रजिस्ट्री के 10 दिन बाद ही बेच दिया फ्लैट, फिर भी मिला LTCG का फायदा, जानिए ITAT का बड़ा फैसला
नई दिल्ली: घर या फ्लैट खरीदने वालों के लिए इनकम टैक्स से जुड़ा एक अहम फैसला आया है। इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) की सूरत बेंच ने कहा कि प्रॉपर्टी को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) माना जाएगा या शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG), यह तय करने में सिर्फ रजिस्ट्रेशन की तारीख ही जरूरी नहीं है। कुछ मामलों में फ्लैट के अलॉटमेंट लेटर की तारीख से भी होल्डिंग पीरियड की गणना की जा सकती है।

इस मामले में एक एनआरआई ने फ्लैट का रजिस्ट्रेशन होने के महज 10 दिन बाद उसे बेच दिया था। इनकम टैक्स विभाग ने बिक्री से हुए मुनाफे को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन मानकर टैक्स लगाया। हालांकि, आईटीएटी ने अलॉटमेंट की तारीख से होल्डिंग पीरियड गिनने की मांग स्वीकार कर ली। इससे करदाता को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन और उससे जुड़े टैक्स लाभ मिल सकते हैं।
क्या है पूरा मामला?यह मामला जगदीशकुमार छोटुभाई गांधी बनाम आईटीओ (International Taxation) से जुड़ा है। आईटीएटी की सूरत बेंच ने 29 सितंबर 2026 को इस पर फैसला सुनाया।
जगदीशकुमार छोटुभाई गांधी एनआरआई हैं। उन्हें रोमा बिल्डर्स ने 8 जनवरी 2011 को करीब 1.43 करोड़ रुपये में एक फ्लैट अलॉट किया था। इस कीमत में टैक्स और अन्य शुल्क शामिल नहीं थे। हालांकि, फ्लैट की रजिस्ट्री 30 सितंबर 2016 को हुई। इसके महज 10 दिन बाद यानी 10 अक्टूबर 2016 को उन्होंने फ्लैट 2.78 करोड़ रुपये में बेच दिया।
गांधी ने फ्लैट बेचने से हुए मुनाफे को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन माना। इसके लिए उन्होंने होल्डिंग पीरियड की गणना 8 जनवरी 2011 को जारी अलॉटमेंट लेटर की तारीख से की। दूसरी ओर, इनकम टैक्स अधिकारी ने होल्डिंग पीरियड रजिस्ट्री की तारीख से गिना और मुनाफे को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन माना।
ITAT ने क्यों दी राहत?इनकम टैक्स विभाग ने दो मामलों में टैक्स जोड़ा था। पहला, फ्लैट बेचने से हुए करीब 68.12 लाख रुपये के मुनाफे को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन मानना। दूसरा, फ्लैट की खरीद कीमत और स्टांप ड्यूटी के लिए तय कीमत के अंतर पर करीब 45.79 लाख रुपये का टैक्स जोड़ना। इन दोनों बदलावों के बाद गांधी की टैक्स योग्य आय करीब 1.28 करोड़ रुपये हो गई थी। उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी।
आईटीएटी ने कहा कि यह तय करने के लिए कि कोई प्रॉपर्टी लॉन्ग टर्म है या शॉर्ट टर्म, यह देखना जरूरी है कि करदाता ने उस संपत्ति पर अधिकार कब हासिल किया था। सिर्फ रजिस्ट्री की तारीख के आधार पर होल्डिंग पीरियड तय करना सही नहीं है।
ट्रिब्यूनल ने माना कि गांधी को 8 जनवरी 2011 को अलॉटमेंट लेटर मिलने और भुगतान किए जाने के आधार पर फ्लैट में अधिकार मिल गए थे। इस तरह होल्डिंग पीरियड 36 महीने से ज्यादा था। इसलिए फ्लैट को लॉन्ग टर्म कैपिटल एसेट माना गया।
आईटीएटी ने टैक्स विभाग को निर्देश दिया कि मुनाफे को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन माना जाए और कानून के मुताबिक इंडेक्सेशन तथा इनकम टैक्स एक्ट की धारा 54 के तहत मिलने वाली छूट पर विचार किया जाए।
स्टांप ड्यूटी की कीमत पर भी उठा विवादइस मामले में दूसरा विवाद फ्लैट की खरीद कीमत और स्टांप ड्यूटी के लिए तय कीमत के अंतर को लेकर था। गांधी ने फ्लैट करीब 1.432 करोड़ रुपये में खरीदा था, जबकि सितंबर 2016 में रजिस्ट्री के समय स्टांप ड्यूटी के लिए इसकी कीमत करीब 1.89 करोड़ रुपये तय की गई। इनकम टैक्स अधिकारी ने दोनों कीमतों के बीच करीब 45.79 लाख रुपये के अंतर को टैक्स योग्य आय में जोड़ दिया।
गांधी का कहना था कि कीमत की तुलना 2016 में रजिस्ट्री के समय की स्टांप ड्यूटी वैल्यू से नहीं, बल्कि 8 जनवरी 2011 को अलॉटमेंट के समय लागू वैल्यू से की जानी चाहिए। उस समय खरीद की कीमत तय हो गई थी और भुगतान भी बैंक के जरिए किया गया था।
ITAT ने इस दलील को सिद्धांत रूप में स्वीकार किया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि अलॉटमेंट लेटर में प्रॉपर्टी की पहचान और कीमत स्पष्ट हो तथा भुगतान बैंकिंग माध्यम से किया गया हो, तो कुछ शर्तों के तहत उसे संबंधित टैक्स प्रावधान के लिए एग्रीमेंट माना जा सकता है।
हालांकि, ट्रिब्यूनल ने 45.79 लाख रुपये की पूरी टैक्स बढ़ोतरी को खत्म नहीं किया। उसने मामले को दोबारा जांच के लिए टैक्स अधिकारी के पास भेज दिया। अधिकारी को 8 जनवरी 2011 की स्टांप ड्यूटी वैल्यू के आधार पर दोबारा गणना करनी होगी। इसके बाद ही तय होगा कि कोई रकम टैक्स के दायरे में आती है या नहीं।
इस मामले में एक एनआरआई ने फ्लैट का रजिस्ट्रेशन होने के महज 10 दिन बाद उसे बेच दिया था। इनकम टैक्स विभाग ने बिक्री से हुए मुनाफे को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन मानकर टैक्स लगाया। हालांकि, आईटीएटी ने अलॉटमेंट की तारीख से होल्डिंग पीरियड गिनने की मांग स्वीकार कर ली। इससे करदाता को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन और उससे जुड़े टैक्स लाभ मिल सकते हैं।
क्या है पूरा मामला?यह मामला जगदीशकुमार छोटुभाई गांधी बनाम आईटीओ (International Taxation) से जुड़ा है। आईटीएटी की सूरत बेंच ने 29 सितंबर 2026 को इस पर फैसला सुनाया।
जगदीशकुमार छोटुभाई गांधी एनआरआई हैं। उन्हें रोमा बिल्डर्स ने 8 जनवरी 2011 को करीब 1.43 करोड़ रुपये में एक फ्लैट अलॉट किया था। इस कीमत में टैक्स और अन्य शुल्क शामिल नहीं थे। हालांकि, फ्लैट की रजिस्ट्री 30 सितंबर 2016 को हुई। इसके महज 10 दिन बाद यानी 10 अक्टूबर 2016 को उन्होंने फ्लैट 2.78 करोड़ रुपये में बेच दिया।
गांधी ने फ्लैट बेचने से हुए मुनाफे को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन माना। इसके लिए उन्होंने होल्डिंग पीरियड की गणना 8 जनवरी 2011 को जारी अलॉटमेंट लेटर की तारीख से की। दूसरी ओर, इनकम टैक्स अधिकारी ने होल्डिंग पीरियड रजिस्ट्री की तारीख से गिना और मुनाफे को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन माना।
ITAT ने क्यों दी राहत?इनकम टैक्स विभाग ने दो मामलों में टैक्स जोड़ा था। पहला, फ्लैट बेचने से हुए करीब 68.12 लाख रुपये के मुनाफे को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन मानना। दूसरा, फ्लैट की खरीद कीमत और स्टांप ड्यूटी के लिए तय कीमत के अंतर पर करीब 45.79 लाख रुपये का टैक्स जोड़ना। इन दोनों बदलावों के बाद गांधी की टैक्स योग्य आय करीब 1.28 करोड़ रुपये हो गई थी। उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी।
आईटीएटी ने कहा कि यह तय करने के लिए कि कोई प्रॉपर्टी लॉन्ग टर्म है या शॉर्ट टर्म, यह देखना जरूरी है कि करदाता ने उस संपत्ति पर अधिकार कब हासिल किया था। सिर्फ रजिस्ट्री की तारीख के आधार पर होल्डिंग पीरियड तय करना सही नहीं है।
ट्रिब्यूनल ने माना कि गांधी को 8 जनवरी 2011 को अलॉटमेंट लेटर मिलने और भुगतान किए जाने के आधार पर फ्लैट में अधिकार मिल गए थे। इस तरह होल्डिंग पीरियड 36 महीने से ज्यादा था। इसलिए फ्लैट को लॉन्ग टर्म कैपिटल एसेट माना गया।
आईटीएटी ने टैक्स विभाग को निर्देश दिया कि मुनाफे को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन माना जाए और कानून के मुताबिक इंडेक्सेशन तथा इनकम टैक्स एक्ट की धारा 54 के तहत मिलने वाली छूट पर विचार किया जाए।
स्टांप ड्यूटी की कीमत पर भी उठा विवादइस मामले में दूसरा विवाद फ्लैट की खरीद कीमत और स्टांप ड्यूटी के लिए तय कीमत के अंतर को लेकर था। गांधी ने फ्लैट करीब 1.432 करोड़ रुपये में खरीदा था, जबकि सितंबर 2016 में रजिस्ट्री के समय स्टांप ड्यूटी के लिए इसकी कीमत करीब 1.89 करोड़ रुपये तय की गई। इनकम टैक्स अधिकारी ने दोनों कीमतों के बीच करीब 45.79 लाख रुपये के अंतर को टैक्स योग्य आय में जोड़ दिया।
गांधी का कहना था कि कीमत की तुलना 2016 में रजिस्ट्री के समय की स्टांप ड्यूटी वैल्यू से नहीं, बल्कि 8 जनवरी 2011 को अलॉटमेंट के समय लागू वैल्यू से की जानी चाहिए। उस समय खरीद की कीमत तय हो गई थी और भुगतान भी बैंक के जरिए किया गया था।
ITAT ने इस दलील को सिद्धांत रूप में स्वीकार किया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि अलॉटमेंट लेटर में प्रॉपर्टी की पहचान और कीमत स्पष्ट हो तथा भुगतान बैंकिंग माध्यम से किया गया हो, तो कुछ शर्तों के तहत उसे संबंधित टैक्स प्रावधान के लिए एग्रीमेंट माना जा सकता है।
हालांकि, ट्रिब्यूनल ने 45.79 लाख रुपये की पूरी टैक्स बढ़ोतरी को खत्म नहीं किया। उसने मामले को दोबारा जांच के लिए टैक्स अधिकारी के पास भेज दिया। अधिकारी को 8 जनवरी 2011 की स्टांप ड्यूटी वैल्यू के आधार पर दोबारा गणना करनी होगी। इसके बाद ही तय होगा कि कोई रकम टैक्स के दायरे में आती है या नहीं।
Next Story