Iran US War: समंदर के नीचे शटडाउन की तैयारी में ईरान, 10 ट्रिलियन डॉलर के वैश्विक लेनदेन पर खतरा, भारत पर भी संकट

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नई दिल्ली: ईरान और अमेरिका/इजरायल के बीच हमले को दो महीने से ज्यादा का समय हो गया है। इस हमले के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के सबसे महत्वपूर्ण रास्ते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ( Strait of Hormuz ) पर भी नाकेबंदी हुई। इसके चलते दुनियाभर में तेल संकट गहरा गया है। वहीं होर्मुज को लेकर अब एक नया डिजिटल युद्ध छिड़ गया है। ईरान ने इस क्षेत्र से गुजरने वाली 7 प्रमुख अंडरसी फाइबर-ऑप्टिक केबलों पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने के लिए एक व्यापक जनादेश (Mandate) जारी किया है। इस केबलों के जरिए प्रतिदिन 10 ट्रिलियन डॉलर का वैश्विक वित्तीय लेनदेन होता है, जिसे लेकर अब चिंताएं बढ़ गई हैं।
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ईरान के इस कदम से दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारे होर्मुज जलडमरूमध्य के 'डिजिटल चोकपॉइंट' में बदलने का खतरा पैदा हो गया है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने घोषणा की है कि समुद्र तल पर बुनियादी ढांचे के रखरखाव के लिए विदेशी ऑपरेटरों को अब ईरानी परमिट लेनी होगी और सुरक्षा शुल्क (Protection Fees) देना होगा।


ईरान से रखीं कई शर्तेंसमंदर के नीचे फाइबर-ऑप्टिक केबलों के रखरखाव को लेकर ईरान ने कई शर्तें रखी हैं। ये इस प्रकार हैं:
  • ईरान इन केबल के लिए लाइसेंस शुल्क लेगा। जलडमरूमध्य में काम करने वाली सभी विदेशी कंपनियों के लिए प्रारंभिक लाइसेंस अनिवार्य होगा।
  • मेटा (Meta), अमेजन (Amazon) और माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) जैसे तकनीकी दिग्गजों से वार्षिक सुरक्षा भुगतान की मांग की गई है। यानी यह टेक दिग्गजों पर एक तरह से टैक्स होगा।
  • इस क्षेत्र के भीतर सभी रखरखाव और मरम्मत कार्यों पर केवल ईरान का कंट्रोल होगा।


वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतराहोर्मुज जलडमरूमध्य को वैश्विक तेल गलियारे के रूप में जाना जाता है। लेकिन यह सिर्फ तेल के लिए ही नहीं बल्कि इंटरनेट के लिए भी जीवन रेखा बन गया है। यहां से गुजरने वाली 7 प्रमुख केबल (जैसे AAE-1 और FALCON नेटवर्क) यूरोप, एशिया और खाड़ी देशों की डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ती हैं। इनके नुकसान होने से दुनिया की अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ सकती है।

भारत के लिए भी बड़ा संकटइन केबलों के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर के वैश्विक वित्तीय लेनदेन होते हैं। ईरान अगर इन केबलों को नुकसान पहुंचाता है तो यह भारत के लिए भी बड़ा संकट होगा। भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसी डेटा-आधारित अर्थव्यवस्थाओं के लिए इन केबलों में अगर कुछ नुकसान आता है तो कुछ ही मिनटों में करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान हो सकता है।

क्यों संवेदनशील हैं ये केबल?समुद्र के नीचे बिछी ये केबल आधुनिक जीवन की रीढ़ हैं, लेकिन ये बेहद नाजुक होती हैं। हालांकि 75% नुकसान मछली पकड़ने वाली नौकाओं या लंगर (Anchors) घिसटने के कारण होता है, लेकिन वर्तमान सैन्य तनाव ने इन केबलों के नुकसान को और बढ़ा दिया है।

एक ट्रांसओशनिक केबल सिस्टम को बिछाने में 300 मिलियन डॉलर से 1 अरब डॉलर तक का खर्च आता है। इनके रखरखाव के लिए विशेष गहरे समुद्र के जहाजों की आवश्यकता होती है। अगर ईरान इन जहाजों के प्रवेश को रोकता है, तो मरम्मत कार्य ठप हो सकते हैं, जिससे वैश्विक इंटरनेट की स्थिरता खतरे में पड़ जाएगी।