'100 ताबूत बनवाए, 99 भ्रष्ट अफसरों और 1 अपने लिए', झू रोंगजी ने चीन में जो किया, वो भारत में मनमोहन सिंह नहीं कर पाए
नई दिल्ली: उसके बारे में कहा जाता था कि उसने 100 ताबूत तैयार करवा रखे थे। इसमें से 99 ताबूत भ्रष्ट अफसरों और एक खुद के लिए बनवा रखा था। वह फैसले लेने में बेहद सख्त था, जिसके जुनून ने चीन को अमेरिका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बना दिया। यह कहानी है चीन के एक पूर्व प्रधानमंत्री और विकास के सूत्रधार झू रोंगजी की, जिनका हाल ही में 97 साल की उम्र में बीमारी से निधन हो गया। चीन के इस दूरदर्शी नेता ने 1990 के दशक में सरकारी उद्योगों में बड़े बदलाव करके और देश को विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शामिल कराकर चीन में जबरदस्त आर्थिक तेजी लाने में मदद की थी। वहीं, भारत में नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए और बाद में प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह ने भी नब्बे के दशक में आर्थिक सुधारों की शुरुआत कर बड़ा कदम उठाया था। मगर, इन सुधारों की बदौलत चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन गया और भारत अब भी आर्थिक सुधारों के बीच फंसा हुआ है।

झू रोंगजी: चीन को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनायाझू रोंगजी जब प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने 1998 से 2003 के बीच चीन के लिए कई बड़े बदलाव किए। सरकारी कंपनियों को कुशल और लाभदायक बनाने की कोशिशों के दौरान झू का टकराव कम्युनिस्ट पार्टी के रूढ़िवादी नेताओं और सरकारी उद्योगों के प्रमुखों से हुआ। इससे लाखों लोगों की नौकरी चली गई, लेकिन इन बदलावों ने चीन को जापान से आगे निकलकर अमेरिका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने में मदद की।
झू रोंगजी ने चीन में ऐसा क्या चमत्कार किया1998 में 69 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने के बाद झू ने सरकारी गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार की आलोचना करके और सरकार की नाकामियों की जिम्मेदारी खुद लेकर लोकप्रियता हासिल की। उनके सख्त अंदाज के कारण उन्हें 'बॉस' और 'झू फेंगजी (यानी पागल झू)' जैसे उपनाम मिले। पार्टी के अख़बार 'पीपुल्स डेली' के अनुसार, 1998 में झू ने कहा था, 'मैंने यहां 100 ताबूत तैयार किए हैं। 99 भ्रष्ट अधिकारियों के लिए और एक अपने लिए।'
WTO की सदस्यता और कहां पहुंच गया चीन
झू रोंगजी बनाम मनमोहन सिंह: अलग-अलग सोच
झू रोंगजी बनाम मनमोहन सिंह की नीतियों की तुलना
WTO वाले दांव में भारत से आगे निकला चीन
झू ने चीन में घर के मालिकाना हक के दौर की शुरुआत
अर्थव्यवस्था के निजीकरण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई
झू रोंगजी: चीन को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनायाझू रोंगजी जब प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने 1998 से 2003 के बीच चीन के लिए कई बड़े बदलाव किए। सरकारी कंपनियों को कुशल और लाभदायक बनाने की कोशिशों के दौरान झू का टकराव कम्युनिस्ट पार्टी के रूढ़िवादी नेताओं और सरकारी उद्योगों के प्रमुखों से हुआ। इससे लाखों लोगों की नौकरी चली गई, लेकिन इन बदलावों ने चीन को जापान से आगे निकलकर अमेरिका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने में मदद की।
झू रोंगजी ने चीन में ऐसा क्या चमत्कार किया1998 में 69 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने के बाद झू ने सरकारी गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार की आलोचना करके और सरकार की नाकामियों की जिम्मेदारी खुद लेकर लोकप्रियता हासिल की। उनके सख्त अंदाज के कारण उन्हें 'बॉस' और 'झू फेंगजी (यानी पागल झू)' जैसे उपनाम मिले। पार्टी के अख़बार 'पीपुल्स डेली' के अनुसार, 1998 में झू ने कहा था, 'मैंने यहां 100 ताबूत तैयार किए हैं। 99 भ्रष्ट अधिकारियों के लिए और एक अपने लिए।'
WTO की सदस्यता और कहां पहुंच गया चीन
- पूर्व नेता डेंग जियाओपिंग के 1979 के सुधारों को आगे बढ़ाते हुए झू रोंगजी ने चीन को वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (WTO) की सदस्यता दिलवाई। यह कम्युनिस्ट चीन जैसे देश के लिए ऐतिहासिक बदलाव था।
- झू रोंगजी को जरूरी सूझबूझ और दृढ़ता दिखाने का श्रेय दिया जाता है। इन बदलावों ने चीन को दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक बनाने में मदद की। इन बदलावों की बदौलत 2000 से 2010 के बीच आर्थिक विकास दर सालाना 8% से ऊपर बनी रही और 2007 में यह 14.2% के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।
झू रोंगजी बनाम मनमोहन सिंह: अलग-अलग सोच
- झू रोंगजी सख्त मिजाज टेक्नोक्रेट और बेसब्र, तीखी जुबान वाले सुधारक माने जाते हैं। उन्होंने सरकारी कंपनियों (SOEs) से लाखों कर्मचारियों को हटाने के लिए सख्ती का रास्ता अपनाया। वैसे भी चीन कम्युनिस्ट देश है।
- वहीं, मनमोहन सिंह शांत स्वभाव के विद्वान थे। उनके 1991 के सुधारों ने भारत की लोकतांत्रिक सहमति और धीरे-धीरे बदलाव की प्रक्रिया के जरिए 'लाइसेंस राज' को खत्म किया, जिसमें गठबंधन की राजनीति और जनमत की सीमाएं भी थीं।
झू रोंगजी बनाम मनमोहन सिंह की नीतियों की तुलना
- झू रोंगजी का सबसे विवादित कदम चीन के बड़े सरकारी उद्योगों का कठोर पुनर्गठन था। चीन ने देश की बड़ी कंपनियों की बागडोर थामे रखी और छोटी कंपनियों को छोड़ दिया। झू ने हजारों छोटी सरकारी कंपनियों को फेल होने या प्राइवेट होने दिया। इससे बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरियां गईं, लेकिन एक ज्यादा कुशल और प्रतिस्पर्धी माहौल बना।
- वहीं, मनमोहन सिंह ने धीरे-धीरे विनिवेश को प्राथमिकता दी। अक्सर पूरी तरह प्राइवेट करने के बजाय माइनॉरिटी हिस्सेदारी (कम हिस्सेदारी) बेची जाती है और पुरानी सरकारी कंपनियों (PSUs) को नौकरियों को बचाने के लिए बनाए रखा जाता है।
WTO वाले दांव में भारत से आगे निकला चीन
- झू रोंगजी ने 2001 में चीन को WTO में शामिल कराने के लिए अपनी साख दांव पर लगा दी थी। उन्होंने विदेशी कंपनियों से मुकाबले के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को खोलने के मकसद से कई मुश्किल समझौते किए। झू ने WTO के बाहरी दबाव को एक ऐसे 'हथौड़े' की तरह देखा, जिसकी जरूरत घरेलू उद्योगों को या तो आधुनिक बनाने या फिर खत्म हो जाने के लिए थी। इसी से चीन के एक्सपोर्ट-आधारित विकास का रास्ता खुला।
- वहीं, भारत WTO का संस्थापक सदस्य होने के बावजूद हमेशा बचाव की मुद्रा में रहा है। उसने घरेलू खेती और उद्योगों को ग्लोबल कॉम्पिटिशन से बचाने की कोशिश की है। ऐसे में झू के जोखिम भरे दांव के चलते चीनी कंपनियों को ग्लोबल चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मगर, आखिरकार उन्हें भारत के ज्यादा सुरक्षित उद्योगों की तुलना में ज्यादा मजबूत बनाया। यह भारत की मौजूदा 'आत्मनिर्भर भारत' की कोशिश और दुनिया के साथ जुड़ने के बीच के तालमेल को दिखाता है।
झू ने चीन में घर के मालिकाना हक के दौर की शुरुआत
- झू ने 1998 में सरकारी कंपनियों के स्वामित्व वाले अपार्टमेंट बेचने की पहल के साथ चीन में घर के मालिकाना हक के दौर की शुरुआत की। परिवारों ने घर खरीदने में दिलचस्पी दिखाई और एक दशक के भीतर ही ज्यादातर शहरी घरों पर निजी मालिकाना हक हो गया। फिर भी, झू मुक्त उद्यम के समर्थक से ज्यादा एक कुशल नौकरशाह थे, जिन्होंने सरकारी उद्योगों को बेहतर बनाने के लिए पार्टी के आदेशों का पालन किया।
अर्थव्यवस्था के निजीकरण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई
- झू रोंगजी ने अर्थव्यवस्था के निजीकरण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। उन्होंने 1990 के दशक में बैंकों, एयरलाइंस, तेल कंपनियों और अन्य उद्यमों को मुनाफा कमाने वाली कंपनियों में बदलने, लेकिन उन पर सरकारी मालिकाना हक बनाए रखने की योजनाएं तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।
- डिप्टी प्रीमियर के तौर पर झू की सबसे बड़ी कामयाबियों में से एक ऐसी टैक्स प्रणाली बनाना था जिससे बीजिंग के लिए ज्यादा राजस्व जुटाया जा सके। 1996 में उन्होंने कहा था कि इसके लिए उन्हें अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए। प्रीमियर का पद छोड़ने के बाद झू बहुत कम ही सार्वजनिक रूप से दिखाई दिए।
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