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डिजिटल अरेस्ट का खौफ: दिल्ली के बुजुर्ग डॉक्टर दंपत्ति से 15 करोड़ की ठगी, 15 दिनों तक कैद रही जान

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राजधानी दिल्ली का पॉश इलाका ग्रेटर कैलाश अपनी शांति और संभ्रांत माहौल के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी इलाके के एक घर में पिछले 15 दिनों से जो कुछ चल रहा था, वह किसी भी हॉरर फिल्म की पटकथा से कम नहीं था। संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में दशकों तक सेवा देने के बाद, करीब 48 साल अमेरिका में बिताकर भारत लौटे एक बुजुर्ग डॉक्टर दंपत्ति को क्या पता था कि उनकी अपनी मातृभूमि में उनके साथ ऐसी धोखाधड़ी होगी जो उन्हें पूरी तरह झकझोर कर रख देगी।
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यह कहानी है डॉक्टर ओम तनेजा और उनकी पत्नी डॉक्टर इंदिरा तनेजा की, जिनसे साइबर अपराधियों ने 'डिजिटल अरेस्ट' के नाम पर लगभग 14.85 करोड़ रुपये ठग लिए। यह मामला न केवल दिल्ली बल्कि देश के सबसे बड़े साइबर फ्रॉड में से एक बनकर उभरा है।

कैसे शुरू हुआ यह खौफनाक खेल?

इस पूरे खेल की शुरुआत 24 दिसंबर को हुई। क्रिसमस और नए साल की तैयारियों के बीच डॉक्टर दंपत्ति को एक फोन कॉल आता है। फोन करने वाला व्यक्ति खुद को कानून प्रवर्तन अधिकारी बताता है। वह बेहद गंभीर लहजे में कहता है कि आपके आधार कार्ड का इस्तेमाल ड्रग तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग जैसी गैर कानूनी गतिविधियों में किया गया है।


बुजुर्ग दंपत्ति के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था। जालसाजों ने उनके डर का फायदा उठाया और उन्हें बताया कि उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा और मनी लॉन्ड्रिंग के तहत गंभीर मामले दर्ज किए गए हैं।

15 दिनों का मनोवैज्ञानिक टॉर्चर

जालसाजों ने केवल फोन कॉल पर ही बात नहीं छोड़ी। उन्होंने एक पूरा 'डिजिटल सेटअप' तैयार किया था। वीडियो कॉल के जरिए उन्हें दिखाया गया कि वे पुलिस स्टेशन या किसी सरकारी दफ्तर से बात कर रहे हैं। यहाँ तक कि उन्हें डराने के लिए एक फर्जी अदालत का दृश्य भी रचा गया, जहाँ एक शख्स ने खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बताकर उन पर दबाव बनाया।


अपराधियों ने बुजुर्गों को आदेश दिया कि वे किसी को भी इस बारे में न बताएं, वरना उन्हें तुरंत जेल भेज दिया जाएगा। इसे ही 'डिजिटल अरेस्ट' कहा जाता है, जहाँ अपराधी पीड़ित को वीडियो कॉल पर लगातार अपनी निगरानी में रखते हैं। डॉक्टर दंपत्ति को सोने, खाने और यहाँ तक कि वॉशरूम जाने के लिए भी अपराधियों से 'अनुमति' लेनी पड़ती थी।


किश्तों में लूटी गई जिंदगी भर की बचत

दहशत के इस माहौल में अपराधियों ने 'फंड वेरिफिकेशन' के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाया। उन्होंने झांसा दिया कि एक बार जाँच पूरी हो जाने के बाद सारा पैसा वापस कर दिया जाएगा। डर के मारे डॉक्टर दंपत्ति ने 15 दिनों के भीतर अलग-अलग बैंक खातों में कुल 14.85 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर दिए।

यह सिलसिला 9 जनवरी तक चलता रहा। जब जालसाजों को लगा कि अब और पैसा निकालना मुमकिन नहीं है, तो उन्होंने संपर्क तोड़ दिया। तब जाकर दंपत्ति को अहसास हुआ कि वे किसी जाँच का नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी साजिश का शिकार हुए हैं।

क्या होता है डिजिटल अरेस्ट और कैसे बचें?

डिजिटल अरेस्ट कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जहाँ पुलिस या कोई भी एजेंसी आपको वीडियो कॉल पर गिरफ्तार करके रखे या आपसे पैसे की माँग करे।

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इन बातों का रखें खास ख्याल:

कोई भी एजेंसी फोन पर गिरफ्तारी नहीं करती: पुलिस, सीबीआई या ईडी कभी भी वीडियो कॉल के जरिए किसी को 'अरेस्ट' नहीं करती और न ही घर पर कैद रहने का आदेश देती है।

गोपनीयता का दबाव: अगर कोई आपसे कहे कि यह मामला 'बेहद गोपनीय' है और आप अपने परिवार या बच्चों को भी न बताएं, तो समझ लीजिए कि यह ठगी की कोशिश है।

पैसे का लेन-देन: सरकारी एजेंसियाँ कभी भी 'वेरिफिकेशन' के नाम पर किसी निजी खाते में पैसे ट्रांसफर करने को नहीं कहती हैं।

घबराएं नहीं: अगर ऐसा कोई कॉल आए, तो तुरंत फोन काट दें और स्थानीय पुलिस या साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करें।

डॉक्टर तनेजा और उनकी पत्नी के साथ जो हुआ, वह समाज के लिए एक बड़ी चेतावनी है। साइबर अपराधी अब केवल अनपढ़ लोगों को ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षित और प्रतिष्ठित नागरिकों को भी अपना निशाना बना रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत हमारा 'डर' है। अगर हम जागरूक रहें और ऐसे कॉल्स पर भरोसा न करें, तो हम अपनी और अपने अपनों की मेहनत की कमाई को सुरक्षित रख सकते हैं।







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