India Economic Crisis: बांग्लादेश में तस्करी, बड़े संकट के कगार पर खड़ा है भारत, दिग्गज अर्थशास्त्रियों की चेतावनी

Newspoint
नई दिल्‍ली: भारत गहरे आर्थिक संकट से बचना चाहता है तो उसे बड़े स्‍ट्रक्‍चरल रिफॉर्म्‍स करने होंगे। इसमें खाद और खाने की चीजों पर दी जाने वाली सब्सिडी में बड़ा बदलाव शामिल है। जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और सीनियर फेलो रितिका जुनेजा ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक लेख में ये बातें कही हैं। दोनों अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि अगर दबाव बना रहा और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को अपनी करेंसी बचाने के लिए भारी खर्च करना पड़ा तो भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर 100 रुपये तक पहुंच सकता है।
Hero Image

दिग्‍गज अर्थशास्त्रियों ने लिखा, 'भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहा है। अगर आरबीआई मजबूती से दखल नहीं देता है तो एक्सचेंज रेट गिरकर 100 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है।'

एक साथ कई दिक्कतें लेखकों के अनुसार,
  • पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण भारत की एनर्जी और फर्टिलाइजर कॉस्‍ट बढ़ गई है।
  • विदेशी निवेशक देश से अपना पैसा निकाल रहे हैं।
  • वहीं, घरेलू निवेश का माहौल भी कमजोर बना हुआ है।

उन्होंने अनुमान लगाया कि मौजूदा हालात में वित्त वर्ष 2026-27 में भारत के लिए 6% जीडीपी ग्रोथ हासिल करना और कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) पर आधारित महंगाई दर को 6% से नीचे रखना बड़ी किस्मत की बात होगी।'

दोनों टॉप इकोनॉमिस्‍ट ने कहा कि अगर होर्मुज स्‍ट्रेट लंबे समय तक बंद रहता है तो हालात और भी खराब हो सकते हैं।

लेखकों के अनुसार, 'अगर होर्मुज स्‍ट्रेट अगले तीन महीनों तक बंद रहता है तो जीडीपी ग्रोथ 6% से नीचे गिर जाएगी। सीपीआई महंगाई दर 6% से ऊपर पहुंच जाएगी।' उन्होंने आगे कहा कि ऐसे में आरबीआई के पास ब्याज दरें बढ़ाने के अलावा शायद ही कोई और विकल्प बचेगा।

बड़े संकट के कगार पर अर्थव्‍यवस्‍थाइस पृष्ठभूमि में गुलाटी और जुनेजा ने तर्क दिया कि भारत को ऐसे सुधारों की जरूरत है जो 1991 में किए गए सुधारों के बराबर हों। उन्होंने लिखा, 'अर्थव्यवस्था बड़े संकट के कगार पर खड़ी दिख रही है। इससे बचने का एकमात्र समझदारी भरा तरीका यही है कि 1991 की तरह ही बड़े सुधार किए जाएं।'

खाद सब्सिडी व्‍यवस्‍था पर उठाए सवालउनकी आलोचना का मुख्य केंद्र खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी की व्यवस्था थी। लेखकों ने बताया कि भारत अपनी यूरिया की कुल जरूरत का 20-25 फीसदी हिस्सा आयात करता है। हाल ही में जारी आयात टेंडर के अनुसार, यूरिया की लैंडेड कॉस्ट (पहुंचने तक की लागत) लगभग 935 डॉलर प्रति टन है। इसके बावजूद सब्सिडी के चलते किसानों को यूरिया 70 डॉलर प्रति टन से भी कम कीमत पर बेची जाती है।

उन्होंने लिखा, 'इसकी असली वजह यूरिया पर दी जाने वाली भारी-भरकम सब्सिडी है जो आज इसकी कुल लागत का लगभग 90 फीसदी हिस्सा कवर करती है।'

बांग्‍लादेश, नेपाल में तस्‍करीअर्थशास्त्रियों के अनुसार, कीमतों में इस भारी अंतर के कारण यूरिया को गलत जगहों पर भेजने (डायवर्जन) और उसकी तस्करी करने को बढ़ावा मिल रहा है। बिहार का उदाहरण देकर उन्होंने कहा कि सरकारी डेटा से पता चलता है कि सप्लाई की गई खाद और खेतों में असल में इस्तेमाल की गई खाद के बीच बहुत बड़ा अंतर है।

उन्होंने लिखा, 'जो कोई भी बिहार की जमीनी हकीकत से वाकिफ है, वह जानता है कि यह राज्य लंबे समय से नेपाल में खाद की हेराफेरी का आसान रास्ता रहा है। सीमावर्ती जिलों से मिली रिपोर्टें यह भी बताती हैं कि सब्सिडी वाली खाद की नियमित रूप से बांग्लादेश में तस्करी की जाती है।'

भारी भरकम है खाद सब्सिडी बिललेखकों ने कहा कि खाद सब्सिडी बिल के लिए वित्त वर्ष 2026-27 में 1.71 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। उसके 2.25 लाख करोड़ रुपये से ज्‍यादा होने की संभावना है। यह 2.50 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।

एक समाधान के तौर पर उन्होंने मौजूदा सब्सिडी व्यवस्था को एक ऐसी 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' (DBT) प्रणाली से बदलने का प्रस्ताव दिया, जो जमीन के मालिकाना हक से जुड़ी हो। पीएम-किसान कार्यक्रम के साथ इंटीग्रेट हो।

उन्होंने कहा, 'अंतिम समाधान - असली ब्रह्मास्त्र - पूरी रासायनिक खाद सब्सिडी व्यवस्था में सुधार करने में निहित है। इसके तहत प्रति एकड़ के आधार पर 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' प्रणाली की ओर बढ़ा जाए।'

उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह के बदलाव से लीकेज कम होगी। तस्करी पर रोक लगेगी। सरकार को सालाना 40,000-50,000 करोड़ रुपये की बचत होगी।

80 करोड़ को फ्री अनाज क्यों?
अर्थशास्त्रियों ने भारत के खाद्य सब्सिडी कार्यक्रम के पैमाने पर भी सवाल उठाए। जहां सरकारी अनुमान बताते हैं कि गरीबी का स्तर तेजी से गिरा है। वहीं, 80 करोड़ से ज्‍यादा लोगों को मुफ्त अनाज का वितरण जारी है।

उन्‍होंने पूछा, '80 करोड़ से ज्‍यादा लोगों को मुफ्त अनाज का वितरण क्यों जारी रहना चाहिए?'

उन्होंने तर्क दिया कि लाभार्थियों को तर्कसंगत बनाने या गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों के लिए जारी करने की कीमतों में बढ़ोतरी करने से सालाना 50,000 करोड़ रुपये और बचाए जा सकते हैं।

गुलाटी और जुनेजा ने चेतावनी दी कि राजनीतिक रूप से कठिन सुधारों में देरी करने से भारत की आर्थिक चुनौतियां और गहरी ही होंगी। उन्‍होंने कहा, 'इन सुधारों को न कर पाना सावधानी नहीं, बल्कि नीतिगत कायरता को दर्शाता है।'