UP Electricity Bill: यूपी वालों की चांदी! बिजली बिल पर आया अब तक का सबसे बड़ा फैसला, देखें अपडेट
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक बहुत ही शानदार और राहत भरी खबर आ रही है। अगर आप भी हर महीने आने वाले भारी-भरकम बिजली के बिल से परेशान रहते हैं, तो आपके लिए यह सुकून देने वाली खबर है। इस चालू वित्तीय वर्ष में भी प्रदेश में बिजली की दरों (Electricity Rates) में बढ़ोतरी होने की संभावना ना के बराबर है। अगर सब कुछ ठीक रहा और बिजली कंपनियों की मनमानी पर लगाम कसी रही, तो यह लगातार सातवां साल होगा जब यूपी में बिजली के दाम नहीं बढ़ेंगे।
दरअसल, बुधवार को विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार की अगुवाई में राज्य सलाहकार समिति की एक बेहद अहम बैठक हुई। इस बैठक में पावर कारपोरेशन द्वारा आने वाले सालों के लिए पेश की गई अपनी कमाई और खर्च की रिपोर्ट (ARR) पर लंबी चर्चा हुई। लेकिन इस मीटिंग में जो सबसे चौंकाने वाली बात सामने आई, उसने बिजली कंपनियों के होश उड़ा दिए।
उपभोक्ता परिषद ने बैठक में सीधे-सीधे दावा कर दिया कि यूपी की बिजली कंपनियों के पास पहले से ही करीब 51 हजार करोड़ रुपये का भारी-भरकम ‘सरप्लस’ (अतिरिक्त पैसा) जमा है। ऐसे में बिजली का दाम बढ़ाना तो दूर, बल्कि इसे तुरंत कम किया जाना चाहिए। बिजली के दाम 45% तक कम करने का तगड़ा प्लानउपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने बैठक में दोटूक शब्दों में कहा कि जब कंपनियों की तिजोरी पहले से ही जनता के पैसों से भरी हुई है, तो फिर आम लोगों पर महंगाई का नया बोझ डालने का कोई मतलब ही नहीं बनता।
उन्होंने आयोग के सामने एक बड़ा गणित रखते हुए कहा कि अगर इस 51 हजार करोड़ रुपये का हिसाब-किताब सही से बिठाया जाए, तो यूपी में बिजली की दरों को एक झटके में करीब 45 फीसदी तक सस्ता किया जा सकता है। अगर कंपनियां ऐसा नहीं करना चाहती हैं, तो वे अगले पांच सालों तक हर साल बिजली बिलों में 8% की सीधी कटौती कर जनता को बड़ी राहत दे सकती हैं। अब गांव-शहर सबको चाहिए 24 घंटे फुल बिजलीइस हाई-प्रोफाइल बैठक में सिर्फ बिल ही नहीं, बल्कि बिजली कटौती (रोस्टर व्यवस्था) को हमेशा के लिए खत्म करने की मांग भी जोर-शोर से उठाई गई।
बिजली दरों के अलावा इस बैठक में स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना को लेकर भी जमकर बहस हुई। परिषद ने आरोप लगाया कि इस योजना को लागू करने में होने वाला लगभग 3,838 करोड़ रुपये का भारी-भरकम खर्च चुपके से आम उपभोक्ताओं की जेब पर डालने की तैयारी चल रही है, जो कि पूरी तरह से गलत है।