सोने की चमक हमेशा के लिए हुई फीकी या आने वाली है रिकॉर्डतोड़ तेजी? भयंकर गिरावट के बीच एक्सपर्ट्स ने क्या दी सलाह

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नई दिल्ली: जो सोना पिछले साल यानी 2025 में करीब 65% की तूफानी तेजी दिखाकर हर निवेशक का लाडला बना हुआ था, वही सोना इस साल यानी 2026 में उम्मीदों पर पूरी तरह खरा नहीं उतर पाया है। साल 2026 की पहली छमाही (First Half) खत्म होने तक गोल्ड ने निवेशकों को करीब 4% का निगेटिव रिटर्न दिया है। इस अप्रत्याशित गिरावट ने बड़े-बड़े सूरमाओं और आम रिटेल निवेशकों को भारी असमंजस में डाल दिया है कि क्या इस मंदी को खरीदारी का मौका मानकर दांव लगाएं या फिर फिलहाल सोने से दूरी बना लेने में ही भलाई है।

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रिकॉर्ड ऊंचाई से अर्श से फर्श पर कैसे आया सोना?

अगर साल 2026 में सोने के अब तक के सफर पर नजर डालें, तो इसकी शुरुआत बेहद धमाकेदार रही थी। अक्टूबर 2022 से बाजार में जो तेजी का सिलसिला शुरू हुआ था, उसके दम पर जनवरी 2026 के आखिरी दिनों तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाते हुए 5,602 डॉलर प्रति औंस के ऑल-टाइम हाई स्तर पर पहुंच गया था। लेकिन इस आसमान छूती ऊंचाई के बाद मध्य पूर्व (Middle East) में अचानक नया भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष शुरू हो गया, जिसने पूरे कमोडिटी बाजार का रुख ही पलट कर रख दिया।

आमतौर पर माना जाता है कि संकट के समय सोने के दाम बढ़ते हैं, लेकिन युद्ध जैसी गंभीर परिस्थितियों में कई बार बड़े निवेशकों और संस्थाओं को तुरंत भारी नकदी (Cash) की जरूरत पड़ जाती है। ऐसे में कई निवेशकों ने मुनाफावसूली (Profit Booking) करने के लिए ताबड़तोड़ सोना और चांदी बेचना शुरू कर दिया। इसके अलावा, शेयर बाजार और अन्य निवेशों में घाटे की वजह से बढ़ती मार्जिन कॉल्स (Margin Calls) को पूरा करने के लिए भी बड़े फंड्स ने सोने में भारी बिकवाली की, जिससे इसकी कीमतें तेजी से नीचे आ गईं।

इस भारी बिकवाली का नतीजा यह हुआ कि जनवरी के रिकॉर्ड हाई स्तर से लुढ़ककर 10 जून को सोना करीब 4,000 डॉलर के निचले स्तर तक पहुंच गया, जो इसके ऑल-टाइम हाई से लगभग 28% की भयंकर गिरावट थी। हालांकि, फिलहाल सोना अंतरराष्ट्रीय बाजार में थोड़ा संभलकर 4,144 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा है। राहत की बात बस इतनी है कि पिछले 12 महीनों के ट्रैक रिकॉर्ड को देखें, तो सोना अब भी करीब 23% ऊपर बना हुआ है।

होर्मुज जलडमरूमध्य का समझौता और बदलता बाजार

इस समय दुनिया भर के वित्तीय बाजारों की स्थिरता काफी हद तक अमेरिका और ईरान के बीच हुए एक बेहद महत्वपूर्ण शांति समझौते पर टिकी हुई है।

इस समझौते के तहत रणनीतिक रूप से बेहद खास माने जाने वाले ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को व्यापार के लिए दोबारा खोलने पर सहमति बनी है।

हालांकि, यह समझौता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितना लंबा टिक पाएगा, इसे लेकर रक्षा और आर्थिक विशेषज्ञों के मन में अब भी गहरी अनिश्चितता बनी हुई है, क्योंकि इजराइल इस शांति समझौते में सीधे तौर पर शामिल नहीं है। इस बड़े समझौते की घोषणा के तुरंत बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में करीब 15% की भारी गिरावट तो दर्ज की गई, लेकिन कच्चे तेल के सस्ता होने का कोई भी सीधा फायदा सोने की कीमतों को नहीं मिल पाया।

आखिर तेल सस्ता होने के बाद भी क्यों नहीं दौड़ रहा सोना?

यह एक ऐसा सवाल है जो इस वक्त हर छोटे-बड़े निवेशक के दिमाग में घूम रहा है। सामान्य आर्थिक नियमों के अनुसार, सोना मुख्य रूप से महंगाई, केंद्रीय बैंकों की ब्याज दरों और भू-राजनीतिक जोखिमों जैसे कई बड़े कारकों से प्रभावित होता है। लेकिन इस समय वैश्विक बाजार में सोने की चाल पर सबसे बड़ा और तगड़ा असर ब्याज दरों (Interest Rates) का पड़ रहा है।

अमेरिकी फेडरल रिजर्व और नए चेयरमैन बने सोने के दुश्मन

बीती 17 जून को हुई अमेरिकी फेडरल रिजर्व की एफओएमसी (FOMC) बैठक के बाद जो संकेत और बयान सामने आए हैं, उसने सोने की कमर तोड़ दी है।

बैठक से साफ पता चला है कि साल 2026 में कम से कम एक बार ब्याज दरें और बढ़ाई जा सकती हैं। इसके साथ ही, फेडरल रिजर्व के नए चेयरमैन केविन वार्श ने भी साफ कर दिया है कि वे बढ़ती महंगाई पर काबू पाने के लिए आगे भी बेहद सख्त मौद्रिक नीति और आक्रामक रुख अपनाने जा रहे हैं।

इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि निकट भविष्य में दुनिया को अमेरिकी ब्याज दरों में किसी भी तरह की कटौती की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, ऊंची ब्याज दरें आमतौर पर सोने और चांदी जैसी गैर-यील्ड यानी बिना ब्याज देने वाली संपत्तियों के लिए हमेशा नकारात्मक और नुकसानदेह मानी जाती हैं।

मजबूत होता डॉलर इंडेक्स भी बढ़ा रहा है दबाव

ब्याज दरों के अलावा अमेरिकी डॉलर की लगातार बढ़ती ताकत भी सोने की चमक को फीका कर रही है। साल 2026 में अब तक अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (US Dollar Index) करीब 2.6% मजबूत हो चुका है, जबकि इसके मुकाबले सोना 4% नीचे गिर गया है। वित्तीय बाजार का यह नियम है कि जब भी डॉलर मजबूत होता है, तो वैश्विक निवेशक अक्सर सोने की सुरक्षित होल्डिंग्स बेचकर डॉलर आधारित निवेशों की तरफ भागते हैं, क्योंकि वहां उन्हें ज्यादा आकर्षक रिटर्न दिखने लगता है।

क्या सोने में बंपर तेजी का दौर अब हमेशा के लिए खत्म हो गया?

इस यक्ष प्रश्न का सटीक जवाब फिलहाल दुनिया के किसी भी बड़े मार्केट गुरु के पास नहीं है। बाजार के एक गुट के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में वैश्विक महंगाई कम होती है और कच्चे तेल की कीमतें पूरी तरह नियंत्रण में आ जाती हैं, तो फेडरल रिजर्व को भविष्य में ब्याज दरों में कटौती करने पर मजबूर होना पड़ेगा, जिससे सोने को एक बार फिर से रॉकेट बनने का नया सहारा मिल जाएगा।

वहीं दूसरी ओर, कुछ अन्य जानकारों का कहना है कि अगर दुनिया में महंगाई लंबे समय तक इसी तरह ऊंची बनी रहती है, तो निवेशक एक बार फिर से शेयर बाजार की अनिश्चितता से बचने के लिए सोने को ‘सुरक्षित निवेश’ (Safe Haven) और महंगाई से बचाव के सबसे बेहतरीन साधन के रूप में अपनाएंगे, जिससे इसकी लोकप्रियता और कीमतें फिर से आसमान छू सकती हैं।