EPF Transfer Claim: EPFO पर 50000 रुपये का जुर्माना, 10 साल तक लटकाए रखा ट्रांसफर क्लेम, कर्मचारी ने जीता केस
नई दिल्ली: एक कर्मचारी का ईपीएफ ट्रांसफर क्लेम लटकाना कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ( EPFO ) को भारी पड़ गया। चंडीगढ़ उपभोक्ता फोरम ने क्लेम में देरी को लेकर न केवल ईपीएफओ को फटकार लगाई, बल्कि तुरंत क्लेम पूरा करने और मुआवजे के तौर पर 50 हजार रुपये भी देने को कहा है। कर्मचारी का ट्रांसफर क्लेम पिछले 10 साल से अटका हुआ था, जिसे लेकर ईपीएफओ ने देरी की। इकनॉमिक टाइम्स के अनुसार आयोग ने स्पष्ट किया कि सॉफ्टवेयर की दिक्कतों या तकनीकी खराबी का बहाना बनाकर ईपीएफओ किसी कर्मचारी के फंड ट्रांसफर में एक दशक की देरी को सही नहीं ठहरा सकता।
क्या है पूरा मामला?यह मामला गर्ग का है, जिन्होंने साल 2009 में टेक महिंद्रा जॉइन की थी। साल 2010 में उन्होंने नौकरी बदलकर इंफोसिस जॉइन कर ली। इंफोसिस में उनका पीएफ अकाउंट एचआर विभाग की ओर से खोला गया था। ऐसे में उनके दो अलग-अलग पीएफ (PF) अकाउंट हो गए थे। इन दोनों अकाउंट को मर्ज करने के लिए उन्होंने सितंबर 2010 में ट्रांसफर का आवेदन दिया।
10 साल नहीं हुई कार्रवाई
कोर्ट में ईपीएफओ का कबूलनामाजुलाई 2021 में गर्ग ने उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद ईपीएफओ ने अपनी गलती स्वीकारी।
आयोग का फैसला- बहाना नहीं चलेगा16 मार्च 2026 को सुनाए गए फैसले में आयोग ने कहा कि तकनीकी खराबी कोई बहाना नहीं है। आयोग ने कहा कि करीब 10 साल की देरी के लिए सॉफ्टवेयर एरर एक कमजोर और अस्वीकार्य दलील है। ईपीएफओ इस देरी को समझाने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। आयोग ने इसे सेवा में भारी कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार माना।
मुआवजा और आदेश
क्या है पूरा मामला?यह मामला गर्ग का है, जिन्होंने साल 2009 में टेक महिंद्रा जॉइन की थी। साल 2010 में उन्होंने नौकरी बदलकर इंफोसिस जॉइन कर ली। इंफोसिस में उनका पीएफ अकाउंट एचआर विभाग की ओर से खोला गया था। ऐसे में उनके दो अलग-अलग पीएफ (PF) अकाउंट हो गए थे। इन दोनों अकाउंट को मर्ज करने के लिए उन्होंने सितंबर 2010 में ट्रांसफर का आवेदन दिया।
10 साल नहीं हुई कार्रवाई
- गर्ग के आवेदन के बावजूद वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। गर्ग ने साल 2011 में आरटीआई भी दाखिल की, लेकिन मामला लटका रहा।
- आखिरकार करीब 10 साल बाद 16 अप्रैल 2020 को ईपीएफओ ने 6.21 लाख रुपये ट्रांसफर किए। लेकिन गर्ग की गणना के अनुसार यह राशि 11.07 लाख रुपये होनी चाहिए थी।
- ईपीएफओ ने कहा कि साल 2011 से खाता इनऑपरेटिव यानी निष्क्रिय होने के कारण ब्याज नहीं दिया गया।
कोर्ट में ईपीएफओ का कबूलनामाजुलाई 2021 में गर्ग ने उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद ईपीएफओ ने अपनी गलती स्वीकारी।
- ईपीएफओ ने माना कि तकनीकी खराबी के कारण ब्याज क्रेडिट नहीं हुआ था।
- केस चलने के दौरान ईपीएफओ ने 64,841 रुपये और फिर 3.67 लाख रुपये अतिरिक्त ब्याज के रूप में गर्ग के खाते में जमा किए।
आयोग का फैसला- बहाना नहीं चलेगा16 मार्च 2026 को सुनाए गए फैसले में आयोग ने कहा कि तकनीकी खराबी कोई बहाना नहीं है। आयोग ने कहा कि करीब 10 साल की देरी के लिए सॉफ्टवेयर एरर एक कमजोर और अस्वीकार्य दलील है। ईपीएफओ इस देरी को समझाने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। आयोग ने इसे सेवा में भारी कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार माना।
मुआवजा और आदेश
- शिकायतकर्ता को मानसिक उत्पीड़न और मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में 50,000 रुपये का एकमुश्त मुआवजा दिया जाए।
- यह भुगतान 60 दिनों के भीतर करना होगा।
- अगर तय समय में भुगतान नहीं होता है तो इस राशि पर 9% वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
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