही होगा। अमेरिका अपने प्रचुर शेल संसाधनों और बढ़ते निर्यात बुनियादी ढांचे के दम पर भारत की गैस आपूर्ति में विविधता लाने की जरूरत का फायदा उठाने के लिए बिल्कुल सही स्थिति में है।
अमेरिका को हुआ बड़ा फायदाग्लोबल ब्रोकरेज फर्म नोमुरा (Nomura) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के इस गैस सोर्सिंग शिफ्ट का सबसे बड़ा फायदा अमेरिका को हुआ है। युद्ध से पहले की तुलना में भारत को होने वाला अमेरिकी निर्यात आठ गुना बढ़ गया है।
नोमुरा इंडिया के इक्विटी रिसर्च एनालिस्ट बिनीत बांका ने कहा कि अमेरिका चाहता है कि भारत उसके साथ अपने व्यापार अधिशेष (ट्रेड सरप्लस) को कम करे और इसके लिए ऊर्जा आयात बढ़ाना सबसे अच्छा तरीका हो सकता है। उन्होंने यह भी माना कि खाड़ी देशों की तुलना में अमेरिका से एलएनजी आयात करना अधिक महंगा है, लेकिन भारत के पास फिलहाल बहुत ज्यादा विकल्प नहीं हैं।
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए पहले हमले के बाद से ही इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग यानी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर संकट मंडरा रहा है। सीएनबीसी के मुताबिक भारत अपनी जरूरत का 60% एलएनजी (LNG) और लगभग पूरा एलपीजी (LPG) इसी रास्ते से आयात करता है। भारत एलपीजी का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा, कच्चे तेल का तीसरा और एलएनजी का चौथा सबसे बड़ा आयातक देश है।
आंकड़ों में अमेरिका की बढ़तऊर्जा इंटेलिजेंस फर्म केपलर (Kpler) के अनुसार भारत में अमेरिका से एलएनजी और एलपीजी का आयात बढ़ गया है।
LPG आपूर्ति
- अमेरिका ने मई में भारत को 6,30,000 टन एलपीजी की आपूर्ति की। यह खाड़ी के सभी देशों से मिले कुल 3,80,000 टन के मुकाबले लगभग 60% अधिक है।
- एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि जून के अंत तक भारत को अमेरिकी एलपीजी की आपूर्ति 10 लाख टन का आंकड़ा पार कर जाएगी।
- अमेरिका ने मई में भारत को 9,00,000 टन एलएनजी का निर्यात किया, जो भारत की कुल जरूरत का 40% से भी अधिक है।
- अप्रैल महीने की तुलना में यह तीन गुना बड़ी उछाल है।
अमेरिका का बढ़ता दबदबाविशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के इस युद्ध ने अमेरिकी निर्यात को तो बढ़ावा दिया ही है, साथ ही यह भारत को अधिक अमेरिकी ऊर्जा बेचने की वाशिंगटन की व्यापक रणनीति का भी हिस्सा है। युद्ध से पहले भी दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार गहरा रहा था।
केपलर के लीड रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने बताया कि आगे चलकर भारत-अमेरिका ऊर्जा व्यापार का मुख्य फोकस गैस पर ही होगा। अमेरिका अपने प्रचुर शेल संसाधनों और बढ़ते निर्यात बुनियादी ढांचे के दम पर भारत की गैस आपूर्ति में विविधता लाने की जरूरत का फायदा उठाने के लिए बिल्कुल सही स्थिति में है।
अमेरिका को हुआ बड़ा फायदाग्लोबल ब्रोकरेज फर्म नोमुरा (Nomura) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के इस गैस सोर्सिंग शिफ्ट का सबसे बड़ा फायदा अमेरिका को हुआ है। युद्ध से पहले की तुलना में भारत को होने वाला अमेरिकी निर्यात आठ गुना बढ़ गया है।
नोमुरा इंडिया के इक्विटी रिसर्च एनालिस्ट बिनीत बांका ने कहा कि अमेरिका चाहता है कि भारत उसके साथ अपने व्यापार अधिशेष (ट्रेड सरप्लस) को कम करे और इसके लिए ऊर्जा आयात बढ़ाना सबसे अच्छा तरीका हो सकता है। उन्होंने यह भी माना कि खाड़ी देशों की तुलना में अमेरिका से एलएनजी आयात करना अधिक महंगा है, लेकिन भारत के पास फिलहाल बहुत ज्यादा विकल्प नहीं हैं।
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