मानसून में 42% की भारी गिरावट से कांपा देश, 315 जिलों को सूखे से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने कसी कमर
इस साल देश के करोड़ों किसानों और खेती-किसानी पर मौसम की बहुत बड़ी मार पड़ती हुई दिखाई दे रही है. चालू मानसून सीजन में अल नीनो (El Nino) के खतरनाक असर के बीच 23 जून तक पूरे भारत में होने वाली सामान्य बारिश में 42 फीसदी की भारी कमी दर्ज की गई है. मौसम के इस बिगड़े मिजाज को देखते हुए अब केंद्र सरकार पूरी तरह से एक्शन मोड में आ गई है और खरीफ की फसलों को बर्बाद होने से बचाने के लिए युद्धस्तर पर आपातकालीन उपाय तेज कर दिए गए हैं.
सरकार ने देश के उन 315 जिलों की बकायदा पहचान कर ली है, जहां इस समय सबसे कम बारिश हुई है और सिंचाई के साधनों की भारी किल्लत है. केंद्र ने इन सभी प्रभावित राज्यों को अपने यहां जिले के हिसाब से एक कड़ा एक्शन प्लान तैयार करने का सख्त निर्देश दिया है. नए कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को कमजोर मानसून से निपटने के लिए देश की तैयारियों की एक हाई-लेवल समीक्षा बैठक की. उन्होंने खेती के कुल उत्पादन पर पड़ने वाले बुरे असर को कम करने के लिए पानी की एक-एक बूंद बचाने, फसल विविधीकरण (क्रॉप डायवर्सिफिकेशन) करने और पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से बुआई करने पर विशेष जोर दिया है.
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो अल नीनो मौसम पैटर्न का सीधा संबंध हमेशा से औसत से कम बारिश होने और खरीफ फसलों के कम उत्पादन से रहा है.कम बारिश के बीच अब तक कितनी हो चुकी है बुवाई?केंद्र सरकार ने साल 2026 के इस खरीफ सीजन के लिए कुल अनाज उत्पादन का लक्ष्य लगभग 176 मिलियन टन तय किया है, जो ठीक पिछले साल के सीजन के कुल उत्पादन के बराबर ही रखा गया है. राहत की बात यह है कि देश में अब तक हुई कम बारिश के बावजूद, 22 जून तक करीब 11.99 मिलियन हेक्टेयर कृषि योग्य जमीन पर फसलों की बुआई का काम पूरा हो चुका है, जो एक साल पहले की समान अवधि के 11.79 मिलियन हेक्टेयर के मुकाबले मामूली रूप से थोड़ा ज़्यादा है.
सरकार ने जिन 315 ज़िलों की पहचान की है, उन्हें उनकी संवेदनशीलता के आधार पर तीन अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया है:
उच्च प्राथमिकता (High Priority) वाली श्रेणी में सबसे पहले उन 111 ज़िलों को रखा गया है, जहां पर कृत्रिम सिंचाई की सुविधा महज 25 फीसदी से भी कम उपलब्ध है. इसके बाद 76 जिले मध्यम प्राथमिकता (Medium Priority) वाली श्रेणी में शामिल किए गए हैं, जहां सिंचाई की व्यवस्था 25 से 50 फीसदी के बीच है. वहीं, बाकी बचे 128 ज़िलों को अपेक्षाकृत कम संवेदनशील माना गया है क्योंकि वहां स्थानीय जलाशयों और अन्य सरकारी स्रोतों से सिंचाई की बेहतर सुविधाएं पहले से मौजूद हैं.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें से ज्यादातर प्रभावित जिले मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे बड़े राज्यों में फैले हुए हैं.
देश में मानसून की धीमी प्रगति पर आयोजित इस अहम समीक्षा बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए स्वीकार किया कि अगर कुल मिलाकर देखा जाए, तो इस समय देश में मानसून की बारिश में करीब 43 प्रतिशत की बड़ी कमी चल रही है.
इस संकट को देखते हुए मंत्रालय ने राज्य-वार विशेष आकस्मिक योजनाएं तैयार की हैं, जिनमें कम बारिश और कम पानी की स्थिति के बिल्कुल अनुकूल रहने वाली वैकल्पिक फसलों की बोआई करने की सिफारिश की गई है. केंद्र की तरफ से सभी राज्यों को यह कड़ा निर्देश दिया गया है कि वे अपने-अपने इलाकों में कम पानी की जरूरत वाली दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों (मिलेट्स) की खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दें.
कृषि मंत्री ने किसानों को ढांढस बंधाते हुए कहा कि भले ही बारिश में कमी है, लेकिन हमें सही समय पर किसानों को वैकल्पिक फसलें अपनाने का सुझाव देने की सख्त जरूरत है. हम किसी भी कीमत पर देश के खेतों को खाली और बंजर नहीं रहने देंगे. उन्होंने यह भी साफ किया कि इस चालू सीजन के लिए देश में उन्नत बीजों और सरकारी खाद की पर्याप्त उपलब्धता मौजूद है.
सभी राज्यों से कड़े शब्दों में कहा गया है कि वे उपलब्ध पानी का बेहद समझदारी और किफायत से इस्तेमाल करें. सिंचाई की जरूरतों के लिए पानी को सुरक्षित रखने के मकसद से ‘वीबी-ग्राम जी’ (विकसित भारत रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन ग्रामीण) कार्यक्रम के तहत गांवों के तालाबों, छोटी नदियों, खेतों के पोखरों और चेक डैम की युद्धस्तर पर खुदाई और सफाई का काम शुरू करें.