पेट्रोल-डीजल की लिमिट तय करने वाली कंपनियों पर बरसी सरकार
देश में पेट्रोल और डीजल की बिक्री को लेकर चल रही तमाम चर्चाओं के बीच केंद्र सरकार ने अब एक बड़ा और कड़ा बयान दिया है। सरकार ने साफ तौर पर यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी निजी ईंधन विक्रेता को पेट्रोल या डीजल की बिक्री पर अपनी मर्जी से कोई भी सीमा (कैप) लगाने की बिल्कुल अनुमति नहीं दी जाएगी।
पेट्रोलियम सचिव नीरज मित्तल ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा है कि देश में ईंधन की बिक्री को सीमित करना किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है और सरकार इस पूरे मामले को लेकर निजी रिटेलर्स से सीधी बातचीत करेगी।
पेट्रोलियम सचिव नीरज मित्तल ने दो टूक शब्दों में कहा कि देश में किसी भी कंपनी को ईंधन की बिक्री पर सीमा तय करने की छूट नहीं दी जा सकती।
सरकार का साफ तर्क है कि पेट्रोल और डीजल जैसी जरूरी और बुनियादी चीजों की उपलब्धता हर समय सामान्य बनी रहनी चाहिए। हमारे देश में करोड़ों लोग रोजमर्रा के कामकाज के लिए अपने निजी और सार्वजनिक परिवहन पर पूरी तरह निर्भर हैं। इसके अलावा ट्रक, बस, खेती-किसानी की मशीनरी, कंस्ट्रक्शन सेक्टर, उद्योग और लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री भी डीजल पर बड़े पैमाने पर टिकी हुई है। ऐसे में अगर किसी भी इलाके में पेट्रोल पंप पर अचानक बिक्री की लिमिट तय कर दी जाती है, तो इसका बुरा असर सिर्फ आम गाड़ी चालकों पर ही नहीं, बल्कि देश की पूरी सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।
इस पूरे विवाद के पीछे सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में चल रहा भारी उतार-चढ़ाव माना जा रहा है। ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल के दाम बढ़ने के बावजूद हमारे देश के घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम उसी अनुपात में नहीं बढ़ाए गए।
इसकी वजह से तेल कंपनियों की लागत (Cost) और उनकी बिक्री कीमत के बीच का अंतर बहुत ज्यादा बढ़ गया। एक वरिष्ठ तेल कंपनी के अधिकारी के अनुसार, कुछ खास परिस्थितियों में कंपनियों को डीजल की हर एक लीटर बिक्री पर करीब 50 रुपये तक का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था।
इसके अलावा समस्या सिर्फ कीमतों के अंतर तक ही सीमित नहीं रही। जब बड़े कमर्शियल और इंडस्ट्रियल ग्राहकों ने थोक के बजाय सस्ते रिटेल पेट्रोल पंपों से ही भारी मात्रा में डीजल खरीदना शुरू कर दिया, तो कंपनियों के रिटेल स्टॉक पर अतिरिक्त दबाव आ गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जियो-बीपी के कुछ आउटलेट्स पर एक ग्राहक के लिए डीजल की बिक्री 50 लीटर तक सीमित कर दी गई थी, ताकि सीमित स्टॉक में से केवल बड़े खरीदार सारा ईंधन न ले जाएं और आम लोगों को भी राहत मिल सके।
इस पूरे मामले को गहराई से समझने के लिए रिटेल और होलसेल डीजल के बीच के भारी अंतर को जानना जरूरी है। बड़े औद्योगिक और कमर्शियल ग्राहक आमतौर पर भारी मात्रा में ईंधन खरीदते हैं और इसके लिए उनके पास थोक खरीद (बल्क सप्लाई) की व्यवस्था होती है।
यही स्थिति निजी कंपनियों के लिए गले की फांस बन गई। अगर कोई बड़ा कमर्शियल ग्राहक एक साथ सैकड़ों लीटर डीजल खींच लेता है, तो पंप का टैंक झटपट खाली हो जाता है और जब कोई आम ग्राहक अपनी बाइक या कार में कुछ लीटर तेल डलवाने पहुंचता है, तो उसे खाली हाथ लौटना पड़ता है। कंपनियों द्वारा लगाई गई सीमाओं के पीछे यही सबसे मुख्य वजह थी।
सरकार और निजी कंपनियों के बीच बातचीत जारीपेट्रोलियम सचिव ने यह भी याद दिलाया कि पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान भी सरकार ने निजी कंपनियों को साफ दिशा-निर्देश दिए थे और सरकार का रुख आज भी वही है। सरकार ईंधन की किसी भी प्रकार की कृत्रिम कमी या मनमाने ढंग से तय की गई बिक्री सीमाओं को लेकर पूरी तरह सतर्क है।
सरकार के इस कड़े रुख का सबसे सीधा और सकारात्मक फायदा आम पेट्रोल-डीजल उपभोक्ताओं को मिलने वाला है। यदि निजी कंपनियां अपनी बिक्री की सीमाएं हटाती हैं या नियमों में बदलाव करती हैं, तो आम चालकों के लिए ईंधन मिलना फिर से पूरी तरह आसान हो जाएगा। हालांकि, एक बार में कितनी मात्रा में तेल दिया जाएगा यह स्थानीय सुरक्षा नियमों और पंप की क्षमता पर भी निर्भर कर सकता है, लेकिन सरकार की आपत्ति मुख्य रूप से उन मनमानी सीमाओं पर है जो आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरतों को प्रभावित करती हैं।