बच्चे के भविष्य के लिए निवेश करते समय सिर्फ रिटर्न नहीं, इन खर्चों को भी ध्यान में रखें

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बच्चे के भविष्य के लिए निवेश करते समय ज्यादातर माता-पिता सिर्फ एक सवाल पूछते हैं कि इसमें कितना रिटर्न मिलेगा। लेकिन रिटर्न के पीछे कई ऐसे खर्च छिपे होते हैं, जो लंबे समय में आपकी बचत को धीरे-धीरे कम कर देते हैं। प्रबंधन शुल्क, निकासी शुल्क, टैक्स और महंगाई जैसे खर्चों को नजरअंदाज करने पर 15 या 20 साल बाद हाथ में आने वाली रकम उम्मीद से काफी कम हो सकती है। इसलिए बच्चे की पढ़ाई या भविष्य के लिए योजना बनाते समय रिटर्न के साथ-साथ खर्चों का हिसाब भी लगाना जरूरी है।

इस लेख में हम समझेंगे कि बच्चे के लिए निवेश करते समय कौन-कौन से खर्च ध्यान में रखने चाहिए और योजना कैसे बनाएं।

रिटर्न के पीछे छिपे खर्च कौन से हैं

सबसे पहला खर्च है प्रबंधन शुल्क। म्यूचुअल फंड जैसे निवेश में एक्सपेंस रेशियो के रूप में हर साल एक छोटा प्रतिशत काटा जाता है, जो लंबे समय में बड़ी रकम बन जाता है। दूसरा खर्च है निकासी शुल्क, जैसे एग्जिट लोड, जो जल्दी पैसा निकालने पर लग सकता है। तीसरा और सबसे बड़ा खर्च है टैक्स। अलग-अलग निवेश पर टैक्स के नियम अलग होते हैं, इसलिए टैक्स के बाद मिलने वाला रिटर्न ही असली रिटर्न है।

चौथा खर्च है महंगाई। अगर निवेश पर 10 प्रतिशत रिटर्न मिल रहा है और महंगाई 6 प्रतिशत है, तो असली बढ़त सिर्फ 4 प्रतिशत के आसपास है। इनके अलावा कुछ योजनाओं में खाता रखरखाव शुल्क या किस्त चूकने पर जुर्माना भी हो सकता है। इसलिए किसी भी योजना को चुनने से पहले उसके सारे शुल्क और शर्तें पढ़ना जरूरी है।

लंबी अवधि में खर्च का असर कैसे बढ़ता है

छोटे खर्च भी लंबी अवधि में चक्रवृद्धि के उल्टा असर डालते हैं। उदाहरण के लिए, हर साल 1 प्रतिशत अतिरिक्त खर्च 20 साल में आपकी कुल बचत का एक बड़ा हिस्सा कम कर सकता है, क्योंकि वह पैसा भी बढ़ने से रह जाता है।

इसलिए बच्चे के लिए लंबी अवधि की योजना में कम खर्च वाली योजनाओं को प्राथमिकता देना समझदारी है, बशर्ते उनका उद्देश्य आपके लक्ष्य से मेल खाता हो। बेटी के भविष्य के लिए सुकन्या समृद्धि योजना एक लोकप्रिय विकल्प है, जिसमें खाता बेटी के 10 साल की होने से पहले खुलवाना होता है। इसमें सालाना 1.5 लाख रुपये तक जमा किए जा सकते हैं और 8.2 प्रतिशत की दर से, जो समय-समय पर बदल सकती है, अनुमान के तौर पर परिपक्वता पर लगभग 71.8 लाख रुपये बन सकते हैं। छोटे बच्चे के नाम पर पीपीएफ खाता भी एक विकल्प है, लेकिन इसमें अभिभावक के अपने और बच्चे के पीपीएफ को मिलाकर सालाना जमा की सीमा 1.5 लाख रुपये ही रहती है।
किसी भी योजना में पैसा लगाने से पहले उसकी शर्तें, लॉक-इन अवधि और निकासी के नियम जरूर समझ लें।

योजना बनाते समय क्या-क्या देखें

बच्चे के भविष्य की योजना बनाते समय सबसे पहले लक्ष्य तय करें, जैसे पढ़ाई का खर्च कितने साल बाद आएगा और तब तक कितनी रकम चाहिए होगी। इसके बाद महंगाई को ध्यान में रखकर लक्ष्य की रकम बढ़ाएं, क्योंकि आज की 10 लाख रुपये की पढ़ाई 15 साल बाद कहीं महंगी हो सकती है। फिर ऐसी योजनाएं चुनें जिनके खर्च कम हों, निकासी के नियम लचीले हों और जोखिम आपकी क्षमता के अनुसार हो।

एक ही योजना पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग तरह के निवेश में पैसा बांटना भी समझदारी है। समय-समय पर योजना की समीक्षा करें, क्योंकि आय, खर्च और लक्ष्य बदलते रहते हैं। निवेश में जोखिम होता है और रिटर्न की कोई गारंटी नहीं होती, इसलिए कोई भी फैसला लेने से पहले योजना के आधिकारिक दस्तावेज पढ़ें और जरूरत पड़ने पर किसी पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से सलाह लें।