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सोशल मीडिया पर वायरल बेंगलुरु की घटना: 10 साल के लड़कों की हरकत ने खड़े किए परवरिश पर सवाल

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बेंगलुरु जैसे आधुनिक और भागदौड़ भरे शहर में जब हम सुबह की सैर या जॉगिंग के लिए निकलते हैं, तो हमारा मकसद मानसिक शांति और शारीरिक स्वास्थ्य होता है। लेकिन क्या हो जब एक सामान्य सी सुबह किसी महिला के लिए मानसिक प्रताड़ना का सबब बन जाए? हाल ही में बेंगलुरु की एक महिला ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी आपबीती साझा की है, जिसने न केवल शहर के निवासियों को बल्कि देश भर के लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
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घटना के अनुसार, जब यह महिला सुबह जॉगिंग कर रही थी, तब 10 साल की उम्र के आसपास के लड़कों के एक समूह ने कथित तौर पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया। यह सुनकर किसी को भी हैरानी हो सकती है कि इतनी कम उम्र के बच्चे इस तरह की हरकतें कैसे कर सकते हैं। महिला ने बताया कि उन लड़कों ने न केवल उनका रास्ता रोका बल्कि उन पर भद्दे कमेंट्स भी किए।

बचपन और बढ़ती आक्रामकता
यह घटना केवल एक महिला की सुरक्षा का सवाल नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के उस आइने की तरह है जिसमें बच्चों के व्यवहार में आ रही गिरावट साफ नजर आ रही है। 10 साल की उम्र वह होती है जब बच्चे दुनिया को समझना शुरू करते हैं। इस उम्र में उनके मन में दूसरों के प्रति सम्मान और सहानुभूति के बीज बोए जाने चाहिए। लेकिन अगर इस उम्र में बच्चे सड़कों पर महिलाओं को परेशान करने की हिम्मत जुटा रहे हैं, तो यह एक गंभीर चेतावनी है।

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डिजिटल एक्सपोजर और परवरिश की भूमिका
आज के समय में बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन और इंटरनेट की असीमित पहुंच है। बिना किसी निगरानी के सोशल मीडिया का इस्तेमाल और हिंसक या आपत्तिजनक सामग्री देखना उनके कोमल मन पर गहरा असर डालता है। अक्सर बच्चे वह सब कुछ दोहराने की कोशिश करते हैं जो वे इंटरनेट पर देखते हैं या अपने आसपास सुनते हैं। इस मामले में भी यह सवाल खड़ा होता है कि क्या उन बच्चों को अपने किए गए कार्यों की गंभीरता का अंदाजा था?


अभिभावकों के लिए यह समय आत्ममंथन का है। केवल अच्छी शिक्षा या सुख-सुविधाएं देना ही काफी नहीं है। बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाना और उन्हें यह समझाना कि दूसरों की निजता और सम्मान का क्या महत्व है, आज की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।

समाज की जिम्मेदारी
जब ऐसी घटनाएं सार्वजनिक स्थानों पर होती हैं, तो आसपास मौजूद लोगों की चुप्पी भी अपराधियों का हौसला बढ़ाती है। हालांकि इस मामले में महिला ने हिम्मत दिखाई और आवाज उठाई, लेकिन एक समाज के तौर पर हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम ऐसी हरकतों को "बच्चों की नादानी" कहकर नजरअंदाज न करें। आज की छोटी सी लापरवाही कल किसी बड़ी घटना की बुनियाद बन सकती है।

बेंगलुरु की इस घटना ने सुरक्षा और संस्कार के बीच की उस महीन लकीर की ओर इशारा किया है जो धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही है। प्रशासन के साथ-साथ नागरिक समाज को भी इस दिशा में सक्रिय होना होगा ताकि हमारी सड़कें हर किसी के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक बनी रहें।








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