पेट्रोल का झंझट खत्म: 100% एथेनॉल से कितनी सस्ती होगी आपकी सवारी?
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने केंद्रीय मोटर व्हीकल नियमों में बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए देश में हरित ऊर्जा (ग्रीन एनर्जी) तथा वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा देने की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम उठा लिया है। सरकार की इस नई व्यवस्था के लागू होने से ऑटोमोबाइल सेक्टर में फ्लेक्स-फ्यूल (Flex-Fuel) से चलने वाले वाहनों के लिए रास्ते पूरी तरह साफ हो गए हैं।
सरकार के इस दूरगामी कदम से देश की ईंधन और ऊर्जा जरूरतों को एक नया मोड़ मिलेगा और विदेशों से आयात किए जाने वाले महंगे कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता काफी तेजी से कम होगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार में भी भारी बचत होगी? आइए, इसका पूरा गणित विस्तार से समझ लेते हैं।
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को मिली आधिकारिक मंजूरीभारतीय वाहन बाजार में कई बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियां पहले से ही अपने नए और अत्याधुनिक फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल्स पेश करने की योजना पर तेजी से काम कर रही थीं। सरकार के इस आधिकारिक फैसले से उन सभी कंपनियों को बहुत बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा।
भारत सरकार द्वारा पिछले कुछ सालों से इथेनॉल सम्मिश्रण (Ethanol Blending) कार्यक्रम को लगातार सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है, जिसके बेहद सकारात्मक और राहत देने वाले परिणाम देश के सामने आए हैं।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2014-15 से लेकर अब तक इस एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम के जरिए देश के सरकारी खजाने से बाहर जाने वाली लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये की विशाल विदेशी मुद्रा बचाई जा चुकी है।
मौजूदा समय में भारत अपनी कुल वार्षिक जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत से भी अधिक कच्चा तेल (Crude Oil) दूसरे देशों से आयात करता है। इस भारी-भरकम तेल आयात के भुगतान में देश के विदेशी मुद्रा भंडार का एक बहुत बड़ा हिस्सा पानी की तरह खर्च हो जाता है।
इस वित्तीय दबाव को कम करने के लिए स्वदेशी और घरेलू स्तर पर तैयार होने वाला एथेनॉल एक बेहतरीन और टिकाऊ विकल्प साबित हो रहा है। देश में गन्ने के रस, मक्के और टूटे हुए चावल जैसे कृषि उत्पादों से तैयार किए जाने वाले इस जैव-ईंधन (Bio-fuel) के उपयोग से अंतरराष्ट्रीय क्रूड ऑयल पर भारत की निर्भरता लगातार घटती जा रही है।
वाहन चालकों के लिए कितनी होगी ईंधन की रन-कॉस्ट?केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के अनुसार, पूरी तरह से 100% एथेनॉल यानी ई-100 पर चलने वाली गाड़ियों का संचालन खर्च (Run-Cost) पारंपरिक महंगे पेट्रोल की तुलना में काफी किफायती और सस्ता बैठ सकता है।
हालांकि, तकनीकी रूप से शुद्ध एथेनॉल की कैलोरी वैल्यू पेट्रोल के मुकाबले थोड़ी कम होती है, जिससे गाड़ी के प्रति लीटर माइलेज या जल्दी रिफिलिंग की जरूरत पर हल्का असर पड़ सकता है। लेकिन इसके बावजूद एथेनॉल की प्रति लीटर खरीद लागत और गाड़ी चलाने का कुल औसतन खर्च काफी कम रहने का अनुमान है। सरकार की इस दूरदर्शी पहल से जहां एक तरफ शहरों में पर्यावरण प्रदूषण में कमी आएगी, वहीं दूसरी तरफ किसानों की आमदनी बढ़ाने में भी यह नीति मील का पत्थर साबित होगी।