'ब्रिक्‍स को भूलकर अमेरिका-यूरोप को देखिए', दिग्‍गज अर्थशास्‍त्री ने पूछा- ग्रुप से भारत को क्या फायदा हुआ

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नई दिल्‍ली: भारत को ब्रिक्‍स को छोड़कर पश्चिम की ओर यानी यूरोप और अमेरिका की ओर देखना चाहिए। यह तर्क अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने दिया है। वह भारत के पहले आधिकारिक 'घरेलू आय सर्वेक्षण' के लिए बनी टेक्निकल एक्सपर्ट ग्रुप के चेयरमैन हैं। उन्होंने कहा कि उनकी बात सिर्फ इस बारे में नहीं है कि ब्रिक्‍स ग्रुप से भारत को क्या फायदा हुआ है। इसके बजाय इस बारे में भी है कि यह ग्रुप अब कैसा बन गया है।
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'द इंडियन एक्सप्रेस' के लिए लिखे एक लेख में भल्ला ने पूछा, 'यह पूछने का सही समय है: 17 सालों की समिट में मेंबरशिप से भारत को क्या मिला?' यह लेख ऐसे समय में आया है जब ब्रिक्‍स नेता BRICS समिट 2026 में शामिल होने के लिए राजधानी में जमा हुए हैं।

आंकड़ों से अपने तर्क को समझायाउन्होंने तर्क दिया कि अमेरिका हमारे सामान के एक्सपोर्ट का पांचवां हिस्सा है। सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट में आधे से ज्‍यादा हिस्सेदारी उसी की है। वह हमारे रेमिटेंस (विदेश से आने वाली कमाई) का 28 फीसदी भेजता है। भारत की 390 अरब डॉलर की सिक्योरिटीज अपने पास रखता है। भारत में उसने लगभग 100 अरब डॉलर का डायरेक्ट इंवेस्‍टमेंट किया है।

इसकी तुलना में चीन ने भारत में 2.5 अरब डॉलर का निवेश किया है। 2025-26 में उसका भारत के साथ व्यापार घाटा रिकॉर्ड 112 अरब डॉलर रहा। जबकि रूस ने भारत को 47 अरब डॉलर का तेल बेचा। कुल मिलाकर सिर्फ 4.9 अरब डॉलर का सामान खरीदा।

भल्ला ने कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन ने हमारे 'रेअर अर्थ मैग्‍नेट' की सप्लाई भी रोकी थी। हमारे iPhone प्लांट से फॉक्सकॉन के इंजीनियरों को वापस बुला लिया था।

अमेरिका और यूरोप की तरफ बढ़ने की सलाह दीइसके बाद जाने-माने अर्थशास्‍त्री ने पूछा कि भारत को क्या करना चाहिए। उन्होंने लेख में लिखा, 'ब्रिक्‍स को भूल जाइए। हमारा भविष्य पश्चिम- यूरोप और अमेरिका- के ग्लोबल पार्टनर के तौर पर है। और ध्यान दीजिए, याद रखिए, अगर भारत अमेरिका के साथ ट्रेड डील नहीं करता है तो किसे फायदा होगा।'

भल्‍ला ने यह भी कहा कि चीन और रूस दो सबसे बड़े पार्टनर हैं। उनसे जुड़े दो बड़े सवाल भी हैं। इनका कोई जवाब नहीं मिला है। रूस-यूक्रेन युद्ध और कोरोना वायरस की शुरुआत और चीन की आक्रामक व्यापार नीति पर बीजिंग की चुप्पी।

याद दिलाई ये बातेंभल्ला ने अपने लेख में बताया कि जुलाई 2025 के रियो डिक्लेरेशन में चीन और रूस ने मांग की थी कि ब्राजील और भारत संयुक्‍त राष्‍ट्र और सिक्योरिटी काउंसिल में बड़ी भूमिका निभाएं। लेकिन, उन्होंने तर्क दिया कि यह अब एक पुरानी घिसी-पिटी बात हो गई है। चीन और रूस अभी भी ब्राजील और भारत के लिए बड़ी भूमिका की मांग कर रहे हैं, न कि उनकी उम्मीदवारी की।

उन्होंने तर्क दिया कि भारत ने ब्रिक्‍स देशों की ओर से स्थापित मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंक 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' के सभी सदस्यों के लिए लगभग 40 अरब डॉलर देने का वादा किया है। IMF के 2014 के जवाब 'कंटिंजेंट रिजर्व अरेंजमेंट' के लिए अतिरिक्त 18 अरब डॉलर देने का भी वचन दिया है। उन्होंने कहा कि 11 सालों में किसी भी सदस्य ने एक डॉलर भी नहीं निकाला है।

चीन से कोई नहीं कर रहा है सवालभल्ला ने लिखा, 'एक दशक की कीमत: ऐसी बैंक में फंसी पूंजी जो बड़े पैमाने पर कर्ज नहीं देती और ऐसा इंश्योरेंस प्रीमियम जिसका किसी ने दावा नहीं किया।'

उन्होंने कहा कि मर्केंटाइलवाद (व्यापारिक संरक्षणवाद) बहुत बढ़ गया है। कम आंकी गई मुद्रा (अंडरवैल्‍यूड करेंसी) में कोई सुधार नहीं हुआ है।

भल्‍ला ने लिखा, 'अधिक आंकी गई करेंसी (ओवरवैल्‍यूड करेंसी) खुद को ठीक कर लेती है क्योंकि घाटे को पूरा करना होता है। अंडरवैल्‍यूड करेंसी को कभी ठीक होने की जरूरत नहीं पड़ती। ब्रिक्‍स ने चीन से कभी यह सवाल नहीं पूछा और भारत की अध्यक्षता वाले शिखर सम्मेलन में भी यह सवाल नहीं पूछेगा। हम वहां अपनी बात मनवाने के लिए नहीं हैं। हम वहां सिर्फ दिखावे के लिए हैं।'

जुलाई 2026 से विश्व बैंक की आय सीमा 14,375 डॉलर होगी। 2024 में रूस की प्रति व्यक्ति आय 15,330 डॉलर, ब्राजील की 9,930 डॉलर, दक्षिण अफ्रीका की 6,110 डॉलर और चीन की 13,660 डॉलर थी। लेकिन, भारत की आय केवल 2,550 डॉलर है।

उन्होंने कहा, 'भारत की आय 2,550 डॉलर है। 2047 तक विकसित होने के लिए उसे डॉलर में प्रति व्यक्ति आय हर साल लगभग 10 फीसदी बढ़ानी होगी। पिछले 11 सालों में हम 4.9 फीसदी ही बढ़ा पाए हैं। जिन देशों ने वह किया है जो हम करने की कोशिश कर रहे हैं, वे उस कमरे में नहीं हैं। इनमें कोरिया, पोलैंड, वियतनाम (जो अभी आगे बढ़ रहा है) शामिल हैं।'