पेट्रोल 14 रुपये और डीजल 18 रुपये सस्ता! क्या आपके शहर में गिर गए दाम? जानें इस भारी छूट का असली सच

Newspoint

आज के दौर में जहां महंगाई आसमान छू रही है, वहां अगर कोई कहे कि पेट्रोल 14 रुपये और डीजल 18 रुपये सस्ता मिल रहा है, तो यकीन करना मुश्किल होता है। सोशल मीडिया और बाजार के गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है। लेकिन क्या वाकई आपकी जेब को इतनी बड़ी राहत मिली है? या फिर इस गणित के पीछे कोई और ही कहानी छिपी है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि तेल की कीमतों का असली खेल क्या है।

कंपनियां सह रही हैं घाटा, आपको मिल रही है राहत
Hero Image

हकीकत यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन भारत में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम स्थिर बने हुए हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि तेल सस्ता हो गया है, बल्कि इसका मतलब यह है कि तेल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) सारा बोझ खुद उठा रही हैं। रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक, मौजूदा वैश्विक कीमतों को देखते हुए तेल कंपनियां पेट्रोल पर प्रति लीटर 14 रुपये और डीजल पर प्रति लीटर 18 रुपये का नुकसान उठा रही हैं। सीधे शब्दों में कहें तो कंपनियां घाटे में तेल बेच रही हैं, इसीलिए आपको बढ़ी हुई कीमतें चुकानी नहीं पड़ रही हैं।

क्यों बढ़ रही हैं कच्चे तेल की कीमतें?

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 120-125 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में बढ़ता तनाव है। खासकर ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में सप्लाई को लेकर पैदा हुई बाधाओं ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। आपको बता दें कि दुनिया की लगभग 20% तेल और एलएनजी (LNG) सप्लाई इसी रास्ते से होती है। यहां जरा सी भी हलचल ग्लोबल मार्केट में आग लगा देती है, जिसका असर भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है।

रसोई गैस और खाद पर भी मंडरा रहे हैं बादल

तेल के साथ-साथ रसोई गैस (LPG) का गणित भी बिगड़ रहा है। कंपनियों को एलपीजी पर भी भारी ‘अंडर रिकवरी’ यानी घाटा हो रहा है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 तक यह घाटा 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इतना ही नहीं, खेती-किसानी से जुड़ी उर्वरक (Fertilizer) सब्सिडी का बोझ भी 2.25 लाख करोड़ रुपये तक जा सकता है, जो सरकार के बजट अनुमान से कहीं ज्यादा है।

क्या भविष्य में बढ़ेंगे दाम?

ऊर्जा की बढ़ती कीमतों की मार सिर्फ तेल कंपनियों पर ही नहीं, बल्कि केमिकल, फर्टिलाइजर और सिटी गैस वितरण जैसे सेक्टरों पर भी पड़ रही है।

कंपनियां अपनी लागत का पूरा बोझ आम जनता पर नहीं डाल पा रही हैं, जिससे उनका मुनाफा कम हो रहा है। जानकारों का मानना है कि जब तक दुनिया में तनाव कम नहीं होता और सप्लाई चैन सामान्य नहीं होती, तब तक यह दबाव बना रहेगा। अगर कंपनियां इसी तरह लंबे समय तक घाटा सहती रहीं, तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अचानक बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।