राजेश एक्सपोर्ट्स के 15 लाख करोड़ के भंवर में फंसा LIC का पैसा! क्या डूब जाएगी आम निवेशकों की गाढ़ी कमाई?
Rajesh Exports fraud case: भारतीय शेयर बाजार ने कई बड़े घोटाले देखे हैं, लेकिन जून 2026 में सामने आया राजेश एक्सपोर्ट्स (Rajesh Exports) का यह मामला बेहद अनोखा और हैरान करने वाला है। एक आम निवेशक के नजरिए से देखें तो यह बात आसानी से गले नहीं उतरती कि महज 3000 करोड़ रुपए के मार्केट कैप वाली कंपनी भला 15 लाख करोड़ रुपए का हेरफेर कैसे कर सकती है?
यह रकम इतनी बड़ी है कि यह भारत के कुल सालाना एक्सपोर्ट (निर्यात) के लगभग 20 फीसदी के बराबर बैठती है। आखिर कैसे हुआ यह सब? क्या यह बैंकों से नकदी लेकर भागने का मामला है? जी नहीं, यह बेहद शातिर दिमाग से रचा गया अकाउंटिंग फ्रॉड (कारोबार में हेराफेरी) का खेल है। आइए इसे बेहद आसान भाषा में समझते हैं।
सेबी (SEBI) का बड़ा एक्शन : प्रमोटर राजेश मेहता पर शिकंजाबाजार नियामक सेबी (SEBI) ने इस पूरे मामले पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। जून 2026 में जारी अपने अंतरिम आदेश में सेबी ने कंपनी के प्रमोटर और सीएमडी राजेश मेहता पर शेयर बाजार में ट्रेडिंग करने की पूरी तरह से रोक लगा दी है। इसके साथ ही, नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA) को निर्देश दिया गया है कि वह कंपनी के ऑडिटर (BSD & Co) के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे, जिन्होंने सालों तक इतने बड़े भ्रामक आंकड़ों पर आंखें मूंदकर हस्ताक्षर किए।
इस पूरे खेल का पर्दाफाश तब शुरू हुआ जब 11 मार्च, 2024 को सेबी के पास एक जागरूक शेयरधारक की शिकायत पहुंची।
- शक की वजह : शिकायत में कंपनी की 'ट्रेड रिसीवेबल्स' (व्यापार प्राप्तियों) पर सवाल उठाए गए थे, जो कथित तौर पर दो साल से भी अधिक समय से बकाया थीं।
- लंबी अवधि की लेनदारियां : आमतौर पर अकाउंटिंग की भाषा में इतने लंबे समय तक बकाया रकम इस बात का संकेत होती है कि या तो भुगतान मिलने में कोई गंभीर समस्या है या फिर बही-खातों में जानबूझकर हेराफेरी की जा रही है।
इस शिकायत के बाद सेबी तुरंत एक्शन में आया। अक्टूबर 2024 में एक जांच प्राधिकरण नियुक्त किया गया और कंपनी के खातों की फोरेंसिक जांच के लिए बीडीओ (BDO India) को जिम्मेदारी सौंपी गई। यह हाल के वर्षों में भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की सबसे बड़ी जांचों में से एक बन गई।
सेबी की जांच में जो बातें सामने आईं, वे आंखें खोलने वाली थीं। वित्त वर्ष 2021 से वित्त वर्ष 2025 के बीच, राजेश एक्सपोर्ट्स ने अपनी कुल कंसोलिडेटेड बिक्री (Consolidated Revenue) का 97% से 99% हिस्सा विदेशी सहायक कंपनियों (Subsidiaries) से आना दिखाया।
रीढ़ की हड्डी पर ही वार : इस समूह की सबसे महत्वपूर्ण सहायक कंपनी स्विट्जरलैंड स्थित गोल्ड रिफाइनरी यूनिट 'वालकैम्बी एसए' (Valcambi SA) है, जिसे राजेश एक्सपोर्ट्स ने सालों पहले खरीदा था। इसे ही कंपनी के अंतरराष्ट्रीय कारोबार का मुख्य आधार माना जाता था।
जब फोरेंसिक ऑडिटर्स ने वैलकैम्बी और अन्य विदेशी कंपनियों के रिकॉर्ड्स खंगाले, तो एक चौंकाने वाला अंतर (Mismatch) सामने आया। सेबी के मुताबिक, कंपनी ने अपनी वित्तीय रिपोर्टों में जो रेवेन्यू (राजस्व) दिखाया था, वह सहायक कंपनियों के वास्तविक रिकॉर्ड से मेल ही नहीं खा रहा था। पिछले 5 सालों के आंकड़ों को मिलाने पर यह अंतर कुल 15.15 लाख करोड़ रुपए का निकला!
यह कोई एक झटके में गायब की गई नकदी (Cash) नहीं थी। असल में, कंपनी ने कागजों पर जो 15 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की संचयी बिक्री (Cumulative Sales) दिखाई थी, वह केवल हवा में थी—वास्तव में वह बिजनेस कभी हुआ ही नहीं था।
सोने (Gold) के कारोबार की एक खास विशेषता होती है। इसमें प्रॉफिट मार्जिन बहुत कम होता है (लगभग 0.5% से 1%), लेकिन इसका टर्नओवर (सालाना लेनदेन) बहुत भारी-भरकम होता है। इसी बात का फायदा उठाकर राजेश मेहता ने मुख्य रूप से तीन तरीके अपनाए:
1. विदेशी शेल और सहायक कंपनियों का मायाजाल
कंपनी ने सिंगापुर में REL Singapore और स्विट्जरलैंड में Valcambi जैसी सहायक कंपनियों का जाल बुना। दस्तावेजों में दिखाया गया कि सारा बंपर बिजनेस इन्हीं के जरिए हो रहा है। मजेदार बात यह है कि जब सेबी ने इन विदेशी कंपनियों के अकाउंटिंग सिस्टम, बिल और बैंक ट्रांजैक्शन की डिटेल्स मांगी, तो कंपनी ने डेटा देने में आनाकानी की और जांच में सहयोग नहीं किया।
2. सर्कुलर ट्रेडिंग (कागजी कारोबार)
सोने के क्षेत्र में 'सर्कुलर ट्रेडिंग' करना बेहद आसान माना जाता है। इसमें असल में कोई सोना कहीं नहीं जाता, बल्कि सोने की एक ही खेप या केवल बिल को अपनी ही 4-5 डमी (शेल) कंपनियों के बीच गोल-गोल घुमाकर टर्नओवर को कई गुना बढ़ा दिया जाता है। सेबी को पक्का अंदेशा है कि कंपनी का 99% रेवेन्यू इसी तरह कागजों पर बनाया गया था।
3. अफ्रीकी माइंस का रहस्यमयी निवेश
साल 2023 में कंपनी ने जोर-शोर से दावा किया था कि उन्होंने अफ्रीका में सोने की खदानों (Gold Mines) में 1,035 करोड़ रुपए का भारी निवेश किया है। लेकिन जब ऑडिटर्स ने खातों की जांच की, तो न तो पैरेंट कंपनी और न ही किसी सहायक कंपनी के रिकॉर्ड में इस निवेश का कोई वजूद मिला। यह पैसा भी पूरी तरह शक के दायरे में है।
कंपनी के पैसों से पर्सनल ट्रेडिंग और केनरा बैंक का संकट
जांच में यह भी सामने आया कि कंपनी के फंड का इस्तेमाल प्रमोटर राजेश मेहता से जुड़े निजी खातों में ट्रांसफर करने के लिए किया गया। इन पैसों का उपयोग व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडिंग (F&O) गतिविधियों के लिए हो रहा था। जांचकर्ताओं ने राजेश मेहता के निजी खातों में 7.4 करोड़ रुपए के संदिग्ध लेनदेन को पकड़ा, जिसका एक हिस्सा बाद में कंपनी को वापस किया गया।
दूसरी तरफ, कंपनी कर्ज के दलदल में भी फंसती जा रही है। लोन चुकाने में असमर्थ रहने के कारण केनरा बैंक ने कंपनी के 509 करोड़ रुपये के लोन को संकटग्रस्त परिसंपत्ति (Stressed Asset/NPA) घोषित कर दिया है। बैंक अब अपनी बकाया राशि वसूलने के लिए नीलामी प्रक्रिया के जरिए इसे बेचने की तैयारी कर रहा है।
LIC और आम निवेशकों पर क्या होगा असर?
इस महाघोटाले की आंच सिर्फ प्रमोटर्स तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के लाखों आम नागरिकों पर भी इसका अप्रत्यक्ष असर पड़ रहा है। देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की राजेश एक्सपोर्ट्स में 10.8% की बड़ी हिस्सेदारी (Stake) है।
जैसे ही यह खबर बाजार में फैली, राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में 5 फीसदी का लोअर सर्किट लग गया और कंपनी की मार्केट वैल्यू गिरकर 3,090 करोड़ रुपये रह गई। LIC जैसी संस्था का पैसा डूबने का सीधा मतलब है कि आम जनता के भरोसे को चोट पहुंचना।
क्यों किया गया यह सब? और कंपनी की सफाईसवाल उठता है कि आखिर प्रमोटर्स ने अपनी बैलेंस शीट को इतना बढ़ा-चढ़ाकर (हर साल 2.5 से 3 लाख करोड़ की सेल) क्यों दिखाया? इसका सीधा जवाब है—भरोसा जीतना। बैलेंस शीट जितनी बड़ी और आकर्षक होगी, शेयर बाजार में निवेशकों का आकर्षण उतना ही बढ़ेगा और केनरा बैंक या LIC जैसी बड़ी वित्तीय संस्थाओं से कर्ज व निवेश पाना उतना ही आसान हो जाएगा।
दूसरी ओर, राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। स्टॉक एक्सचेंज को दिए स्पष्टीकरण में कंपनी ने कहा- "सेबी द्वारा लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं। यह आदेश केवल अंतरिम (शुरुआती) है और सेबी अभी किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा है। हमारे द्वारा घोषित रेवेन्यू के आंकड़े शत-प्रतिशत सही हैं और टर्नओवर को कतई बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया गया है।"
अब गेंद सेबी और कानून के पाले में है। यह देखना दिलचस्प होगा कि फॉरेंसिक ऑडिट की अंतिम रिपोर्ट में इस 15 लाख करोड़ के कॉरपोरेट चक्रव्यूह के और कितने काले पन्ने सामने आते हैं। आम निवेशकों के लिए सबक साफ है— सिर्फ भारी-भरकम टर्नओवर देखकर किसी कंपनी पर आंख मूंदकर भरोसा न करें।