'पेंशन कोई भीख या दान नहीं…' पुरानी पेंशन और 3.833 फिटमेंट फैक्टर पर आया अब तक का सबसे बड़ा बयान

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आठवें वेतन आयोग (8th Pay Commission) का बेसब्री से इंतजार कर रहे लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के मन में इन दिनों सिर्फ एक ही बड़ा सवाल घूम रहा है- “क्या सच में हमारी न्यूनतम बेसिक सैलरी ₹18,000 से सीधे बढ़कर ₹69,000 हो जाएगी?” सोशल मीडिया से लेकर सरकारी दफ्तरों के गलियारों तक 3.833 फिटमेंट फैक्टर को लेकर चर्चाओं का बाजार बेहद गर्म है। कोई इसे कर्मचारियों का जायज हक बता रहा है, तो कोई देश के खजाने पर बोझ बताते हुए इसे नामुमकिन मान रहा है।

इन तमाम अटकलों, दावों और चिंताओं के बीच नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवे मैन (NFIR) के जनरल सेक्रेटरी और NC-JCM (स्टाफ साइड) के बड़े लीडर डॉ. एम. राघवैया ने स्थिति पूरी तरह साफ कर दी है। 92 साल के डॉ. राघवैया के पास आजाद भारत के लगभग हर वेतन आयोग का एक लंबा और ऐतिहासिक अनुभव है। उन्होंने हाल ही में आठवें वेतन आयोग की अध्यक्ष जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई और अन्य वरिष्ठ सदस्यों से आमने-सामने मुलाकात की है। आइए, देश के लाखों कर्मचारियों से जुड़े 10 सबसे बड़े और तीखे सवालों के जवाब सीधे डॉ. एम. राघवैया की जुबानी आसान शब्दों में समझते हैं।

सवाल 1: वेतन आयोग के साथ पहली मीटिंग में क्या हुआ और उनका क्या रुख था?

जवाब:

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बीती 28 अप्रैल को चंद्रलोक बिल्डिंग में वेतन आयोग की अध्यक्ष जस्टिस रंजना देसाई (Ranjana Prakash Desai) और मेंबर सेक्रेटरी पंकज जैन (Pankaj Jain) के साथ करीब डेढ़ घंटे की पहली और बेहद अहम बैठक हुई। हमने आयोग के सामने साफ तौर पर यह बात रखी कि भारत सरकार ने जो आज 3 ट्रिलियन डॉलर की मजबूत इकॉनमी का मुकाम हासिल किया है, उसके असली सूत्रधार और रीढ़ की हड्डी केंद्र सरकार के कर्मचारी ही हैं। हमने मांग की कि उनके इसी समर्पण और रात-दिन की मेहनत को एक सम्मानजनक पे-पैकेज में बदला जाए। फिलहाल आयोग की तरफ से कोई सीधा रिएक्शन या लिखित कमिटमेंट नहीं आया है। उन्होंने हमारी सभी दलीलों को बेहद ध्यान से सुना और नोट किया है। आगे चलकर हर मिनिस्ट्री और देश के 36 लाख कर्मचारियों के अलग-अलग प्रतिनिधियों के साथ अभी कई दौर की विस्तार से चर्चा होनी बाकी है।

सवाल 2: 3.833 का फिटमेंट फैक्टर और ₹69,000 बेसिक सैलरी की मांग सुनने में तो अच्छी है, लेकिन क्या यह प्रैक्टिकल है?

जवाब:

यह मांग हवा में उड़ाया गया कोई नंबर नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से साइंटिफिक, तार्किक और प्रैक्टिकल है। हमने इसके लिए बाकायदा 1957 के आईएलसी (ILC) रेजोल्यूशन और डॉ. ऑक्राइड के प्रतिष्ठित फॉर्मूले को अपना आधार बनाया है। एक आम इंसान को पूरी तरह स्वस्थ रहने और काम करने के लिए रोजाना कम से कम 2700 कैलोरी वाले भोजन की जरूरत होती है। आज के बदलते दौर में मोबाइल, कपड़े, बच्चों की पढ़ाई और जीवन जीने के लिए जरूरी हर छोटी-बड़ी चीज बेहद महंगी हो चुकी है। अगर साल 2016 में तय की गई ₹18,000 की बेसिक सैलरी को आज के समय की महंगाई और बुनियादी जरूरतों के हिसाब से 3.8 के फिटमेंट फैक्टर से मल्टीप्लाई (गुणा) किया जाए, तो न्यूनतम वेतन हर हाल में ₹69,000 ही बनता है। यह कर्मचारियों का वाजिब और कानूनी हक है।

सवाल 3: अगर सरकार इस मांग को मान लेती है, तो क्या देश की अर्थव्यवस्था पर भारी वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा?

जवाब:

सरकार पर वित्तीय बोझ जरूर आएगा, लेकिन आज भारत सरकार की आर्थिक स्थिति इस बोझ को बेहद आसानी से सहने के काबिल हो चुकी है। हमारी इकॉनमी दुनिया भर में बहुत मजबूत हुई है। अगर हम अकेले रेलवे का ही उदाहरण लें, तो केंद्र सरकार के करीब 40% कर्मचारी सिर्फ रेलवे विभाग में कार्यरत हैं। रेलवे अपना पैसा और राजस्व खुद कमाता है। हम अपनी खुद की मेहनत और कमाई से ही कर्मचारियों को सैलरी और पेंशन दे रहे हैं और उसके बावजूद भारतीय रेलवे लगातार बंपर मुनाफा कमा रहा है। एक और बड़ी बात यह है कि जब कर्मचारियों के हाथ में ज्यादा पैसा आएगा, तो उनकी पर्चेजिंग पावर यानी बाजार में सामान खरीदने की क्षमता बढ़ेगी। इससे पैसा घूमकर वापस बाजार में जाएगा और हमारी घरेलू इकॉनमी को और भी ज्यादा रफ्तार और फायदा मिलेगा।

सवाल 4: फैमिली यूनिट को 3 से बढ़ाकर 5 करने के पीछे क्या बड़ी वजह है?

जवाब:

पुराने वेतन आयोगों के समय पति, पत्नी और दो बच्चों यानी कुल मिलाकर ‘यूनिट 3’ के आधार पर न्यूनतम सैलरी का कैलकुलेशन किया जाता था। लेकिन अब वक्त बदल चुका है। भारत सरकार के नए नियम और देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के कई ऐतिहासिक जजमेंट साफ तौर पर कहते हैं कि बुजुर्ग माता-पिता की उचित देखभाल करना भी कर्मचारी का कानूनी और नैतिक कर्तव्य है। जब माता-पिता की पूरी जिम्मेदारी कर्मचारी के कंधों पर है, तो उनके रहने, खाने और दवाइयों के खर्चे भी सैलरी का हिस्सा होने चाहिए। इसलिए हमने फैमिली यूनिट को 3 से बढ़ाकर सीधे 5 करने की मांग पूरी मजबूती के साथ आयोग के टेबल पर रखी है। यह एक सामाजिक और कानूनी हकीकत है जिसे नकारा नहीं जा सकता।

सवाल 5: प्राइवेट सेक्टर के लोग कहते हैं कि इतनी सैलरी तो उन्हें भी नहीं मिलती, तो सरकारी नौकरी में इतना पैसा क्यों दिया जाए?

जवाब:

प्राइवेट सेक्टर का मुख्य और इकलौता मकसद सिर्फ कॉर्पोरेट मुनाफा कमाना होता है, और वहां कई बार लेबर का जबरदस्त शोषण भी देखने को मिलता है। इसके बिल्कुल उलट, सरकारी कर्मचारी देश की नीतियों को जमीन पर लागू करते हैं और पूरी गवर्नेंस (शासन व्यवस्था) को संभालते हैं। हमारे 80% से ज्यादा कर्मचारी बेहद रिमोट और सुदूर इलाकों, घने जंगलों और 48 डिग्री की तपती और झुलसा देने वाली गर्मी में बिना किसी आधुनिक सुविधा के दिन-रात काम करते हैं। जब जंग के हालात होते हैं, तो सेना को बॉर्डर पर वार टैंक और हथियार पहुंचाने का जोखिम भरा काम रेलवे का आम कर्मचारी ही करता है। इसलिए सरकारी कर्मचारियों के काम और उनकी जिम्मेदारियों की तुलना प्राइवेट सेक्टर से करना पूरी तरह से गलत और बेमानी है।

सवाल 6: जो लोग ट्रैक या बॉर्डर जैसे बेहद मुश्किल और खतरनाक जगहों पर काम कर रहे हैं, क्या उनके लिए सैलरी या अलाउंस का कोई अलग स्लैब होगा?

जवाब:

बिल्कुल, हमने आयोग के सामने हर कैटेगरी के रोल और रिस्क को क्वांटिफाई (मूल्यांकन) करने की मांग रखी है। एक रेलवे ट्रैक मेंटेनर कड़ाके की ठंड और भारी बारिश में भी 15 किलो का भारी-भरकम टूल लेकर रोज 12 किलोमीटर रेल की पटरियां पैदल चेक करता है, उसकी जिंदगी का रिस्क बहुत बड़ा है। अनिल काकोदकर कमेटी की रिपोर्ट के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, महज ढाई साल के भीतर 860 रेल कर्मचारियों की ऑन-ड्यूटी जान चली गई। हमने आयोग से बेहद कड़े शब्दों में कहा है कि रिस्क, हार्डशिप (कठिनाई), ड्यूटी के घंटे (जैसे लोको पायलट लगातार 14 घंटे तक काम करते हैं) और जिम्मेदारी के स्तर के आधार पर अलाउंस (भत्ते) और पे-पैकेज बिल्कुल नए सिरे से फिक्स किए जाने चाहिए।

सवाल 7: इंक्रीमेंट को लेकर कर्मचारियों की क्या मांग है? क्या यह परफॉर्मेंस देखकर तय होगा या सबको बराबर मिलेगा?

जवाब:

हमारा मानना है कि इंक्रीमेंट का सिस्टम फ्लैट होना चाहिए। हमने आयोग के सामने हर साल 6% सालाना इंक्रीमेंट की बड़ी मांग रखी है। अगर कोई भी कर्मचारी साल के 12 महीने संतोषजनक ढंग से अपना काम पूरा करता है, तो उसे यह इंक्रीमेंट बिना किसी भेदभाव के मिलना चाहिए। इसके साथ ही, हमने एक ओपन-एंडेड पे-स्केल का भी प्रपोजल दिया है। मौजूदा 7वें वेतन आयोग में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि लोग एक ही पे-लेवल पर 15-20 साल तक अटके रह जाते हैं और उन्हें आगे बढ़ने या प्रमोशन का मौका नहीं मिलता। इस ठहराव और नुकसान से कर्मचारियों को बचाने के लिए हमने सिस्टम को बेहतर और लचीला बनाने का प्रपोजल दिया है।

सवाल 8: देश में महंगाई भत्ता (DA) 50% के पार जा चुका है, तो क्या इसे अब बेसिक सैलरी में मर्ज किया जाएगा?

जवाब:

कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स यानी बाजार की वास्तविक महंगाई के आंकड़ों के आधार पर ही कर्मचारियों का DA तय होता है और बढ़ता है। जब साल 2014 में भी डीए 50% के पार गया था, तब भी हमारी तरफ से इसे बेसिक सैलरी में मर्ज करने की पुरजोर मांग की गई थी। नियम यही कहता है कि जब मार्केट में महंगाई परमानेंट रूप से बढ़ जाती है, तो पैसे की वास्तविक वैल्यू कम हो जाती है। यह जो डीए 50% के ऊपर हुआ है, वह अब पूरी तरह से परमानेंट है क्योंकि बाजार में रसोई गैस, पेट्रोल या खाने के तेल के दाम अब कभी कम नहीं होने वाले। इसलिए, जेसीएम (JCM) का रुख एकदम स्पष्ट है कि इस 50% DA को तुरंत बेसिक पे में मर्ज कर दिया जाना चाहिए ताकि कर्मचारियों को सही राहत मिले।

सवाल 9: देश के लाखों पेंशनर्स और पुरानी पेंशन योजना (OPS) को लेकर वेतन आयोग के सामने क्या बड़ी बात रखी गई है?

जवाब:

साल 1982 में आए सुप्रीम कोर्ट के एक बेहद ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, पेंशन कोई दान, खैरात या भिक्षा नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी द्वारा देश को दी गई सेवाओं का उसका कानूनी अधिकार है। रेलवे और डिफेंस जैसे जोखिम भरे और बड़े विभागों के लिए पुरानी पेंशन योजना (OPS) को हर हाल में बहाल करने की मांग हमने आयोग के सामने बहुत कड़े ढंग से रखी है। इसके अलावा, हमने संसद की उस संसदीय समिति की रिपोर्ट का भी पूरा हवाला दिया है, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि 65 साल की उम्र पार होने के बाद पेंशन में 5% और 70 साल की उम्र के बाद 5% की और अतिरिक्त बढ़ोतरी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए, ताकि बुढ़ापे और बीमारी के समय देश के बुजुर्ग पेंशनर्स पूरी गरिमा और सम्मान के साथ अपनी जिंदगी जी सकें।

सवाल 10: अगर केंद्र सरकार आपकी 3.833 फिटमेंट फैक्टर की मांग नहीं मानती है, तो कम से कम कितने नंबर पर आप लोग रजामंदी जताएंगे?

जवाब:

इस बात पर अभी कुछ भी कहना बहुत जल्दबाजी होगी। अभी तो वेतन आयोग के साथ बातचीत और प्रक्रियाओं की सिर्फ शुरुआत हुई है। वेतन आयोग को सबसे पहले हमारी तरफ से दिए गए 3.833 के पूरे लॉजिक, महंगाई के इंडेक्स और साइंटिफिक डेटा का गहराई से अध्ययन करना है। अगर सरकार 2016 वाले 2.57 के पुराने फैक्टर को ही दोबारा कर्मचारियों पर थोपने की कोशिश करती है, तो वह कर्मचारियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय होगा और यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि साल 2016 से 2026 के बीच के इन 10 वर्षों में दुनिया और देश बहुत बदल चुका है, माता-पिता की देखभाल का खर्च बढ़ गया है और नई टेक्नोलॉजी का खर्च भी जुड़ चुका है। फिलहाल हम वेतन आयोग की पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं, इसके बाद ही जेसीएम और तमाम केंद्रीय फेडरेशंस एक साथ बैठकर आगे की कड़क रणनीति तय करेंगे।

आपको बता दें कि आठवें वेतन आयोग को लेकर देश भर के केंद्रीय और राज्य कर्मचारियों की उम्मीदें इन दिनों सातवें आसमान पर पहुंच चुकी हैं। 3.833 का फिटमेंट फैक्टर, बेसिक सैलरी में भारी बढ़ोतरी और पुरानी पेंशन की बहाली जैसे बड़े मुद्दे इस बार केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी परीक्षा और चुनौती साबित होने वाले हैं। अब देखना यह होगा कि आने वाले कुछ महीनों में वेतन आयोग कर्मचारियों के इन ठोस और मजबूत तर्कों पर क्या अंतिम फैसला सुनाता है।