कोल्ड ड्रिंक के MRP से 1 रुपये ज्यादा लिए थे, 13 साल तक चला क्रिमिनल केस, फिर क्या हुआ
नई दिल्ली: पत्नी की दुकान पर काम करने वाले एक व्यक्ति को कोल्ड ड्रिंक को MRP (अधिकतम खुदरा मूल्य) से ज्यादा कीमत पर बेचना बहुत भारी पड़ा। इसके लिए उसने 13 साल तक चले आपराधिक मामले का सामना किया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने अब उस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामले को खत्म कर दिया है।
कोर्ट ने उस कानूनी कार्रवाई को रद्द कर दिया है जो इस आरोप पर शुरू हुई थी कि व्यक्ति ने 600 मिलीलीटर कोल्ड ड्रिंक की बोतल 26 रुपये में बेची थी, जबकि उसका MRP 25 रुपये था।

यह मामला 1 रुपये ज्यादा वसूलने से जुड़ा था। घटना के समय वह व्यक्ति अपनी पत्नी की दुकान पर काम कर रहा था।
आखिर पूरा मामला क्या है?यह मामला 29 मार्च, 2013 को लीगल मेट्रोलॉजी इंस्पेक्टर की ओर से व्यक्ति की आटा चक्की और उसकी पत्नी की दुकान पर की गई जांच से शुरू हुआ था।
दुकान की जांच के दौरान इंस्पेक्टर ने 600 मिलीलीटर कोल्ड ड्रिंक की बोतल खरीदी। इस पर 25 रुपये का MRP लिखा था। आरोप है कि व्यक्ति ने बोतल के लिए 26 रुपये लिए। उसी रकम का बिल दिया।
इसके बाद लीगल मेट्रोलॉजी इंस्पेक्टर ने 15 जुलाई, 2013 को एक पत्र के जरिए लीगल मेट्रोलॉजी के असिस्टेंट कंट्रोलर को घटना की जानकारी दी। पत्र में बताया गया था कि 29 मार्च को व्यक्ति की पत्नी की दुकान की जांच के दौरान क्या हुआ था।
इंस्पेक्टर की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने लांजा के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास के सामने शिकायत दर्ज कराई।
इसके बाद मजिस्ट्रेट ने 24 जुलाई, 2013 को व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही का आदेश दिया। उस पर केस नंबर 121/2013 में लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज) रूल्स, 2011 के नियम 18(2) और नियम 32(2) का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया था।
व्यक्ति ने रिविजन एप्लीकेशन नंबर 25/2013 के जरिए रत्नागिरी सेशंस कोर्ट में इस कार्यवाही को चुनौती दी। हालांकि, ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, सेशंस कोर्ट ने 18 सितंबर, 2014 को उसकी चुनौती को खारिज कर दिया। इससे उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा जारी रहा।
इसके बाद वह बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा। उस व्यक्ति ने कोर्ट को बताया कि इंस्पेक्टर शुरू में उसकी आटा मिल पर आया था। मिल चलाने की इजाजत देने के बदले उससे 5,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। उस व्यक्ति के अनुसार, उसने पैसे देने से मना कर दिया।
उसने आगे आरोप लगाया कि रिश्वत देने से मना करने के बाद इंस्पेक्टर ने उसे धमकाया। एक अथॉरिटी लेटर पर साइन करवाए। उस व्यक्ति ने कहा कि उसे डॉक्यूमेंट में लिखी बातें समझ नहीं आईं। कारण था कि वह अंग्रेजी में लिखा था।
यह विवाद सालों तक कोर्ट में चलता रहा, जब तक कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने आखिरकार दखल नहीं दिया। 29 जून, 2026 को कोर्ट ने उस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा रद्द कर दिया। इससे कोल्ड ड्रिंक की बोतल पर 1 रुपये ज्यादा वसूलने से जुड़ा 13 साल पुराना मामला खत्म हो गया।
वह व्यक्ति केस क्यों जीता?क्लावियस लीगल के प्रैक्टिस हेड (अहमदाबाद और मुंबई) अनुज दवे ने ईटी को बताया कि उस व्यक्ति की जीत का मुख्य कारण यह था कि अभियोजन पक्ष ने गलत व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की थी।
अभियोजन पक्ष की ओर से इस्तेमाल किए गए रिकॉर्ड से ही पता चला कि कोल्ड ड्रिंक की बोतल उस व्यक्ति की पत्नी ने बेची थी, जो दुकान की मालिक थी और उसे चलाती थी। उन रिकॉर्ड के अनुसार, उस व्यक्ति की भूमिका बिक्री होने के बाद अपनी पत्नी के कहने पर बिल बनाने तक ही सीमित थी।
दवे ने कहा कि हाईकोर्ट ने इनवॉइस बनाने और असल में बिक्री करने के बीच अंतर किया। उनकी राय में ज्यादा कीमत वसूलने से जुड़ा प्रावधान उस व्यक्ति पर लागू होता है जो प्रोडक्ट बेचता है, न कि उस व्यक्ति पर जो लेन-देन के बाद सिर्फ बिल बनाता है। चूंकि वह व्यक्ति बिक्री करने वाला नहीं था। इसलिए उसके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था।
हाई कोर्ट ने मुकदमे को 'गलत सोच पर आधारित और गलत दिशा में' बताया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि बिल पर लिखी तारीख में बदलाव किया गया था। इसमें मार्च को जून कर दिया गया था। इससे अभियोजन पक्ष के मामले पर और शक पैदा हुआ।
दवे कहते हैं- 'इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि दुकानें अब MRP से ज्यादा दाम वसूल सकती हैं। ऐसा करना अब भी एक अपराध है। कोर्ट ने बस यह साफ किया है कि जिस व्यक्ति पर मुकदमा चलाया जाए, वही होना चाहिए जिसने असल में सामान बेचा हो। यहां दुकान पत्नी की थी। बिक्री भी उसी ने की थी। पति ने तो बस बाद में बिल लिखा था। आप किसी पर सिर्फ इसलिए आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाल सकते क्योंकि वह विक्रेता का रिश्तेदार है या उसने इनवॉइस थमा दिया था।'
जज ने कहा, 'मेरी राय में ओवरराइटिंग की वजह से भी पूरा मामला संदिग्ध हो जाता है।'
कोर्ट ने 15 जुलाई, 2013 के लीगल मेट्रोलॉजी इंस्पेक्टर के पत्र की सामग्री की भी जांच की। पत्र में बताया गया था कि घटना 29 मार्च, 2013 को उस व्यक्ति की पत्नी की दुकान पर हुई थी, जहां वह अलग-अलग सामान बेच रही थी।
महत्वपूर्ण बात यह है कि हाई कोर्ट ने गौर किया कि इंस्पेक्टर के अपने बयान में यह दर्ज था कि कोल्ड ड्रिंक की बोतल उस व्यक्ति की पत्नी ने अपनी दुकान से बेची थी।
इसलिए कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि बिक्री असल में पत्नी ने की थी, जबकि पति ने उसके कहने पर बिल तैयार किया था।
इंस्पेक्टर के पत्र की जांच करने पर कोर्ट ने कहा कि यह साफ था कि लेनदेन पत्नी ने किया था। इसके बावजूद शिकायत में सिर्फ आदमी का नाम था। न तो उसकी पत्नी पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया। न ही उसके खिलाफ कोई कार्रवाई शुरू की गई।
हाईकोर्ट ने लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज) रूल्स, 2011 के नियम 18(2) पर भी विचार किया। इस नियम के अनुसार, कोई भी रिटेल डीलर या कोई अन्य व्यक्ति, जिसमें मैन्युफैक्चरर, पैकर, इम्पोर्टर या होलसेल डीलर शामिल हैं, किसी पैकेज्ड सामान को उसकी रिटेल बिक्री कीमत से ज्यादा कीमत पर नहीं बेच सकता है।
कोर्ट ने देखा कि नियम 18(2) उस रिटेल डीलर या अन्य व्यक्ति पर लागू होता है जो असल में बिक्री करता है। इस मामले की परिस्थितियों में बिक्री करने वाली व्यक्ति नार्वेकर की पत्नी थी।
इसके बाद हाई कोर्ट ने लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 की धारा 2(r) के तहत 'बिक्री' की परिभाषा पर विचार किया।
हाईकोर्ट ने पाया कि प्रॉसिक्यूशन (मुकदमा चलाने की कार्रवाई) ही गलत थी क्योंकि वह आदमी दुकान का मालिक नहीं था। उसने असल में बिक्री नहीं की थी। कोर्ट के अनुसार, उसने सिर्फ बिल बनाया था, जबकि लेनदेन उसकी पत्नी ने किया था, जो दुकान की मालकिन थी।
कोर्ट ने यह भी माना कि दुकान के मालिक के कहने पर बिल बनाना, अपने आप में लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 की धारा 2(r) के अर्थ में 'बिक्री' नहीं माना जा सकता है।
दुकान के मालिक का क्या?इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि आदमी की पत्नी के खिलाफ अपने आप कोई कार्रवाई होगी। दवे ने कहा कि हाईकोर्ट ने यह तय नहीं किया कि क्या उसने खुद कानून का उल्लंघन किया था। कोर्ट का निष्कर्ष इस बात तक सीमित था कि उस आदमी पर गलत तरीके से मुकदमा चलाया गया था। कोर्ट ने यह भी देखा कि उसकी पत्नी को इस मामले में कभी आरोपी नहीं बनाया गया था।
सिद्धांत रूप में अधिकारी उस व्यक्ति के आचरण की जांच कर सकते हैं जिसने असल में बिक्री की थी। हालांकि, जिस लेनदेन की बात हो रही है, वह 2013 में हुआ था।
दवे कहते हैं, 'अगर अब कोई नया केस किया जाता है तो वह लिमिटेशन के नियम में फंस जाएगा। यह सिर्फ जुर्माने वाला अपराध है। इस पर कार्रवाई करने के लिए बहुत कम समय मिलता है। साथ ही, यह एक छोटा और समझौता-योग्य मामला है। इसमें सिर्फ 2,000 रुपये का जुर्माना लगता है। असल में घटना के इतने समय बाद कोई नई कार्रवाई होने की संभावना बहुत कम है।'
कोर्ट ने उस कानूनी कार्रवाई को रद्द कर दिया है जो इस आरोप पर शुरू हुई थी कि व्यक्ति ने 600 मिलीलीटर कोल्ड ड्रिंक की बोतल 26 रुपये में बेची थी, जबकि उसका MRP 25 रुपये था।
यह मामला 1 रुपये ज्यादा वसूलने से जुड़ा था। घटना के समय वह व्यक्ति अपनी पत्नी की दुकान पर काम कर रहा था।
आखिर पूरा मामला क्या है?यह मामला 29 मार्च, 2013 को लीगल मेट्रोलॉजी इंस्पेक्टर की ओर से व्यक्ति की आटा चक्की और उसकी पत्नी की दुकान पर की गई जांच से शुरू हुआ था।
दुकान की जांच के दौरान इंस्पेक्टर ने 600 मिलीलीटर कोल्ड ड्रिंक की बोतल खरीदी। इस पर 25 रुपये का MRP लिखा था। आरोप है कि व्यक्ति ने बोतल के लिए 26 रुपये लिए। उसी रकम का बिल दिया।
इसके बाद लीगल मेट्रोलॉजी इंस्पेक्टर ने 15 जुलाई, 2013 को एक पत्र के जरिए लीगल मेट्रोलॉजी के असिस्टेंट कंट्रोलर को घटना की जानकारी दी। पत्र में बताया गया था कि 29 मार्च को व्यक्ति की पत्नी की दुकान की जांच के दौरान क्या हुआ था।
इंस्पेक्टर की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने लांजा के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास के सामने शिकायत दर्ज कराई।
इसके बाद मजिस्ट्रेट ने 24 जुलाई, 2013 को व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही का आदेश दिया। उस पर केस नंबर 121/2013 में लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज) रूल्स, 2011 के नियम 18(2) और नियम 32(2) का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया था।
व्यक्ति ने रिविजन एप्लीकेशन नंबर 25/2013 के जरिए रत्नागिरी सेशंस कोर्ट में इस कार्यवाही को चुनौती दी। हालांकि, ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, सेशंस कोर्ट ने 18 सितंबर, 2014 को उसकी चुनौती को खारिज कर दिया। इससे उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा जारी रहा।
इसके बाद वह बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा। उस व्यक्ति ने कोर्ट को बताया कि इंस्पेक्टर शुरू में उसकी आटा मिल पर आया था। मिल चलाने की इजाजत देने के बदले उससे 5,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। उस व्यक्ति के अनुसार, उसने पैसे देने से मना कर दिया।
उसने आगे आरोप लगाया कि रिश्वत देने से मना करने के बाद इंस्पेक्टर ने उसे धमकाया। एक अथॉरिटी लेटर पर साइन करवाए। उस व्यक्ति ने कहा कि उसे डॉक्यूमेंट में लिखी बातें समझ नहीं आईं। कारण था कि वह अंग्रेजी में लिखा था।
यह विवाद सालों तक कोर्ट में चलता रहा, जब तक कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने आखिरकार दखल नहीं दिया। 29 जून, 2026 को कोर्ट ने उस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा रद्द कर दिया। इससे कोल्ड ड्रिंक की बोतल पर 1 रुपये ज्यादा वसूलने से जुड़ा 13 साल पुराना मामला खत्म हो गया।
वह व्यक्ति केस क्यों जीता?क्लावियस लीगल के प्रैक्टिस हेड (अहमदाबाद और मुंबई) अनुज दवे ने ईटी को बताया कि उस व्यक्ति की जीत का मुख्य कारण यह था कि अभियोजन पक्ष ने गलत व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की थी।
अभियोजन पक्ष की ओर से इस्तेमाल किए गए रिकॉर्ड से ही पता चला कि कोल्ड ड्रिंक की बोतल उस व्यक्ति की पत्नी ने बेची थी, जो दुकान की मालिक थी और उसे चलाती थी। उन रिकॉर्ड के अनुसार, उस व्यक्ति की भूमिका बिक्री होने के बाद अपनी पत्नी के कहने पर बिल बनाने तक ही सीमित थी।
दवे ने कहा कि हाईकोर्ट ने इनवॉइस बनाने और असल में बिक्री करने के बीच अंतर किया। उनकी राय में ज्यादा कीमत वसूलने से जुड़ा प्रावधान उस व्यक्ति पर लागू होता है जो प्रोडक्ट बेचता है, न कि उस व्यक्ति पर जो लेन-देन के बाद सिर्फ बिल बनाता है। चूंकि वह व्यक्ति बिक्री करने वाला नहीं था। इसलिए उसके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था।
हाई कोर्ट ने मुकदमे को 'गलत सोच पर आधारित और गलत दिशा में' बताया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि बिल पर लिखी तारीख में बदलाव किया गया था। इसमें मार्च को जून कर दिया गया था। इससे अभियोजन पक्ष के मामले पर और शक पैदा हुआ।
दवे कहते हैं- 'इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि दुकानें अब MRP से ज्यादा दाम वसूल सकती हैं। ऐसा करना अब भी एक अपराध है। कोर्ट ने बस यह साफ किया है कि जिस व्यक्ति पर मुकदमा चलाया जाए, वही होना चाहिए जिसने असल में सामान बेचा हो। यहां दुकान पत्नी की थी। बिक्री भी उसी ने की थी। पति ने तो बस बाद में बिल लिखा था। आप किसी पर सिर्फ इसलिए आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाल सकते क्योंकि वह विक्रेता का रिश्तेदार है या उसने इनवॉइस थमा दिया था।'
जज ने कहा, 'मेरी राय में ओवरराइटिंग की वजह से भी पूरा मामला संदिग्ध हो जाता है।'
कोर्ट ने 15 जुलाई, 2013 के लीगल मेट्रोलॉजी इंस्पेक्टर के पत्र की सामग्री की भी जांच की। पत्र में बताया गया था कि घटना 29 मार्च, 2013 को उस व्यक्ति की पत्नी की दुकान पर हुई थी, जहां वह अलग-अलग सामान बेच रही थी।
महत्वपूर्ण बात यह है कि हाई कोर्ट ने गौर किया कि इंस्पेक्टर के अपने बयान में यह दर्ज था कि कोल्ड ड्रिंक की बोतल उस व्यक्ति की पत्नी ने अपनी दुकान से बेची थी।
इसलिए कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि बिक्री असल में पत्नी ने की थी, जबकि पति ने उसके कहने पर बिल तैयार किया था।
इंस्पेक्टर के पत्र की जांच करने पर कोर्ट ने कहा कि यह साफ था कि लेनदेन पत्नी ने किया था। इसके बावजूद शिकायत में सिर्फ आदमी का नाम था। न तो उसकी पत्नी पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया। न ही उसके खिलाफ कोई कार्रवाई शुरू की गई।
हाईकोर्ट ने लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज) रूल्स, 2011 के नियम 18(2) पर भी विचार किया। इस नियम के अनुसार, कोई भी रिटेल डीलर या कोई अन्य व्यक्ति, जिसमें मैन्युफैक्चरर, पैकर, इम्पोर्टर या होलसेल डीलर शामिल हैं, किसी पैकेज्ड सामान को उसकी रिटेल बिक्री कीमत से ज्यादा कीमत पर नहीं बेच सकता है।
कोर्ट ने देखा कि नियम 18(2) उस रिटेल डीलर या अन्य व्यक्ति पर लागू होता है जो असल में बिक्री करता है। इस मामले की परिस्थितियों में बिक्री करने वाली व्यक्ति नार्वेकर की पत्नी थी।
इसके बाद हाई कोर्ट ने लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 की धारा 2(r) के तहत 'बिक्री' की परिभाषा पर विचार किया।
हाईकोर्ट ने पाया कि प्रॉसिक्यूशन (मुकदमा चलाने की कार्रवाई) ही गलत थी क्योंकि वह आदमी दुकान का मालिक नहीं था। उसने असल में बिक्री नहीं की थी। कोर्ट के अनुसार, उसने सिर्फ बिल बनाया था, जबकि लेनदेन उसकी पत्नी ने किया था, जो दुकान की मालकिन थी।
कोर्ट ने यह भी माना कि दुकान के मालिक के कहने पर बिल बनाना, अपने आप में लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 की धारा 2(r) के अर्थ में 'बिक्री' नहीं माना जा सकता है।
दुकान के मालिक का क्या?इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि आदमी की पत्नी के खिलाफ अपने आप कोई कार्रवाई होगी। दवे ने कहा कि हाईकोर्ट ने यह तय नहीं किया कि क्या उसने खुद कानून का उल्लंघन किया था। कोर्ट का निष्कर्ष इस बात तक सीमित था कि उस आदमी पर गलत तरीके से मुकदमा चलाया गया था। कोर्ट ने यह भी देखा कि उसकी पत्नी को इस मामले में कभी आरोपी नहीं बनाया गया था।
सिद्धांत रूप में अधिकारी उस व्यक्ति के आचरण की जांच कर सकते हैं जिसने असल में बिक्री की थी। हालांकि, जिस लेनदेन की बात हो रही है, वह 2013 में हुआ था।
दवे कहते हैं, 'अगर अब कोई नया केस किया जाता है तो वह लिमिटेशन के नियम में फंस जाएगा। यह सिर्फ जुर्माने वाला अपराध है। इस पर कार्रवाई करने के लिए बहुत कम समय मिलता है। साथ ही, यह एक छोटा और समझौता-योग्य मामला है। इसमें सिर्फ 2,000 रुपये का जुर्माना लगता है। असल में घटना के इतने समय बाद कोई नई कार्रवाई होने की संभावना बहुत कम है।'
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