EPFO में पेंशन योग्य सैलरी और पीएफ योगदान की सैलरी अलग क्यों हो सकती है? जानें वजह
पीएफ खाते की पासबुक देखने पर कई लोगों को एक बात चौंकाती है। महीने की सैलरी से पीएफ का योगदान एक रकम पर कटता है, लेकिन पेंशन के लिए गिनी जाने वाली सैलरी कुछ और ही दिखती है। दोनों के आंकड़े अलग-अलग देखकर लगता है कि कहीं कोई गलती तो नहीं हो रही। असल में यह कोई गलती नहीं है, बल्कि ईपीएफओ की व्यवस्था का ही एक नियम है, जिसके तहत पेंशन योग्य सैलरी और पीएफ योगदान की सैलरी अलग-अलग हो सकती हैं।
पीएफ का योगदान बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते पर आधारित होता है। कर्मचारी हर महीने इस रकम का 12 प्रतिशत योगदान देता है और नियोक्ता भी 12 प्रतिशत देता है। नियोक्ता के हिस्से में से 8.33 प्रतिशत पेंशन योजना में जाता है और 3.67 प्रतिशत पीएफ खाते में जाता है। यह बंटवारा पेंशन योजना की नींव है और इसी से पेंशन का अधिकार बनता है।
यहां एक सीमा काम करती है, जिसे पीएफ की वेतन सीमा कहा जाता है। 17 सितंबर 2026 से यह सीमा 15,000 रुपये से बढ़कर 25,000 रुपये हो गई है।
पेंशन योग्य सैलरी वह औसत सैलरी होती है, जिस पर पेंशन की गणना की जाती है। यह पिछले 60 महीनों की औसत पेंशन योग्य सैलरी होती है।
पेंशन की न्यूनतम रकम 1,000 रुपये महीना तय है। पेंशन पाने के लिए कम से कम 10 साल की सेवा जरूरी है और पेंशन आमतौर पर 58 साल की उम्र से शुरू होती है। 50 साल की उम्र से पहले पेंशन लेने पर हर साल 4 प्रतिशत की कमी की जाती है। अगर सेवा 20 साल से ज्यादा हो, तो 2 साल का अतिरिक्त भार भी मिलता है।
अब फर्क साफ हो जाता है। पीएफ योगदान की सैलरी वह रकम है, जिस पर हर महीने योगदान कटता है, जबकि पेंशन योग्य सैलरी पिछले 60 महीनों का औसत है और वेतन सीमा से भी बंधा हो सकता है। अगर किसी कर्मचारी की सैलरी करियर के आखिरी सालों में तेजी से बढ़ी है, तो भी पेंशन योग्य सैलरी पिछले 5 साल के औसत पर ही बनेगी, आखिरी महीने की सैलरी पर नहीं। यही वजह है कि दोनों आंकड़े अलग दिखते हैं।
अपनी पेंशन का अनुमान कैसे लगाएं?अंत में यही सलाह है कि पीएफ और पेंशन को एक ही चीज न समझें। पीएफ एक बचत खाता है, जबकि पेंशन एक नियमित आमदनी की व्यवस्था है। दोनों के नियम अलग हैं और दोनों की गणना भी अलग तरीके से होती है।