Supertanker Demand: ईरान युद्ध के बीच धड़ाधड़ सुपरटैंकर बनवा रहे हैं दुनियाभर के देश, पहले कभी नहीं दिखी ऐसी डिमांड

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नई दिल्ली: ईरान युद्ध के कारण दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई टाइट हुई है। दुनिया के कई देशों में हाहाकार मचा है। इस अनुभव को देखते हुए दुनिया के कई देश अब अपना रिजर्व बढ़ाना चाहते हैं। यही वजह है कि दुनिया में सुपरटैंकर की डिमांड ऑल टाइम हाई पर पहुंच गई है। दुनिया भर के शिपयार्ड्स में इस समय रेकॉर्ड 262 सुपरटैंकर्स बन रहे हैं। इनमें से हर टैंकर 2 मिलियन बैरल कच्चा तेल ले जाने में सक्षम है।
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दो साल पहले की तुलना में सुपरटैंकर की डिमांड में 1000 फीसदी तेजी आई है। इससे पहले अक्तूबर 2008 में ऐसा देखने को मिला था जब दुनिया के विभिन्न शिपयार्ड्स में 255 सुपरटैंकर बनाए जा रहे थे। उसके बाद बाजार में सप्लाई बढ़ गई थी और फ्रेट रेट में गिरावट आई थी। इससे टैंकर कंपनियों के रेवेन्यू में भी गिरावट आई थी। लेकिन एक बार फिर पश्चिम एशिया संकट के कारण तेल की सप्लाई में बाधा आई है और शिपिंग कंपनियां इस मौके का फायदा उठाना चाहती हैं।


तीन देशों का दबदबा
सुपरटैंकर को वेरी लार्ज क्रूड कैरियर्स (VLCCs) और अल्ट्रा लार्ज क्रूड कैरियर्स (ULCCs) कहा जाता है। दुनिया में इस तरह के टैंकर बनाने में पूर्वी एशिया के तीन देशों चीन, साउथ कोरिया और जापान का दबदबा है। दुनिया में इन तीन देशों की 70 फीसदी हिस्सेदारी है। टैंकर ओनरशिप और कंस्ट्रक्शन वॉल्यूम के मामले में चीन दुनिया में नंबर 1 है। चीन की कंपनियां बड़े पैमाने पर तेजी से ऐसे सुपरटैंकर बनाने के लिए जानी जाती हैं।

इसी तरह साउथ कोरिया की कंपनियां भी एंडवांस्ड और स्पेशलाइज्ड टैंकर बनाने के लिए मशहूर हैं। इनमें सैमसंग हेवी इंडस्ट्रीज, Hanwha Ocean और एचडी हुंडई हेवी इंडस्ट्रीज शामिल हैं। ये कंपनियां दुनिया के सबसे बड़े और आधुनिक सुपरटैंकर बनाने में एक्सपर्ट हैं। जापान के शिपयार्ड हाइली एफिशंट, ड्यूरेबल डिजाइन और प्रिसाइज इंजीनियरिंग के लिए जाने जाते हैं।