पराली जलाने के बजाय कमाई के इतने रास्ते! किसान जान लें हर विकल्प का फायदा और उसकी असली सीमा
धान की कटाई के बाद खेत में बची पराली हर साल किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। अगली फसल की तैयारी के लिए खेत जल्दी खाली करना होता है और ऐसे में पराली जलाना सबसे आसान रास्ता लगने लगता है। लेकिन जलाने से उठता धुआं, मिट्टी के उपयोगी जीवाणुओं का नुकसान और कई जिलों में लागू नियम व जुर्माने का सवाल इस रास्ते को लगातार कठिन बना रहा है। ऐसे में पराली के व्यावसायिक विकल्पों पर किसानों की नजर जाना स्वाभाविक है।
पहला विकल्प है पराली को खेत में ही काटकर मिट्टी में मिला देना, जिसे मल्चिंग कहा जाता है। इससे खेत की नमी बनी रहती है और सड़ने के बाद पराली मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाती है। कुछ किसान पराली और गोबर से कंपोस्ट यानी खाद तैयार करके भी इसका उपयोग करते हैं, जिससे खेत की उर्वरता सुधरती है और रासायनिक खाद पर खर्च कुछ घट सकता है। इन विकल्पों की सीमा यह है कि इनके लिए मशीनों की समय पर उपलब्धता और अगली बुवाई तक का समय होना जरूरी है। कई क्षेत्रों में कस्टम हायरिंग सेंटर यानी सीएचसी से पराली प्रबंधन की मशीनें किराए पर मिलती हैं, जिससे अपनी मशीन खरीदे बिना काम हो जाता है।
दूसरा रास्ता है पराली को बेचना। बेलर मशीन से पराली की गांठें बांधकर उन्हें खरीदारों तक पहुंचाया जा सकता है। कुछ इलाकों में पैकेजिंग सामग्री बनाने वाली इकाइयां और ब्रिकेट या पैलेट जैसे ईंधन बनाने वाले उद्योग पराली खरीदते हैं। गेहूं का भूसा पशु चारे के रूप में लंबे समय से बिकता है, जबकि धान की पराली का चारे के रूप में उपयोग सीमित माना जाता है। इन विकल्पों से कुछ आमदनी संभव है, लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं होती।
कई राज्यों में पराली प्रबंधन की मशीनों के उपयोग को बढ़ावा देने की कोशिशें चलती रही हैं, इसलिए अपने जिले के कृषि विभाग और कस्टम हायरिंग सेंटर से ताजा जानकारी लेना फायदेमंद रहता है।
ध्यान रखने वाली सबसे बड़ी बात है परिवहन की लागत।