पढ़ाई के लिए लैपटॉप खरीदने पर बैंक ईएमआई बेहतर या एकमुश्त भुगतान? कुल खर्च की तुलना करके ही लें फैसला

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पढ़ाई के लिए लैपटॉप खरीदते समय सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि पूरा पैसा एक साथ दिया जाए या हर महीने किस्तों में चुकाया जाए। दुकान पर ईएमआई का विकल्प आकर्षक लगता है, क्योंकि शुरुआत में कम रकम देनी होती है। लेकिन किस्तों में खरीदने पर कुल खर्च अक्सर बढ़ जाता है, क्योंकि उसमें ब्याज और प्रोसेसिंग शुल्क भी जुड़ जाता है। इसलिए फैसला लेने से पहले दोनों विकल्पों के कुल खर्च की तुलना करना जरूरी है, ताकि बाद में बजट पर बोझ न पड़े।

एकमुश्त भुगतान का फायदा यह है कि लैपटॉप की कीमत ही अंतिम खर्च होती है। इसमें कोई ब्याज नहीं लगता और कोई किस्त चुकाने की चिंता नहीं रहती। दूसरी ओर, ईएमआई से नकद राशि बच जाती है, जो पढ़ाई के दूसरे खर्चों में काम आ सकती है। लेकिन ईएमआई लेते समय सिर्फ मासिक किस्त की रकम देखना काफी नहीं है — कुल कितना पैसा देना होगा, यह देखना ज्यादा जरूरी है।

ईएमआई का कुल खर्च कैसे निकालें

ईएमआई का कुल खर्च निकालने के लिए तीन चीजें जोड़नी होती हैं — लैपटॉप की कीमत, उस पर लगने वाला ब्याज और प्रोसेसिंग शुल्क।

ब्याज और शुल्क पर 18% जीएसटी भी लगता है, जबकि मूल कीमत पर जीएसटी नहीं लगता। उदाहरण के लिए, अगर 60,000 रुपये का लैपटॉप 16% सालाना ब्याज पर 12 महीने की ईएमआई पर लिया जाए तो हर महीने की किस्त करीब 5,444 रुपये बनती है और कुल भुगतान करीब 65,326 रुपये हो जाता है। इसमें प्रोसेसिंग शुल्क अलग से जुड़ सकता है, जो आमतौर पर कीमत का 1 से 3% तक हो सकता है।

इसी उदाहरण में एकमुश्त भुगतान पर कुल खर्च 60,000 रुपये ही रहता है, जबकि ईएमआई पर करीब 5,326 रुपये ब्याज के रूप में ज्यादा देने पड़ते हैं। अगर प्रोसेसिंग शुल्क भी जुड़ जाए तो यह अंतर और बढ़ जाता है।

इसलिए ईएमआई लेते समय बैंक या कार्ड कंपनी से कुल ब्याज, शुल्क और जीएसटी की लिखित जानकारी जरूर मांगनी चाहिए। की फैक्ट्स स्टेटमेंट में ये सभी जानकारियां दी जाती हैं, जिसे पढ़ना बहुत जरूरी है।

नो कॉस्ट ईएमआई का सच क्या है

कई दुकानों पर नो कॉस्ट ईएमआई का विज्ञापन दिखता है, जिसका मतलब यह समझा जाता है कि कोई ब्याज नहीं लगेगा। असल में कई बार ब्याज को कीमत में छूट के रूप में समायोजित कर दिया जाता है, जिससे मासिक किस्त मूल कीमत के बराबर हिस्सों में बंट जाती है। लेकिन प्रोसेसिंग शुल्क पर 18% जीएसटी तब भी लग सकता है।

इसलिए नो कॉस्ट ईएमआई को भी मुफ्त नहीं समझना चाहिए — कुल भुगतान की रकम को एकमुश्त कीमत से मिलाकर ही देखना चाहिए।

ईएमआई लेते समय यह भी देखना चाहिए कि किस्त चुकाने में देरी होने पर क्या शुल्क लगेगा और क्या किस्त को बीच में बंद कराने पर कोई चार्ज देना होगा। कुछ योजनाओं में पहले से भुगतान करने पर भी शर्तें होती हैं। ये बातें जानने के बाद ही फैसला लेना समझदारी है।

किस स्थिति में कौन सा विकल्प बेहतर है

अगर पूरी रकम उपलब्ध है और दूसरे जरूरी खर्चों पर असर नहीं पड़ेगा तो एकमुश्त भुगतान आमतौर पर सस्ता रहता है।

इससे न ब्याज देना पड़ता है और न ही हर महीने किस्त की चिंता रहती है। लेकिन अगर पूरी रकम देने से पढ़ाई के दूसरे खर्चों, जैसे किताबें, इंटरनेट या कोचिंग पर असर पड़ेगा तो छोटी अवधि की ईएमआई एक विकल्प हो सकती है। इसमें अवधि जितनी छोटी होगी, ब्याज भी उतना ही कम लगेगा।

लैपटॉप खरीदने से पहले अपनी जरूरत भी तय कर लें। पढ़ाई के लिए बहुत महंगा लैपटॉप लेना जरूरी नहीं होता, जबकि कम कीमत के लैपटॉप से भी काम चल सकता है। सेकंड हैंड लैपटॉप खरीदने से पहले उसकी जांच भी एक विकल्प है, लेकिन उसमें वारंटी और बैटरी की स्थिति जरूर देखनी चाहिए।

किसी भी फैसले से पहले बैंक और विक्रेता से कुल खर्च की लिखित जानकारी जरूर ले लें, क्योंकि हर योजना की शर्तें अलग-अलग हो सकती हैं।