ब्रिक्स समिट में जुटे दुनिया के दिग्गज, पुतिन और जिनपिंग के आने से भारत को आखिर क्या मिला?

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राजधानी नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स 2026 शिखर सम्मेलन का अब सफलतापूर्वक समापन हो चुका है। इस बड़े वैश्विक सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति डॉक्टर मसूद पेज़ेश्कियान समेत कई दिग्गज नेता शामिल हुए। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब और मलेशिया जैसे अन्य देशों के शीर्ष नेताओं ने भी इस मंच पर अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई।

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एक ऐसे समय में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कड़े टैरिफ फैसलों की वजह से दुनिया भर के कारोबार में भारी उथल-पुथल मची हुई है, और दूसरी तरफ ईरान पर इजराइल तथा अमेरिका के संयुक्त हमलों के बाद से पूरा मध्य-पूर्व भयंकर संघर्ष के दौर से गुजर रहा है, ऐसे में दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले इन बड़े नेताओं का एक मंच पर इकट्ठा होना अपने आप में बहुत बड़ा भूचाल लाने वाला घटनाक्रम है। इससे ग्लोबल सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है और तेल तथा गैस की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
ऐसे नाज़ुक हालात में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह मंच किसी ठोस नतीजे तक पहुंच पाया है या इससे मेजबानी कर रहे भारत को भविष्य के लिए कोई बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि हासिल हुई है?

‘ग्लोबल साउथ’ को नजरअंदाज नहीं कर सकती दुनिया

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी का इस बारे में कहना है कि अगर आप नई दिल्ली घोषणापत्र पर गहराई से गौर करें, तो इसका सबसे मुख्य और बड़ा संदेश यही निकलता है कि दुनिया के बाकी देश अब ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज़ को किसी भी कीमत पर दरकिनार नहीं कर सकते हैं।

उनका साफ मानना है कि ब्रिक्स देशों ने मिलकर पूरी दुनिया को यह कड़ा संदेश देने की पूरी कोशिश की है कि अब अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में बड़े बदलाव लाने का समय आ गया है।

भारत और चीन के रिश्तों पर क्या पड़ेगा इसका असर?

भारत और ग्लोबल साउथ के दो सबसे बड़े देश ब्रिक्स संगठन का मुख्य हिस्सा हैं। 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समापन सत्र के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि सदस्य देशों और तमाम पार्टनर राष्ट्रों की यह व्यापक भागीदारी इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि ब्रिक्स की प्रासंगिकता, उसका खुलापन और समावेशी स्वरूप लगातार तेजी से बढ़ रहा है।

उन्होंने इस दौरान साफ कहा कि चूंकि अब ब्रिक्स अपने तीसरे दशक में प्रवेश करने जा रहा है, इसलिए दुनिया अब हमसे केवल बातों की नहीं बल्कि ठोस परिणामों की उम्मीद करती है। पिछले दो दिनों की गहन चर्चाओं ने इस भरोसे को और ज्यादा मजबूत किया है कि ब्रिक्स अब केवल कुछ देशों का मामूली समूह नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया भर की समस्याओं का सटीक समाधान उपलब्ध कराने वाला एक बेहद प्रभावी मंच बन चुका है।

भारत के पूर्व विदेश सचिव शशांक ने एक बातचीत में बताया कि कुल मिलाकर यह एक बेहद सफल आयोजन साबित हुआ है।

उन्होंने कहा कि कई लोग यह कयास लगा रहे थे कि अब ब्रिक्स का वजूद खत्म हो चुका है और इस बार कोई साझा घोषणापत्र भी जारी नहीं हो पाएगा, लेकिन शनिवार को सभी के सामने साझा घोषणापत्र जारी कर दिया गया। उनका मानना है कि संयुक्त राष्ट्र (UN) इस वक्त काफी कमजोर पड़ चुका है और वह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पा रहा है, ऐसे में ब्रिक्स अब आगे बढ़कर दुनिया की तमाम गंभीर समस्याओं, खासकर युद्धों और फलस्तीन के सुलगते मुद्दे पर सबसे अच्छे समाधान की तलाश कर रहा है।

नई दिल्ली घोषणापत्र की सबसे बड़ी और खास बातें

नई दिल्ली में आयोजित इस 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में शनिवार को जो संयुक्त रूप से साझा घोषणापत्र जारी किया गया, उसमें मुख्य रूप से तीन बेहद अहम मुद्दों को प्रमुखता से जगह दी गई। इसमें आतंकवाद के हर एक रूप की बहुत कड़े शब्दों में कड़ी आलोचना की गई, जो कि भारत के लिए हमेशा से एक सर्वोपरि और संवेदनशील मुद्दा रहा है। इस लिहाज से देखा जाए तो यह भारत की बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जा रही है। ब्रिक्स देशों ने आतंकवाद, इसकी तमाम आर्थिक मदद के स्त्रोतों, सीमा पार आतंकवाद और आतंकवादियों को सुरक्षित पनाहगाह दिए जाने के खिलाफ पूरी एकजुटता के साथ मिलकर कड़ी कार्रवाई करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है।
इस 45 पन्नों और 140 बिंदुओं वाले लंबे घोषणापत्र में विशेष तौर पर “22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकवादी हमले” की भी कड़ी निंदा की गई, जिसमें कुल 26 बेकसूर लोगों की जान चली गई थी। हालांकि, भारत इस तरह की घटनाओं के लिए सीधे तौर पर पाकिस्तान समर्थित संगठनों को जिम्मेदार मानता है, लेकिन इस घोषणापत्र में सीधे तौर पर पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया है, जबकि पाकिस्तान ने ऐसी हरकतों में अपनी किसी भी तरह की संलिप्तता से हमेशा की तरह इनकार किया है।

अमेरिका, टैरिफ और डॉलर को लेकर बड़ा संदेश

भले ही इस ब्रिक्स घोषणापत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या उनके लगाए गए कड़े टैरिफ का सीधा नाम नहीं लिया गया है, लेकिन इसमें इस बात पर गहरी चिंता जताई गई है कि किस तरह दुनिया के कई देश ‘अन्यायपूर्ण और एकतरफा संरक्षणवादी कदमों’ की वजह से भारी आर्थिक नुकसान उठा रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि इस घोषणापत्र का सीधा इशारा डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से भारत और चीन समेत दुनिया के कई प्रमुख देशों पर थोपे गए भारी-भरकम टैरिफ की तरफ ही था। ब्रिक्स, जो कि दुनिया की पांच सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक प्रमुख समूह है, अब विस्तार के बाद 11 देशों का एक शक्तिशाली संगठन बन चुका है।
इसके साथ ही कई पार्टनर देश भी लगातार इसके साथ जुड़ते जा रहे हैं, जिनके लिए वैश्विक व्यापार और टैरिफ इस वक्त सबसे बड़ा और ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है।

इसराइल, ईरान और मध्य-पूर्व के संकट पर बड़ा मंथन

इस शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान के राष्ट्रपति डॉक्टर मसूद पेज़ेश्कियान ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय बातचीत भी संपन्न हुई। पीएम मोदी ने इस मुलाकात के बाद सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान के राष्ट्रपति की यह पहली भारत यात्रा बेहद खास है और दोनों देशों की पुरानी मित्रता को दीर्घकालिक तथा लाभकारी रणनीति के साथ आगे बढ़ाने की जरूरत है।

नई दिल्ली घोषणापत्र में मध्य-पूर्व में दिन-प्रतिदिन बढ़ते तनाव पर भी “गहरी चिंता” व्यक्त की गई है। सम्मेलन में शामिल सभी देशों ने गाजा और कब्जे वाले फलस्तीनी इलाकों की दयनीय मानवीय स्थिति पर गंभीर चिंता जताते हुए वहां तत्काल प्रभाव से स्थायी युद्धविराम बनाए रखने और बिना किसी बाधा के मानवीय सहायता पहुंचाने की पुरजोर अपील की है। कुल मिलाकर, भले ही इस सम्मेलन से कोई तुरंत चमत्कारी नतीजा सामने न आया हो, लेकिन इसने ग्लोबल साउथ की ताकत को दुनिया के सामने मजबूती से जरूर रख दिया है।