रेस्टोरेंट की रसोई में कहां उड़ रहा है पैसा? गैस, बिजली और कच्चे माल का हिसाब रखने का सही तरीका

Newspoint

कई रेस्टोरेंट में ग्राहक भरे रहते हैं, फिर भी महीने के अंत में मालिक कहता है कि बचत कुछ नहीं हुई। इसकी सबसे आम वजह रसोई का वह खर्च है जो कभी लिखा ही नहीं गया। गैस कब खत्म हुई, सब्जी कितनी सड़ी, तेल कितना बहा, इसका हिसाब न हो तो मुनाफा कागज पर ही रह जाता है।

तीन खातों से शुरू करें, रोज लिखें

पहला खाता कच्चे माल का रखें। जो सामान आया, उसकी मात्रा और दाम लिखें, और दिन के अंत में बचा स्टॉक भी।

दूसरा खाता गैस और बिजली का हो, जिसमें सिलेंडर बदलने की तारीख और मीटर की रीडिंग हफ्तेवार दर्ज हो। तीसरा खाता बर्बादी का रखें, जिसमें फेंकी गई सब्जी, जला खाना और लौटाई गई प्लेट का अंदाजा लिखा जाए। ये तीनों खाते भारी भरकम सॉफ्टवेयर से नहीं, एक साधारण रजिस्टर से भी चल सकते हैं। असली बात निरंतरता है। हफ्ते भर बिक्री से इन खर्चों की तुलना करेंगे तो साफ दिखेगा कि किस चीज पर पैसा जरूरत से ज्यादा जा रहा है।

फूड कॉस्ट का हिसाब और रखरखाव की बचत

आम तौर पर किसी डिश की कीमत में कच्चे माल की लागत एक सीमा के भीतर रखना स्वस्थ माना जाता है, लेकिन यह प्रतिशत उदाहरण के तौर पर समझें, हर रेस्टोरेंट के किराए और इलाके के हिसाब से यह अलग हो सकता है।

हर डिश की सामग्री की लागत एक बार निकालकर लिख लें, फिर दाम बढ़ने पर उसे दोबारा जांचें। उपकरणों का रखरखाव भी छिपी बचत है। गंदा बर्नर ज्यादा गैस खाता है, ढीला फ्रिज ज्यादा बिजली लेता है और खराब सील वाला तंदूर ईंधन बर्बाद करता है। महीने में एक बार गैस पाइप, चूल्हे और फ्रिज की जांच कराना छोटे खर्च में बड़ा फायदा देता है। स्टॉक पहले आया, पहले इस्तेमाल हो, यह क्रम अपनाने से सड़ने वाली चीजें भी घटती हैं। हिसाब लिखने की आदत ही रसोई को घाटे से निकालती है।

कर्मचारियों को हिसाब की आदत में शामिल करें

हिसाब सिर्फ मालिक के लिखने से नहीं सुधरता, रसोइया और सहायक को भी इसमें शामिल करना पड़ता है। जो व्यक्ति सामान निकाले, वही रजिस्टर में मात्रा लिखे, यह नियम बनाएं। शाम को दस मिनट में दिन भर के सामान का मोटा मिलान करने से गड़बड़ी उसी दिन पकड़ में आती है। कई जगह बर्बादी इसलिए भी बढ़ती है क्योंकि अंदाजा ज्यादा बनता है। पिछले हफ्ते की बिक्री देखकर तैयारी का अनुमान लगाना सीखें, धीरे धीरे फेंकने वाला खाना अपने आप घटेगा। तेल और घी जैसी महंगी चीजों पर खास नजर रखें, क्योंकि इनकी छोटी बर्बादी भी महीने में बड़ी रकम बन जाती है।
सब्जी खरीदने का समय और दुकान तय करने से भाव में भी फर्क पड़ता है। कर्मचारियों को सजा के डर से नहीं, बचत में उनकी भागीदारी समझाकर जोड़ें। जहां स्टाफ को बोनस या सराहना बचत से जुड़ी मिलती है, वहां लापरवाही अपने आप कम होती देखी गई है। हिसाब का मकसद किसी को पकड़ना नहीं, रसोई की वह चुस्ती बनाना है जिससे हर प्लेट पर सही लागत आए और ग्राहक को गुणवत्ता भी पूरी मिले। यही आदत धीरे धीरे पूरे रेस्टोरेंट की कार्यशैली बदल देती है और हर महीने बचत साफ दिखने लगती है।