पैसे संभाल कर रखिए! जल्द बदलने वाले हैं आपकी जेब में रखे नोट, RBI का बड़ा प्लान
क्या आपकी जेब में भी अक्सर फटे, मैले या टेप लगे हुए नोट आ जाते हैं और फिर उन्हें बाजार में चलाने के लिए आपको मशक्कत करनी पड़ती है? अगर हां, तो आपके लिए एक बड़ी राहत की खबर है. आने वाले दिनों में आपको इस झंझट से हमेशा के लिए मुक्ति मिल सकती है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब देश में पारंपरिक कागज के नोटों की जगह प्लास्टिक के नोट (पॉलिमर बैंक नोट) लाने पर बेहद गंभीरता से विचार कर रहा है. इसके लिए केंद्रीय बैंक के स्तर पर तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं.
दरअसल, देश में नकदी (कैश) की भारी मांग और कागज के नोटों को छापने में आने वाली मोटी लागत को देखते हुए यह फैसला लिया जा रहा है. हाल ही में पटना और मुंबई में हुई आरबीआई के सेंट्रल बोर्ड की बैठकों में इस मुद्दे पर काफी गहन चर्चा हुई है. सूत्रों का कहना है कि कागज के नोट बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं, जिससे सरकार पर हर साल छपाई का बोझ बढ़ता है. यही वजह है कि आरबीआई बहुत जल्द आम जनता के बीच प्लास्टिक के नोट
असल में कागज के नोटों को छापना और फिर उनका रखरखाव करना आरबीआई के लिए एक बेहद खर्चीला सौदा साबित हो रहा है. रिजर्व बैंक की हालिया वार्षिक रिपोर्ट पर नजर डालें तो पिछले वित्तीय वर्ष में नोटों की छपाई पर 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. यह आंकड़ा इससे पिछले साल के 5,101.4 करोड़ रुपये के मुकाबले काफी ज्यादा है.
जानकारों का मानना है कि शुरुआत में भले ही प्लास्टिक के नोट
छापने की लागत थोड़ी अधिक लगे, लेकिन लंबी अवधि में यह बेहद किफायती साबित होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि प्लास्टिक या पॉलिमर से बने नोटों की उम्र कागज के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती है. इसके साथ ही देश के आधुनिक एटीएम (ATM) भी अब काफी एडवांस हो चुके हैं, जो बिना किसी तकनीकी खराबी के इन नए पॉलिमर नोटों को आसानी से पहचान और डिस्पेंस (निकाल) सकते हैं. खराब नोटों को नष्ट करना आरबीआई के लिए बड़ा सिरदर्दहमारे देश में अक्सर लोग नोटों को मोड़कर, मरोड़कर या बेहद लापरवाही से रखते हैं. इस वजह से नोट बहुत जल्दी मैले हो जाते हैं या फट जाते हैं. इन गंदे और फटे नोटों को बाजार से वापस समेटना और फिर उन्हें नष्ट करना केंद्रीय बैंक के लिए किसी बड़े सिरदर्द से कम नहीं है. आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 में करीब 23.8 अरब खराब नोटों को चलन से बाहर किया गया, जो कि पिछले साल की तुलना में 12.3 फीसदी ज्यादा है. हैरान करने वाली बात यह है कि चलन से बाहर किए गए नोटों में सबसे बड़ी संख्या 500 और 100 रुपये के नोटों की थी.
बताया जा रहा है कि देश में यूपीआई (UPI) और डिजिटल पेमेंट का ग्राफ भले ही आसमान छू रहा हो, लेकिन जमीन पर कैश का जलवा अब भी बरकरार है. मई के ताजा आंकड़ों के अनुसार, बाजार में मौजूद कुल मुद्रा (करेंसी इन सर्कुलेशन) सालाना आधार पर 11.5% बढ़कर 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है. इसी वजह से आरबीआई टिकाऊ नोटों का विकल्प तलाश रहा है.
2012 में भी हुआ था ट्रायल, अब तकनीक हुई एडवांसवैसे यह पहली बार नहीं है जब भारत में प्लास्टिक की करेंसी लाने की कोशिश हो रही है. इससे पहले साल 2012 में भी तत्कालीन सरकार ने देश के पांच चुनिंदा शहरों में 10 रुपये के करीब एक अरब प्लास्टिक नोटों का फील्ड ट्रायल शुरू किया था. हालांकि, उस समय कुछ तकनीकी कमियों और मशीनी बाधाओं के कारण यह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया था. लेकिन पिछले एक दशक में दुनिया और तकनीक दोनों काफी बदल चुकी हैं. आज के एडवांस सिस्टम के कारण वे पुरानी सभी बाधाएं पूरी तरह दूर हो चुकी हैं.
दुनिया के 60 देशों में पहले से दौड़ रहे हैं प्लास्टिक नोटदुनियाभर के करीब 60 देशों में पॉलिमर यानी प्लास्टिक नोटों का मॉडल बेहद सफल रहा है. इसकी शुरुआत सबसे पहले साल 1988 में ऑस्ट्रेलिया ने की थी, जब उसने 10 डॉलर का पहला प्लास्टिक नोट जारी किया था. इसके बाद सिंगापुर, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया, रोमानिया और कनाडा जैसे देशों ने कागजी नोटों को अलविदा कहकर इसे पूरी तरह अपना लिया. वहीं अगर अमेरिका के डॉलर की बात करें, तो वह पूरी तरह प्लास्टिक का नहीं होता, बल्कि उसे कॉटन और लिनन के एक बेहद मजबूत और खास मिश्रण से तैयार किया जाता है.
अब देखना होगा कि आरबीआई भारत में इस पायलट प्रोजेक्ट को कब तक हरी झंडी दिखाता है, लेकिन इतना साफ है कि आने वाले समय में आपकी जेब का लुक और फील दोनों बदलने वाला है.