बिहार की राजनीति में अपनी धाक जमाने के बाद अब केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के राजनीतिक मैदान में भी उतरने का बड़ा ऐलान कर दिया है। आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए चिराग पासवान की पार्टी ने राज्य की सभी 403 विधानसभा सीटों पर अपनी संगठनात्मक तैयारी शुरू कर दी है।
हालांकि इसको लेकर अभी यह पूरी तरह साफ नहीं है कि एलजेपी (रामविलास) एनडीए गठबंधन के तहत ही चुनाव लड़ेगी या फिर अकेले दम पर सभी सीटों पर उतरेगी, लेकिन इस रणनीतिक हलचल ने उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों के मन में अब यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि यदि चिराग पासवान यूपी के रण में कूदते हैं, तो इससे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कितना फायदा पहुंचेगा या फिर सत्तारूढ़ दल की मुश्किलें बढ़ेंगी। पूर्वांचल से लेकर राज्य के अन्य हिस्सों तक युवाओं और दलित मतदाताओं को साधने के लिए पार्टी ने जो 'Gen-Z प्लान' तैयार किया है, वह उत्तर प्रदेश के पारंपरिक चुनावी समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।
'यूथ बोले तो' कार्यक्रम के जरिए यूपी के युवाओं और दलित वोटर्स पर चिराग की पैनी नजर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के लिए चिराग पासवान ने बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत काम करना शुरू कर दिया है। हाल ही में प्रयागराज समेत उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख जिलों में उनके 'यूथ बोले तो' जैसे मेगा कार्यक्रमों ने युवाओं के बीच भारी क्रेज पैदा किया है। जींस और टी-शर्ट पहनकर सीधे युवाओं से संवाद करने की उनकी शैली उन्हें पारंपरिक राजनेताओं से अलग खड़ा करती है। पार्टी की योजना चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में चिराग पासवान के कम से कम 20 बड़े कार्यक्रम और रैलियां आयोजित करने की है, ताकि संगठन की जमीन को मजबूत किया जा सके।
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में दलित और युवा मतदाता हमेशा से किंगमेकर की भूमिका निभाते आए हैं। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के राजनीतिक समीकरणों में आए बदलाव के बाद उपजे राजनीतिक शून्य में चिराग पासवान अपनी पार्टी के लिए एक नया विकल्प तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक और युवाओं की राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों को उठाकर वे सीधे तौर पर युवा पीढ़ी के दिलों में अपनी जगह बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
क्या चिराग पासवान के उतरने से बीजेपी को होगा फायदा या बढ़ेगी टेंशन?
सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह है कि यदि चिराग पासवान उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ते हैं, तो इससे एनडीए के मुख्य घटक दल यानी बीजेपी को क्या लाभ मिलेगा। हाल के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश के भीतर बीजेपी को गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोटों के मोर्चे पर कुछ नुकसान उठाना पड़ा था, जिसका फायदा विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन को मिला था। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चिराग पासवान की एनडीए के भीतर मौजूदगी या उनके जरिए दलित और युवा वर्ग को साधने की रणनीति एनडीए के समग्र वोट बैंक को मजबूत करने में मददगार साबित हो सकती है।
यदि एलजेपी (रामविलास) गठबंधन के तहत कुछ चुनिंदा सीटों पर चुनाव लड़ती है या पूर्वांचल के उन क्षेत्रों में प्रचार करती है जहां दलित और युवा मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, तो वह विपक्षी दलों के उस सामाजिक समीकरण में सेंध लगा सकती है जो हालिया चुनावों में बीजेपी के खिलाफ एकजुट हुआ था। हालांकि, यदि पार्टी पूरी तरह से अकेले चुनाव लड़ने का फैसला करती है, तो कुछ सीटों पर वोटों के बिखराव की स्थिति भी बन सकती है, जिसे लेकर राजनीतिक जानकारों के बीच अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं।
सीट शेयरिंग से पहले मोलभाव की स्थिति मजबूत करने की सुनियोजित रणनीति
राजनीति के जानकारों का यह भी मानना है कि चुनाव से काफी पहले सभी 403 सीटों पर तैयारी की बात कहना और लगातार बड़े कार्यक्रम आयोजित करना दरअसल सीट शेयरिंग के दौरान अपनी सौदेबाजी की क्षमता (Bargaining Power) को मजबूत करने का एक बेहतरीन राजनीतिक तरीका होता है। चिराग पासवान यह भली-भांति जानते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पार्टी के दायरे को बढ़ाने के लिए बिहार से बाहर निकलकर उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना कितना जरूरी है। भले ही अंतिम समय में गठबंधन के तहत सीटों के बंटवारे पर सहमति बने, लेकिन तब तक संगठन के स्तर पर काडर को तैयार रखना पार्टी के भविष्य के विस्तार के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगा।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में चिराग पासवान की यह एंट्री मुख्य दलों के समीकरणों को कितना प्रभावित करती है और जनता का कितना समर्थन उन्हें मिल पाता है।