Rupee Falling: 'रुपये को कमजोर होने देना RBI का सही फैसला', अर्थशास्त्री अहलूवालिया ने क्यों किया केंद्रीय बैंक का समर्थन?

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नई दिल्ली: पिछले काफी समय से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में गिरावट बनी हुई है। मंगलवार को भी इसमें गिरावट आई। इस बीच अर्थशास्त्री और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने रुपये की गिरावट को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक ( RBI ) का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि वैश्विक दबावों के बीच आरबीआई द्वारा रुपये को कमजोर होने देना बिल्कुल सही कदम था। अहलूवालिया के मुताबिक, हर कीमत पर करेंसी का बचाव करने के बजाय विनिमय दर (Exchange Rate) में बाजार की वास्तविकताओं की झलक दिखनी चाहिए।
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यह बयान ऐसे समय में आया है जब कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, विदेशी निवेशकों (FIIs) की बिकवाली और ईरान संघर्ष से जुड़ी अनिश्चितता के कारण हाल ही में रुपया डॉलर के मुकाबले 97 रुपये के स्तर के करीब पहुंच गया था। हालांकि, पिछले कुछ सत्रों में कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी के बाद रुपये में मामूली सुधार देखा गया है। लेकिन आज मंगलवार को शुरुआती कारोबार में इसमें फिर गिरावट आई।


क्या बोले अहलूवालिया?इंडिया टुडे के मुताबिक एक इंटरव्यू में मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा, 'भारत पर बढ़ते बाहरी दबावों और विदेशी पूंजी के प्रवाह में आई कमी को देखते हुए रुपये का कमजोर होना काफी हद तक अपरिहार्य (Unavoidable) था। प्रतिकूल बाजार स्थितियों में एक्सचेंज रेट का थोड़ा गिरना स्वाभाविक है।'

कमजोर रुपये को लेकर यह दिया तर्कअहलूवालिया ने तर्क दिया कि रुपये का कमजोर होना अर्थव्यवस्था के लिए पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। मध्यम अवधि में कमजोर रुपया भारतीय निर्यात को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद करता है।

उनका यह बयान उन अर्थशास्त्रियों के बीच चल रही बहस के बीच आया है जो मानते हैं कि आरबीआई को ब्याज दरों में बढ़ोतरी या भारी डॉलर बेचकर रुपये को आक्रामक तरीके से बचाना चाहिए। कई जानकारों का अब मानना है कि बाहरी झटकों के समय किसी एक निश्चित स्तर पर रुपये को बचाए रखना टिकाऊ नहीं है।

रुपये पर दबाव बढ़ने के मुख्य कारण
  • पश्चिम एशिया के तनाव के कारण कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें तेजी से बढ़ीं, जिसने भारत के आयात बिल और महंगाई की चिंता को बढ़ा दिया। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का करीब 88% हिस्सा आयात करता है।
  • वैश्विक अनिश्चितता और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय बाजारों से तेजी से पैसा निकाला है।

विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दी रायविदेशी मुद्रा भंडार को लेकर भी अहलूवालिया ने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा, 'लंबे समय तक हमारा चालू खाता घाटा विदेशी पूंजी के दम पर आसानी से मैनेज हो रहा था, लेकिन पिछले दो साल में यह पूंजी आनी कम हो गई है। इस गैप को भरने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार को लगातार खाली करना एक अच्छा विचार नहीं है। इसलिए एक्सचेंज रेट पर थोड़ा असर पड़ना तय था।'