रात को घर में घुसकर कपड़े उठाना दुष्कर्म का प्रयास नहीं': 26 साल पुराने मामले में झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

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भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में कई बार ऐसे अजीबोगरीब और जटिल मामले सामने आते हैं, जिन पर अदालत के फैसले आने में दशकों का लंबा वक्त लग जाता है। झारखंड हाईकोर्ट से एक ऐसा ही बहुचर्चित और हैरान करने वाला कानूनी फैसला सामने आया है, जिसने देश भर के वैधानिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। आज से ठीक 26 साल पहले यानी लगभग ढाई दशक पूर्व दर्ज किए गए एक आपराधिक मामले में फैसला सुनाते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस पुराने आदेश को पूरी तरह से पलट दिया है, जिसमें एक व्यक्ति को घर में घुसकर कपड़े उठाने की घटना को लेकर दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) का दोषी माना गया था।

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हाईकोर्ट ने अपनी पैनी कानूनी समीक्षा के बाद यह स्पष्ट किया है कि केवल रात के वक्त किसी के घर में घुसकर कपड़े उठा ले जाना या वहां इस तरह की हरकत करना भले ही कानूनन चोरी या अन्य किसी अपराध की श्रेणी में आता हो, लेकिन इसे सीधे तौर पर भारतीय दंड संहिता के तहत दुष्कर्म का प्रयास या बलात्कार की कोशिश करार नहीं दिया जा सकता। इस महत्वपूर्ण फैसले के आने के बाद से समाज के विभिन्न वर्गों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच इस बात पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर इतने लंबे समय तक चली इस कानूनी लड़ाई के क्या सामाजिक और विधिक परिणाम सामने आए हैं।

26 साल पुराना वह खौफनाक मामला और निचली अदालत का शुरुआती कड़ा फैसला

यह पूरा कानूनी प्रकरण आज से लगभग 26 साल पहले का है, जब झारखंड के एक स्थानीय इलाके में एक घर के भीतर घुसपैठ और एक महिला से जुड़ी अपमानजनक घटना सामने आई थी। उस समय की स्थानीय पुलिस ने पीड़िता की शिकायत के आधार पर तुरंत मामला दर्ज किया था और आरोपी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर धाराओं के तहत कानूनी शिकंजा कसा था। मामला जब निचली अदालत (Trial Court) में पहुंचा, तो वहां की अदालत ने अभियोजन पक्ष के गवाहों और परिस्थितियों के आधार पर आरोपी को दोषी करार देते हुए उसे जेल की सजा सुनाई थी।

निचली अदालत का यह मानना था कि रात के वक्त किसी महिला के घर में इस प्रकार से घुसना और उसके निजी सामान या कपड़ों के साथ छेड़छाड़ करना एक गंभीर अपराध है, जो सीधे तौर पर बलात्कार के प्रयास की मंशा को दर्शाता है। लेकिन भारतीय न्याय प्रणाली की खूबी यह है कि निचली अदालतों के फैसलों के खिलाफ उच्च अदालतों में अपील करने का अधिकार हर नागरिक को प्राप्त है, और इसी अधिकार के तहत यह मामला अपील के जरिए झारखंड हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंच गया था, जहां पिछले ढाई दशकों से इसकी कानूनी वैधता पर मंथन चल रहा था।

झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा मामले की गहराई से समीक्षा और कानूनी व्याख्या

जब इस पुराने मामले की सुनवाई झारखंड हाईकोर्ट के समक्ष आई, तो न्यायाधीशों ने इस घटना के हर एक पहलू, पुलिस डायरी, गवाहों के बयानों और उस समय की परिस्थितियों का बेहद बारीकी से विश्लेषण किया। अदालत ने यह देखा कि क्या अभियोजन पक्ष इस बात को पुख्ता सबूतों के साथ साबित कर पाया था कि आरोपी का इरादा वास्तव में दुष्कर्म करने का ही था, या फिर मामला किसी अन्य आपराधिक मंशा जैसे चोरी या घरेलू घुसपैठ से जुड़ा हुआ था। हाईकोर्ट ने कानून के स्थापित सिद्धांतों का हवाला देते हुए यह रेखांकित किया कि किसी भी गंभीर अपराध के आरोप को साबित करने के लिए ठोस और अकाट्य साक्ष्यों की आवश्यकता होती है, न कि केवल अनुमानों या संदेहास्पद परिस्थितियों के आधार पर किसी को दोषी ठहराया जा सकता है।
अदालत ने अपने फैसले में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि आपराधिक कानून के तहत हर गलत काम या अवैध हरकत को सीधे तौर पर सबसे गंभीर श्रेणी के अपराध के दायरे में नहीं घसीटा जा सकता, और कानून की अपनी एक तय सीमा तथा परिभाषा होती है जिसका पालन करना न्यायपालिका का कर्तव्य है।

'कपड़े उठाना चोरी या अतिक्रमण हो सकता है, लेकिन दुष्कर्म का प्रयास नहीं' - अदालत की दो टूक

झारखंड हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह उठाया कि रात के समय घर में प्रवेश करके किसी के कपड़े उठा लेना या वहां इस तरह की हरकत करना एक अनुचित कृत्य है, लेकिन इसके आधार पर आरोपी पर बलात्कार के प्रयास जैसी गंभीर धारा लागू करना कानूनी रूप से सही नहीं है।

अदालत ने कहा कि इस बात के कोई प्रत्यक्ष प्रमाण या चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं थे जो यह साबित कर सकें कि आरोपी ने पीड़िता के साथ शारीरिक बल का प्रयोग करने या दुष्कर्म की कोई कोशिश की थी। इस प्रकार के कृत्यों को आमतौर पर घर में अतिचार (House Trespass), चोरी के प्रयास या गोपनीयता भंग करने के मामलों के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि सीधे तौर पर यौन हिंसा के गंभीर प्रयास के रूप में। हाईकोर्ट के इस तर्क ने एक बार फिर से इस बात पर जोर दिया है कि न्याय प्रक्रिया में भावनाओं या समाज में फैले रोष के बजाय केवल और केवल ठोस साक्ष्यों और कानून की धाराओं को ही आधार बनाया जाना चाहिए, ताकि किसी के साथ भी अन्याय न हो।

ढाई दशकों तक चली इस लंबी कानूनी लड़ाई का सामाजिक और विधिक प्रभाव

यह फैसला इस बात का एक और बड़ा उदाहरण है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में कई बार मामलों के निस्तारण में कितना लंबा समय लग जाता है, जिससे मुकदमे से जुड़े दोनों पक्षों को दशकों तक मानसिक और सामाजिक संघर्ष का सामना करना पड़ता है। 26 साल का यह लंबा अरसा बीत जाने के बाद जब हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया, तो इससे यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या त्वरित न्याय समय की सबसे बड़ी जरूरत नहीं है। हालांकि, कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह फैसला भविष्य के अन्य मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है, जिससे अधीनस्थ अदालतों को यह मार्गदर्शन मिलेगा कि वे इस तरह के मामलों में गंभीर आरोप तय करने से पहले साक्ष्यों की गुणवत्ता की कितनी गहराई से जांच करें।

समाज और कानून के जानकारों के बीच इस बात पर भी सहमति बन रही है कि महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानूनों का दुरुपयोग न हो और साथ ही वास्तविक पीड़ितों को भी सही समय पर न्याय मिले, इसके बीच का संतुलन बनाए रखना न्यायपालिका के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है, और यह फैसला उसी दिशा में एक नया कानूनी अध्याय जोड़ता है।