बिहार की सियासत में विधान परिषद यानी एमएलसी चुनाव (Bihar MLC Elections) की सरगर्मी जैसे-जैसे तेज हो रही है, वैसे-वैसे राजनीतिक दलों के भीतर चल रही कलह और असंतोष खुलकर सामने आने लगे हैं. राज्य के राजनीतिक गलियारों में उस वक्त भूचाल आ गया जब एनडीए (NDA) गठबंधन के प्रमुख घटक दल और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) पार्टी में एक बहुत बड़ी टूट और बगावत की खबर सामने आई.
आगामी एमएलसी चुनावों की रणनीतिक तैयारियों और सीटों के बंटवारे के बीच आरएलएम के भीतर चल रहा अंतर्कलह अब सतह पर आ गया है, जहां पार्टी के तीन प्रमुख विधायकों और वरिष्ठ नेताओं ने बगावत का झंडा बुलंद करते हुए अपने तीखे तेवर दिखा दिए हैं. चुनाव के ठीक मुहाने पर हुए इस बड़े सियासी घटनाक्रम ने न केवल उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है, बल्कि नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) और पूरे एनडीए गठबंधन के चुनावी समीकरणों को भी बुरी तरह से उलझा कर रख दिया है.
सत्ता पक्ष के भीतर इस तरह की फूट का फायदा उठाने के लिए विपक्षी महागठबंधन (Mahagathbandhan) पूरी तरह से सक्रिय हो गया है और लगातार सरकार पर निशाना साधते हुए यह दावा कर रहा है कि एनडीए गठबंधन भीतर से पूरी तरह बिखर चुका है.
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी RLM में अचानक क्यों फूटा विधायकों का यह गुस्सा?
पिछले कुछ महीनों से उपेंद्र कुशवाहा लगातार एनडीए गठबंधन के भीतर अपनी पार्टी की राजनीतिक हिस्सेदारी, संगठन के विस्तार और सम्मानजनक सीटों की मांग को लेकर मुखर रहे हैं, लेकिन लगता है कि पार्टी के भीतर जमीनी स्तर पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था.
एमएलसी चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन, टिकट वितरण की प्रक्रिया और पार्टी संगठन में लगातार हो रही उपेक्षा को लेकर विधायकों के भीतर लंबे समय से सुलग रही नाराजगी अब अचानक एक बड़े विस्फोट के रूप में बाहर आ गई है. आरएलएम के इन तीनों असंतुष्ट विधायकों ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के एकाधिकार और कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए यह आरोप लगाया है कि पार्टी कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों की भावनाओं की लगातार अनदेखी की जा रही है, जिससे कार्यकर्ताओं में भारी निराशा व्याप्त है. इन बागी नेताओं ने पार्टी लाइन से हटकर अपने समर्थकों के साथ गुप्त और खुली बैठकें शुरू कर दी हैं, जिससे यह साफ संकेत मिल गया है कि वे आने वाले समय में कोई बड़ा और स्वतंत्र राजनीतिक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेंगे.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छोटे दलों के लिए इस तरह की बगावत उनके राजनीतिक भविष्य के लिए बहुत बड़ा झटका साबित होती है, और उपेंद्र कुशवाहा के सामने इस अंदरूनी कलह को संभालना किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है.
जेडीयू और एनडीए के लिए क्यों चिंता का सबब बनी है आरएलएम की यह अंदरूनी कलह?
बिहार की राजनीति में विधान परिषद के चुनाव पूरी तरह से संख्याबल और हर एक विधायक या जनप्रतिनिधि के अमूल्य वोट पर टिके होते हैं, ऐसे में मतदान से ठीक पहले सहयोगी दल के भीतर इस तरह की बगावत होना एनडीए के रणनीतिकारों के लिए गहरी सिरदर्द बन गया है.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बीजेपी नेतृत्व की यह हमेशा से कोशिश रही है कि चुनाव से पहले गठबंधन के सभी छोटे-बड़े दलों को एकजुट रखा जाए ताकि किसी भी प्रकार की क्रॉस-वोस्टिंग या अप्रत्याशित हार से बचा जा सके. लेकिन उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के इन तीन बागी विधायकों के बागी रुख ने सत्ता पक्ष की उस एकजुटता के दावे पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है. यदि समय रहते इन असंतुष्ट विधायकों को मनाया नहीं गया और डैमेज कंट्रोल नहीं किया गया, तो इसका सीधा और नकारात्मक असर मतदान के आंकड़ों पर पड़ेगा, जिसका सीधा लाभ विपक्ष उठाने की पूरी फिराक में है.
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार के इस सियासी रण में जरा सी भी चूक गठबंधन की पूरी रणनीति को धाराशायी कर सकती है, और इसीलिए एनडीए के शीर्ष नेता इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं ताकि समय रहते आग को बुझाया जा सके.
आगामी चुनावों से पहले उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक कौशल और नेतृत्व की कड़ी परीक्षा
बिहार के सबसे अनुभवी और चतुर राजनेताओं में शुमार किए जाने वाले उपेंद्र कुशवाहा के लिए यह राजनीतिक संकट एक बहुत बड़ी और कठिन चुनौती बनकर सामने आया है, जहां उन्हें एक तरफ अपनी पार्टी को टूटने से बचाना है तो वहीं दूसरी तरफ एनडीए गठबंधन के भीतर अपनी साख और राजनीतिक कद को भी मजबूत बनाए रखना है.
एमएलसी चुनाव की प्रक्रिया जैसे-जैसे अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे राज्य का तापमान लगातार हाई होता जा रहा है और सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कुशवाहा इस बगावत से कैसे पार पाते हैं. क्या वे अपने बागी विधायकों को मनाने में सफल हो पाएंगे या फिर यह टूट आने वाले समय में आरएलएम के राजनीतिक पतन की इबारत लिखेगी, यह तो आने वाले कुछ दिनों में होने वाले घटनाक्रम ही तय करेंगे. फिलहाल, इस पूरे प्रकरण ने यह साबित कर दिया है कि बिहार की राजनीति में कब कौन सा पासा पलट जाए और अपनों के तेवर कब बदल जाएं, इसका अंदाजा लगाना नामुमकिन होता है, और राजनेताओं के लिए चुनाव के वक्त अपने कुनबे को जोड़े रखना ही सबसे बड़ी और कठिन चुनौती होती है.