IAS Savita Pradhan Success Story: 'मैं मरने जा रही थी। बेटे को सुलाया। आखिरी बार उसका माथा चूमा और फांसी लगाने के लिए स्टूल पर चढ़ गई। साड़ी को पंखें से लटकाकर गले में डाल लिया था...' IAS सविता प्रधानी की कहानी रोंगटे खड़ी कर देती है। ससुराल में नरक जैसी जिंदगी से बेहतर उन्होंने मरने सही समझा था। लेकिन उन दो-तीन सेकंड (जो उनकी जिंदगी के आखिरी सेकंड होने वाले थे।) में न सिर्फ उन्होंने खुद को संभाला, बल्कि खुद एक नई जिंदगी और राह तैयार की। आईएएस सविता प्रधान की
सक्सेस स्टोरी विपरीत हालातों से लड़कर आगे बढ़ना सिखाती है।
सविता प्रधान का जन्म मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव में हुआ था। आदिवासी परिवार में जन्मीं सविता का संघर्ष बचपन से ही शुरू हो गया था। छोटा गांव, पिछड़ा इलाका और सुविधाओं की कमी थी। परिवार के लोग धान की कटाई करना, महुआ बीनना, गोबर उठाना और बीड़ी के पत्ते तोड़ना जैसे काम करते थे। उन्होंने भी ये सभी काम किए। गांव के अधिकतर लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते थे। लेकिन माता-पिता ने बेटी को पढ़ाने का फैसला किया। 10वीं क्लास पास करने वाली वे अपने गांव में पहली लड़की थीं।

सविता प्रधान ने जोश टॉल्क में अपनी जर्नी के बारे में बताया है। उन्होंने स्कूल के दिनों को याद करते हुए बताया कि 10वीं के बाद पिता ने एक शासकीय स्कूल में दाखिला लेने की परमिशन दे दी थी। स्कूल गांव से करीब 7 किलोमीटर था। गांव से स्कूल वाले गांव आने-जाने के लिए एक ही बस चलती थी। वो भी कभी आती कभी नहीं आती थी। बस का किराया एक रुपये जाने का और एक रुपये आने का। सविता कहती हैं, 'उस वक्त हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि रोज-रोज 2 रुपये खर्च कर सकें। इसलिए कई बार पैदल चलकर स्कूल जाती थी। फिर मां ने उसी गांव में एक छोटी सी नौकरी कर ली, जिससे वहीं रहने लगे और पढ़ाई करना थोड़ा आसान हो गया।'
सविता बताती हैं कि वे पूरे गांव में 10वीं करने वाली पहली लड़की थीं। उसी खुशी और कॉन्फिडेंस में डॉक्टर बनने का सपना देखा था। क्योंकि आस-पास के कई बच्चे PMT की परीक्षा के लिए 11वीं बायोलॉजी ले रहे थे। ताकि डॉक्टर बन सकें। उन्होंने भी 11वीं क्लास में बायोलॉजी से पढ़ाई शुरू करी दी।
पढ़ाई अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि एक बहुत बड़े घर से रिश्ता आ गया और यही आगे चलकर उनकी लाइफ का सबसे दर्दनाक टर्निंग पॉइंट बन गया। सविता बताती हैं, 'उस वक्त पिताजी ने बिना कुछ सोचे-समझे मेरा रिश्ता पक्का कर दिया। क्योंकि आदिवासी परिवार के लिए इतने बड़े घर से रिश्ता आना छोटी बात नहीं थी। शादी के बाद डॉक्टर बनना आसान हो जाएगा, यही सोचते हुए उन्होंने यह फैसला लिया। लड़के की उम्र 10 साल होने के बाद भी रिश्ता पक्का हो गया। ससुराल से पढ़ाई पूरी करने का आश्वासन मिलने के बाद सगाई हो गई। लेकिन बहुत जल्द ही वादा झूठा निकला। (माता-पिता और भाई के साथ सविता प्रधान की पुरानी तस्वीर)

महज 16 साल की उम्र में सविता प्रधान की शादी हो गई थी। उनकी शादीशुदा जिंदगी बहुत तकलीफदेह हो गई। पति का सभी के सामने धमकाना, पीटना और बेइज्जती करना आम होने लगा था। ससुरार में ठीक से खाना खाना भी मुश्किल हो गया था। घर की सफाई करने के बाद खाना बनाने के लिए कहा जाता था। नौकरों की तरह ट्रीट किया गया। वो कहती हैं, 'मैं कई बार अपने अंडरगारमेंट्स में रोटी छिपाकर बाथरूम जाती थी और वहां सिर्फ रोटी से पेट भरती थी। उस समय भी मुझे अहसास नहीं हो रहा था कि आखिर मेरे साथ हो क्या रहा है।' वे बताती हैं, 'शोषण बढ़ता ही गया। मुझे छोटी-छोटी बातों पर पीटा जाता था। दिन-रात, मैं शारीरिक हिंसा का शिकार होती थी।' जब एक दिन पिता मिलने आए, तो उन्होंने घर ले जाने की विनती की। उन्होंने शाम तक वापस आने और उसे घर ले जाने का वादा किया। लेकिन वे वापस नहीं आए। उस दिन, समझ आ गया कि इस नरक से मुझे बचाने कोई नहीं आएगा।

इस समय तक वह दो बच्चों की मां बन चुकी थीं, फिर भी उनकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ था। वे बताती हैं कि मेरा माथा फटा हुआ है, हाथ पर कट के निशान हैं, पीठ जली हुई है। रोज-रोज के अत्याचार अब सहन करना मुश्किल हो गया था। पता था कि खुद की जान लेना गलत है लेकिन इसके अलावा कोई और रास्ता नजर नहीं आ रहा था।' एक दिन उन्होंने अपनी जान देने का फैसला किया। उन्होंने बताया, 'मैंने अपने बेटे को सुला दिया। दूसरे बेटे को फीड कराया। माथा चूमा जैसे कि आखिरी बार सुला रही हूं। एक स्टूल खींचा और पंखें पर साड़ी लटका दी। मैं फांसी लगाने ही वाली थी कि खिड़की से मेरी सास का चेहरा दिखाई दिया। उन्होंने मुझे देखा, लेकिन उन्होंने रोका नहीं, उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। वे वहां से ऐसे चली गईं जैसे उन्होंने कुछ देखा ही नहीं या उनके लिए कोई मायने नहीं रखता।' यह उनके लिए एक निर्णायक पद था। उन्होंने कहा, 'तब मुझे एहसास हुआ कि मैं ऐसे लोगों के लिए अपनी जान नहीं दे सकती।' हिम्मत जुटाकर वे ससुराल से भाग निकलीं।

ससुराल से भागने के बाद सविता अपनी चचेरी बहन की भाभी के घर में रहने लगी थीं। पार्लर में काम किया, ट्यूशन पढ़ाया और संघर्ष करते-करते आगे की पढ़ाई की। लेकिन अभी सब खत्म नहीं हुआ था। अलग होने के बाद भी पति कभी-कभी आता था और मारपीट करता था। उन्होंने बताया, 'वह बच्चों के सामने मुझे पीटता था। एक दिन एक बाल्टी में पेशाब किया और मुझ पर फेंक दिया। उस समय मैं एग्जाम देने जा रही थी। मैं फिर से नहाई, कपड़े बदले और अपना पेपर देने चली गई। मेरा दिल वाकई में कठोर हो गया था।'

सविता का लक्ष्य अच्छी सरकारी नौकरी पाने का था। उन्होंने अकेले बच्चों की परवरिश करते हुए सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी की और बहुत जल्द उनकी मेहनत रंग लाई। कई सालों के संघर्ष और परेशानियों से जूझते हुए सविता ने अपने पहले ही प्रयास में मध्य प्रदेश राज्य सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली। वे एक सरकारी अधिकारी बन गईं। एक आदिवासी छात्रा के तौर पर अपनी इस उपलब्धि के लिए, सरकार ने उन्हें 75,000 रुपये की छात्रवृत्ति भी दी। इसके बाद उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2017 का फॉर्म भरा। पहले ही अटेंप्ट में प्रीलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू कर लिया था। आज, सविता प्रधान एक IAS अधिकारी हैं। वे अपने पद का इस्तेमाल दूसरों की मदद करने के लिए करती हैं, खासकर गरीब समुदायों की महिलाओं और लड़कियों की। वे उनके शिक्षा के अधिकार और एक निडर जीवन के लिए संघर्ष करती हैं। (All Photos Credit- insta/savitapradham)