दशहरा-दिवाली से पहले लगेगा महंगाई का तड़का, खाने के तेल में 7-8% बढ़ोतरी संभव, ये है बड़ी वजह

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नई दिल्ली: दशहरा और दिवाली से पहले देश में खाने के तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। आयात लागत बढ़ने से कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में एडिबल ऑयल कंपनियां कीमतों में करीब 7-8% तक बढ़ोतरी करने पर विचार कर रही हैं। हालांकि, बेहतर सप्लाई और इंपोर्ट ड्यूटी में संभावित कटौती से बढ़ोतरी सीमित रह सकती है।

अगर कंपनियां कीमतें बढ़ाती हैं तो मार्च के बाद यह तीसरी बार होगा, जब खाने के तेल के दाम बढ़ेंगे। फाइनेंशियल एक्सप्रेस के मुताबिक इससे पहले मार्च से जून के बीच दो चरणों में कंपनियों ने करीब 5 से 6% की बढ़ोतरी की थी। इस तरह उस दौरान खाने के तेल की कीमतों में कुल 10 से 12% तक इजाफा हुआ था।
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क्यों बढ़ सकती हैं कीमतें?
  • खाने के तेल की कीमतों पर सबसे ज्यादा दबाव क्रूड एडिबल ऑयल की बढ़ती लैंडेड कॉस्ट से आ रहा है।
  • कमजोर रुपया, महंगा फ्रेट और इंश्योरेंस तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में वेजिटेबल ऑयल की ऊंची कीमतों ने कंपनियों की लागत बढ़ा दी है।
कितनी बढ़ी लैंडेड कीमत?सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के आंकड़ों के मुताबिक, 18 सितंबर को मुंबई पोर्ट पर क्रूड पाम, सोयाबीन और सनफ्लावर ऑयल की लैंडेड कीमत क्रमशः 1,265 डॉलर, 1,314 डॉलर और 1,380 डॉलर प्रति टन थी। एक साल पहले की तुलना में पाम और सोयाबीन ऑयल की कीमत करीब 11% और सनफ्लावर ऑयल की कीमत करीब 7% ज्यादा थी।

कंपनियों के पास कीमत बढ़ाने का विकल्पजानकारों के मुताबिक क्रूड एडिबल ऑयल की लैंडेड कॉस्ट में करीब 8-11% की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में कंपनियों के लिए इस बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचाना जरूरी हो सकता है। हालांकि, उन्होंने कहा कि कीमत बढ़ाने का समय और इसकी मात्रा बाजार में मांग और सप्लाई की स्थिति पर निर्भर करेगी।

इंडस्ट्री के मुताबिक आने वाले दिनों में क्रूड एडिबल ऑयल लेकर आने वाले जहाजों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है। इससे बाजार में सप्लाई और इन्वेंट्री की स्थिति बेहतर हो सकती है। अगर घरेलू बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ती है तो कंपनियों पर बढ़ी हुई अंतरराष्ट्रीय लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर डालने का दबाव कुछ कम हो सकता है।

58% से ज्यादा हिस्सा आयातभारत अपनी कुल एडिबल ऑयल जरूरत का 58% से ज्यादा हिस्सा आयात करता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों और रुपये की चाल का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। भारत में हर साल करीब 2.5-2.6 करोड़ टन खाने के तेल की खपत होती है। इसमें पाम, सोयाबीन और सनफ्लावर ऑयल की बड़ी हिस्सेदारी है।