अमेरिका-ईरान तनाव के बीच कच्चे तेल में उथल-पुथल, अगले हफ्ते पेट्रोल पर क्या असर होगा
ईरान के साथ अमेरिकी वार्ता का रुख साफ न होने और मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से आने वाले हफ्ते में कच्चे तेल के दाम अस्थिर रह सकते हैं — ऐसा बाजार के जानकारों का अनुमान है। कच्चे तेल की कीमतों में हलचल का सीधा असर भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर पड़ता है, इसीलिए इस घटनाक्रम को crude oil price news india के नाम से खोजा जा रहा है।
वहीं, अगर होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने पर कोई सहमति बनती है तो भावों में थोड़ी नरमी भी देखने को मिल सकती है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85 फीसदी हिस्सा आयात से पूरा करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय भाव में हर उछाल का असर सीधे देश की अर्थव्यवस्था पर दिखता है — आयात बिल बढ़ता है और रुपये पर दबाव पड़ता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी दुनिया की नजरअमेरिकी राष्ट्रपति के मुताबिक, सऊदी अरब की राजधानी रियाद के एयरपोर्ट पर हुए हमले के बाद वॉशिंगटन अब इस पर विचार कर रहा है कि यमन में ईरान समर्थित हूती लड़ाकों के खिलाफ सऊदी कार्रवाई में शामिल हुआ जाए या नहीं।
जिंस बाजार के विशेषज्ञों के मुताबिक, लड़ाई के फैलने से एनर्जी सप्लाई को लेकर फिक्र बढ़ गई है — खासकर रणनीतिक रूप से अहम बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के रास्ते होने वाली सप्लाई को लेकर। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल इन्हीं समुद्री रास्तों से मंगाता है, इसलिए यहां कोई भी रुकावट सीधे देश के आयात बिल और रुपये पर असर डालती है।
MCX पर कच्चा तेल 8,500 के पार, कीमतों में बड़ा रिस्क प्रीमियमबाजार के जानकार बताते हैं कि क्रूड के भाव कूटनीतिक उम्मीदों और सप्लाई के असली खतरों के बीच झूल रहे हैं। मौजूदा तनाव शुरू होने से पहले क्रूड 6,500 रुपये प्रति बैरल के आसपास था — उसके मुकाबले 8,500 रुपये से ऊपर का भाव साफ दिखाता है कि दामों में सप्लाई-जोखिम का भारी प्रीमियम पहले से ही जुड़ा हुआ है।
अगर वॉशिंगटन के प्रस्ताव पर तेहरान की ओर से सकारात्मक जवाब आता है तो आने वाले दिनों में भाव और नरम हो सकते हैं। लेकिन जानकार ये भी याद दिलाते हैं कि पहले के अनुभवों में सिर्फ कूटनीतिक बढ़त से सप्लाई लंबे समय तक सुधरती नहीं दिखी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने साथ ही ये कहा है कि दोनों देशों के बीच बातचीत सही दिशा में बढ़ रही है, और तीन नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले ईरान पर कोई सैन्य हमला नहीं होगा।
अगले हफ्ते इन रिपोर्टों पर रहेगी निवेशकों की नजरबाजार के विश्लेषकों का कहना है कि अगले हफ्ते निवेशकों की नजर ओपेक — यानी पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन — और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की मासिक तेल बाजार रिपोर्टों पर रहेगी।
शोध विशेषज्ञों के मुताबिक, वैश्विक बाजारों के लिए अमेरिका-ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक बातचीत और क्रूड से जुड़ी घटनाएं अहम बनी रहेंगी। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने की रूपरेखा पर तरक्की होती है तो ऊर्जा के दाम घट सकते हैं — इससे देश का आयात बिल घट सकता है और रुपये को भी थोड़ी राहत मिल सकती है। लेकिन अगर भू-राजनीतिक तनाव फिर बढ़ा तो बाजार में उठापटक जारी रह सकती है।
आम आदमी के लिए सवाल यही है कि इसका असर पेट्रोल-डीजल के दामों पर पड़ेगा या नहीं। घरेलू ईंधन की कीमतें तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय भाव और रुपये की स्थिति देखकर तय करती हैं, इसलिए अगर कच्चा तेल महंगा बना रहा तो आने वाले दिनों में ईंधन के दामों पर दबाव बढ़ सकता है।