ड्रिप इरिगेशन लगवाएं या नहीं? छोटे और बड़े किसान, दोनों के लिए लागत और मुनाफे का पूरा हिसाब
पानी की कमी और बढ़ती लागत के दौर में ड्रिप इरिगेशन की चर्चा हर किसान सभा में होती है। ड्रिप यानी बूंद-बूंद सिंचाई, जिसमें पानी पाइप और ड्रिपर के जरिए सीधे पौधे की जड़ों तक पहुंचता है। सुनने में यह तरीका बेहतरीन लगता है, लेकिन लगवाने में शुरुआती खर्च आता है, इसलिए सवाल स्वाभाविक है कि यह खर्च वसूल होगा या नहीं। इसका जवाब हर खेत के लिए एक जैसा नहीं है, यह आपकी फसल, पानी के स्रोत और खेत के आकार पर निर्भर करता है।
फायदे की तरफ से देखें तो ड्रिप में पानी की बचत सबसे बड़ा मुद्दा है, क्योंकि पानी खेत में बहकर या उड़कर बर्बाद नहीं होता। इससे उसी पानी से ज्यादा क्षेत्र की सिंचाई संभव हो जाती है। साथ में बिजली या डीजल का खर्च भी घटता है, क्योंकि कम पानी चलाना पड़ता है। खरपतवार भी कम उगते हैं, क्योंकि पानी सिर्फ पौधे के आसपास मिलता है। कई किसान बताते हैं कि समान नमी मिलने से फसल की बढ़वार और उपज की गुणवत्ता सुधरती है, हालांकि इसका स्तर फसल और देखभाल पर निर्भर करता है।
लागत का हिसाब लगाते समय ये बातें जोड़ेंछोटे किसानों के लिए समझदारी यह है कि शुरुआत पूरे खेत से न करके एक हिस्से से करें, खासकर उस फसल से जिसमें ड्रिप का असर सबसे साफ दिखता है, जैसे सब्जियां, फलदार बाग या चौड़ी कतार वाली फसलें। अनुभव मिल जाए तो धीरे-धीरे क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है। बड़े किसानों के लिए ड्रिप मजदूरी की बचत और बड़े क्षेत्र में एक समान सिंचाई के कारण और भी उपयोगी साबित हो सकता है। धान और गेहूं जैसी घनी फसलों में ड्रिप का प्रचलित तरीका सीमित है, इसलिए ऐसी फसलों के लिए फैसला विशेषज्ञ से पूछकर ही लें।
सहायता और फैसला लेने से पहले की जांचकुल मिलाकर ड्रिप इरिगेशन उन्हीं किसानों के लिए सबसे फायदेमंद है जिनके यहां पानी की कमी है, फसल इसके अनुकूल है और जो सिस्टम की नियमित देखभाल कर सकते हैं। लगवाने से पहले दो-तीन जगह से दरें लें, अपने खेत का हिसाब खुद लगाएं और योजना संबंधी जानकारी की पुष्टि कृषि विभाग से जरूर करें। सही हिसाब से लिया गया फैसला ही ड्रिप को खर्च से कमाई का साधन बनाता है।