कंपनियां अब सामान बेचने के बजाय किराए पर क्यों दे रही हैं? जानिए रेंट-टू-ओन मॉडल का असली गणित

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नए शहर में नौकरी लगी, मकान किराए पर लिया और अब सोफा, बिस्तर, फ्रिज और वाशिंग मशीन खरीदने का झंझट सामने है। कुछ साल पहले तक इकलौता रास्ता था या तो खरीदो या किश्तों पर लो। अब तीसरा रास्ता तेजी से बढ़ रहा है। कंपनियां यही सामान महीने के किराए पर दे रही हैं और कई योजनाओं में तय अवधि पूरी होने पर वह सामान ग्राहक का ही हो जाता है। इसी को रेंट-टू-ओन मॉडल कहा जाता है। सवाल उठता है कि कंपनियां एक बार में पूरी कीमत लेने के बजाय धीरे-धीरे किराया लेना क्यों पसंद कर रही हैं।

रेंट-टू-ओन मॉडल आखिर है क्या

इस मॉडल के दो रूप हैं। पहला है सीधा किराया, जिसमें सामान हमेशा कंपनी का ही रहता है और जरूरत खत्म होने पर लौटाना पड़ता है। दूसरा है रेंट-टू-ओन, जिसमें ग्राहक तय महीनों तक किराया देता है और अवधि पूरी होने पर सामान उसका हो जाता है या नाममात्र की रकम देकर खरीदने का विकल्प मिलता है। समझौते में मासिक किराया, अवधि, जमा राशि, रखरखाव की जिम्मेदारी और बीच में सामान लौटाने की शर्तें लिखी होती हैं। कई कंपनियां खराबी आने पर मुफ्त मरम्मत या सामान बदलने की सुविधा भी इसी किराए में जोड़ देती हैं।

ग्राहक के लिए यह किश्त जैसा लगता है, लेकिन फर्क यह है कि किश्त में सामान पहले दिन से आपका होता है, जबकि यहां मालिकाना हक आमतौर पर अवधि पूरी होने के बाद ही मिलता है।

कंपनियां बेचने के बजाय किराए का रास्ता क्यों चुन रही हैं

कंपनी के हिसाब से देखें तो बिक्री में पैसा एक बार आता है, जबकि किराए में हर महीने पक्की आमदनी बनती है और ग्राहक लंबे समय तक जुड़ा रहता है। एक ही सोफा या फ्रिज लौटने के बाद साफ-सफाई और मरम्मत करके दूसरे ग्राहक को दिया जा सकता है, यानी एक ही सामान से कई बार कमाई होती है।

दूसरी बड़ी वजह है बदलती जीवनशैली। पढ़ाई और नौकरी के लिए शहर बदलने वाले युवा भारी फर्नीचर खरीदकर बांधना नहीं चाहते। उनके लिए किराया आसान विकल्प है। कंपनी के लिए जोखिम भी बंट जाता है, क्योंकि सामान उसके नाम पर रहता है और किराया न मिलने पर वह सामान वापस ले सकती है। साथ में रखरखाव और बीमा जैसी सेवाएं जोड़कर कंपनियां अतिरिक्त कमाई भी करती हैं।

ग्राहक के लिए फायदा भी है और जाल भी

ग्राहक की तरफ से फायदा साफ है। एक साथ बड़ी रकम नहीं निकालनी पड़ती, शुरुआत में जेब पर बोझ हल्का रहता है और जरूरत बदलने पर सामान बदला या लौटाया जा सकता है।

लेकिन असली हिसाब समझौते से पहले जोड़ना जरूरी है। पूरी अवधि का कुल किराया जोड़कर देखें, क्योंकि कई योजनाओं में कुल भुगतान सामान की असली कीमत से डेढ़ से दो गुना तक पहुंच सकता है। दूसरी चेतावनी यह है कि अवधि बीच में छोड़ने पर पहले दिया किराया और जमा राशि आमतौर पर वापस नहीं मिलती। किराया चूकने पर विलंब शुल्क और वसूली की शर्तें भी लिखी होती हैं। इसलिए फैसला इस आधार पर करें कि सामान कितने समय तक सच में चाहिए। अगर इस्तेमाल दो-तीन साल से ज्यादा का है, तो खरीदना या किश्त अक्सर सस्ता पड़ता है। समझौते की छोटी छपाई ध्यान से पढ़ें और कुल भुगतान की रकम अपने हाथ से जोड़कर ही हस्ताक्षर करें।