'₹1.32 करोड़ सैलरी होने पर मिले H-1B वीजा', अमेरिका में नया बिल पेश, ट्रंप की पार्टी के सांसद ने बढ़ाई परेशानी

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H-1B Visa News: अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि वह H-1B वीजा प्रोग्राम खत्म करना चाहते हैं। इस बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं ने एक नया कानून लाने का प्रस्ताव रखा है। इसका मकसद H-1B वीजा होल्डर्स की सैलरी की न्यूनतम लिमिट को बढ़ाना है, ताकि अमेरिकी कंपनियों के पास विदेशी कर्मचारियों को कम सैलरी पर काम पर रखने की कोई गुंजाइश न बचे। रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं की इस मांग ने वर्कर्स की टेंशन बढ़ा दी है।
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कांग्रेस सदस्य ग्लेन ग्रोथमैन (R-WI) ने 'प्रोटेक्टिंग अमेरिकन वर्कर्स थ्रू H-1B मॉडर्नाइजेशन एक्ट' पेश किया है। यह कानून एक पुरानी खामी को दूर करेगा, जिसका फायदा उठाकर H-1B वीजा पर निर्भर कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों को मिलने वाले कुछ सुरक्षा उपायों को दरकिनार कर देती थीं। सीनेटर जॉन हस्टेड (R-OH) ने सीनेट में इसी तरह का एक और कानून पेश किया है। इन बिल के पास होने के बाद H-1B वीजा के लिए 1,40,000 डॉलर (1.32 करोड़ रुपये) की सैलरी जरूरी हो जाएगी।

कंपनी सस्ते वर्कर्स को काम पर रखने की इच्छुक: ग्लेन ग्रोथमैन

जॉन हस्टेड ने कहा, 'कई दशकों से, कंपनियां अमेरिकी वर्कर्स को काम पर रखने से बचती रही हैं। इसकी वजह एक ऐसी वेतन स्तर है, जिसमें 1998 के बाद से कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसे आधुनिकीकरण नहीं, बल्कि एक खामी कहा जाएगा। यह बिल बस इतना कहता है कि अगर कोई कंपनी इन वीजा पर बहुत ज्यादा निर्भर है और और ज्यादा H-1B वर्कर्स को लाना चाहती है, तो उसे एक पुराने पड़ चुके कानून का सहारा लेकर योग्य अमेरिकी वर्कर्स को ये नौकरियां देने से नहीं बचना चाहिए।'

वर्तमान में H-1B वेतन स्तर क्या है?मौजूदा कानून के तहत, ऐसे कंपनियां जो H-1B वर्कर्स पर ज्यादा निर्भर हैं, यानी वे कंपनियां जहां टोटल वर्कर्स में H-1B वीजा होल्डर्स का हिस्सा एक निश्चित लिमिट से ज्यादा है। उन्हें अतिरिक्त H-1B वीजा के लिए स्पॉन्सरशिप देने से पहले ये साबित करना होगा कि उन्होंने अमेरिकी वर्कर्स को काम पर रखने की कोशिश की है। हालांकि, अगर कंपनी H-1B कर्मचारी को कम से कम 60,000 डॉलर सालाना सैलरी देती है या अगर वर्कर के पास मास्टर डिग्री या उससे उच्च स्तर की डिग्री है, तो उन्हें इस शर्त से छूट मिलती है।

ये 60,000 डॉलर की सीमा 1998 में तय की गई थी। उस समय इसका मकसद इसे 'सोशल सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन' (SSA) के 'नेशनल एवरेज वेज इंडेक्स' से दोगुना रखना था। इसमें कभी भी महंगाई के हिसाब से कोई बदलाव नहीं किया गया है। रिपब्लिकन नेताओं का कहना है कि आज SSA का 'नेशनल एवरेज वेज इंडेक्स' लगभग 70,000 डॉलर है। इसका मतलब ये है कि अगर मूल सीमा को महंगाई के हिसाब से बदलाव किया जाए, तो सैलरी लगभग 1,40,000 डॉलर होनी चाहिए।