EU के साथ रूस का लफड़ा, भारत समेत 18 देशों ने खोले नहीं हैं पत्ते, WTO में पूरा मामला
नई दिल्ली: रूस ने यूरोपियन यूनियन (EU) के खिलाफ वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) में एक ट्रेड विवाद दर्ज कराया है। यह ' कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म ' (CBAM) को लेकर है। इस मामले की कार्यवाही में शामिल होने के लिए भारत ने अमेरिका, ब्रिटेन और चीन जैसे 17 अन्य देशों के साथ अपने 'थर्ड-पार्टी राइट्स' सुरक्षित रखे हैं। WTO की 'डिस्प्यूट सेटलमेंट बॉडी' (DSB) इस मुद्दे पर फैसला करने के लिए एक पैनल बनाने पर सहमत हो गई है।

नाम न बताने की शर्त पर एक अधिकारी ने कहा, 'DSB शुक्रवार को हुई अपनी बैठक में रूस के अनुरोध पर सहमत हो गया। इसमें CBAM पैकेज और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन अलाउंस की ट्रेडिंग के लिए EU की स्कीम के तहत एक्सपोर्ट सब्सिडी की समीक्षा के लिए पैनल बनाने की मांग की गई थी।'
रूस का ये है आरोपरूस का आरोप है कि CBAM EU में आयात होने वाले खास सामानों के लिए व्यापार में बड़ी रुकावटें पैदा करता है। यह WTO के नियमों के खिलाफ है।
साथ ही, रूस का कहना है कि 'एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम' के तहत कुछ कंपनियों को EU की ओर से अलाउंस का आवंटन असल में एक एक्सपोर्ट सब्सिडी है। इसका मकसद कुछ घरेलू उद्योगों की कॉम्पिटिटिवनेस (प्रतिस्पर्धा क्षमता) को बढ़ाना है।
भारत कर रहा इस मसले पर कामEU के साथ अपने ट्रेड एग्रीमेंट के तहत भारत CBAM वेरिफिकेशन के लिए घरेलू क्षमता बनाने के लिए इस ब्लॉक के साथ काम कर रहा है। इसमें कम से कम 10 भारतीय वेरिफिकेशन एजेंसियों को मान्यता देना शामिल है। इसके लिए पहले ही छह आवेदन जमा किए जा चुके हैं।
भारत अपनी 'कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम' पर भी काम कर रहा है। EU के साथ कार्बन की कीमत तय करने (कार्बन प्राइसिंग) पर बातचीत जारी है। EU का CBAM 1 जनवरी से लागू हो गया।
क्या है CBAM, क्यों हो रहा विरोध?EU की ओर से लाया गया 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) एक कार्बन टैक्स है। इसे उन आयातित सामानों (जैसे स्टील, सीमेंट, एल्युमीनियम) पर लगाया जाता है जिनके उत्पादन में ज्यादा कार्बन यानी प्रदूषण होता है।
भारत समेत तमाम देश इसका विरोध इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उनका मानना है कि यह पर्यावरण की आड़ में पश्चिमी देशों की ओर से व्यापार को सुरक्षित रखने का एक हथकंडा है। इससे उनके निर्यात महंगे हो जाएंगे। विकासशील देशों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा।
नाम न बताने की शर्त पर एक अधिकारी ने कहा, 'DSB शुक्रवार को हुई अपनी बैठक में रूस के अनुरोध पर सहमत हो गया। इसमें CBAM पैकेज और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन अलाउंस की ट्रेडिंग के लिए EU की स्कीम के तहत एक्सपोर्ट सब्सिडी की समीक्षा के लिए पैनल बनाने की मांग की गई थी।'
रूस का ये है आरोपरूस का आरोप है कि CBAM EU में आयात होने वाले खास सामानों के लिए व्यापार में बड़ी रुकावटें पैदा करता है। यह WTO के नियमों के खिलाफ है।
साथ ही, रूस का कहना है कि 'एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम' के तहत कुछ कंपनियों को EU की ओर से अलाउंस का आवंटन असल में एक एक्सपोर्ट सब्सिडी है। इसका मकसद कुछ घरेलू उद्योगों की कॉम्पिटिटिवनेस (प्रतिस्पर्धा क्षमता) को बढ़ाना है।
भारत कर रहा इस मसले पर कामEU के साथ अपने ट्रेड एग्रीमेंट के तहत भारत CBAM वेरिफिकेशन के लिए घरेलू क्षमता बनाने के लिए इस ब्लॉक के साथ काम कर रहा है। इसमें कम से कम 10 भारतीय वेरिफिकेशन एजेंसियों को मान्यता देना शामिल है। इसके लिए पहले ही छह आवेदन जमा किए जा चुके हैं।
भारत अपनी 'कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम' पर भी काम कर रहा है। EU के साथ कार्बन की कीमत तय करने (कार्बन प्राइसिंग) पर बातचीत जारी है। EU का CBAM 1 जनवरी से लागू हो गया।
क्या है CBAM, क्यों हो रहा विरोध?EU की ओर से लाया गया 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) एक कार्बन टैक्स है। इसे उन आयातित सामानों (जैसे स्टील, सीमेंट, एल्युमीनियम) पर लगाया जाता है जिनके उत्पादन में ज्यादा कार्बन यानी प्रदूषण होता है।
भारत समेत तमाम देश इसका विरोध इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उनका मानना है कि यह पर्यावरण की आड़ में पश्चिमी देशों की ओर से व्यापार को सुरक्षित रखने का एक हथकंडा है। इससे उनके निर्यात महंगे हो जाएंगे। विकासशील देशों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा।
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