किस हीरे को 'माउंटेन ऑफ लाइट' के नाम से जाना जाता है?

हीरा कार्बन का एक शुद्ध और क्रिस्टलीकृत रूप है जो पृथ्वी की सतह से 90 से 120 मील नीचे अत्यधिक दबाव और गर्मी में बनता है। 'डायमंड' शब्द ग्रीक शब्द 'अदामास' (Adamas) से आया है, जिसका अर्थ है 'अजेय'। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा रत्न है जो केवल एक तत्व यानी कार्बन से बना होता है।
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हीरों को अक्सर 'आइस' या 'स्पार्कलर्स' जैसे उपनामों से पुकारा जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि किस हीरे को 'माउंटेन ऑफ लाइट' यानी 'रोशनी का पर्वत' कहा जाता है? आइए, इस अद्वितीय रत्न के बारे में विस्तार से जानते हैं।

कोहिनूर: रोशनी का पर्वत

दुनिया के तमाम हीरों में से कोहिनूर को 'माउंटेन ऑफ लाइट' के नाम से जाना जाता है। यह एक फारसी नाम है। इस हीरे का नामकरण एक दिलचस्प घटना से जुड़ा है। 1739 में जब फारस के शासक नादिर शाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया और मुगल खजाने को लूटा, तब उसकी नजर इस विशाल हीरे पर पड़ी। उसे देखते ही नादिर शाह के मुंह से निकला "कोह-इ-नूर", जिसका अर्थ था 'रोशनी का पर्वत'। तभी से इस हीरे को इसी नाम से पहचाना जाने लगा।


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कोहिनूर हीरे का ऐतिहासिक सफरनामा

  • 1500 से पहले (प्राचीन उत्पत्ति): माना जाता है कि यह हीरा प्राचीन भारत में वर्तमान आंध्र प्रदेश की खदानों से निकला था। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में इसे 'समंतिका मणि' के रूप में संदर्भित किया गया है।
  • 1526–1739 (मुगल काल): इसका पहला प्रमाणित रिकॉर्ड 'बाबरनामा' में मिलता है। पानीपत के पहले युद्ध के बाद यह बाबर के पास आया और फिर शाहजहाँ और औरंगजेब जैसे मुगल सम्राटों के पास रहा।
  • 1739–1813 (फारसी और अफगान शासन): नादिर शाह इसे लूटकर फारस ले गया। उसकी मृत्यु के बाद यह अफगान दुर्रानी साम्राज्य के पास चला गया।
  • 1813–1849 (सिख साम्राज्य): शाह शुजा दुर्रानी ने राजनीतिक शरण के बदले इसे महाराजा रणजीत सिंह को सौंप दिया।
  • 1849 से अब तक (ब्रिटिश अधिकार): दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध के बाद लाहौर की संधि के तहत इसे ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया गया। इंग्लैंड ले जाने के बाद इसे फिर से तराशा गया और वर्तमान में यह लंदन के टॉवर में सुरक्षित है।


कोहिनूर के बारे में कुछ रोचक तथ्य

मूल नाम और पौराणिक कथाएँ

पुराने संस्कृत साहित्य में इसे 4000 से 5000 साल पहले 'समंतिका मणि' कहा जाता था। इसके साथ कई पौराणिक कथाएँ और रहस्य जुड़े हुए हैं।


टाइप IIA हीरा

कोहिनूर एक 'टाइप IIA' हीरा है। इसका मतलब है कि यह पूरी तरह से अशुद्धियों से मुक्त है और उच्चतम गुणवत्ता वाला है। ऐसे हीरे प्राकृतिक रूप से मिलना बहुत दुर्लभ होता है।

आकार और वजन

मूल रूप से कोहिनूर का वजन 793 कैरेट था। समय के साथ इसे कई बार तराशा और छोटा किया गया। जब यह ब्रिटेन पहुँचा तब इसका वजन 190.3 कैरेट था। अंतिम कटाई के बाद अब यह लगभग 105.6 कैरेट का रह गया है।

रंग और स्पष्टता

कोहिनूर 'D-कलर' का हीरा है। इसमें किसी भी रंग की कोई छाया नहीं है और यह पूरी तरह से पारदर्शी और सफेद है। इसमें नाइट्रोजन की अशुद्धि न होने के कारण यह पीलापन नहीं दिखाता।

क्या लैब में बने हीरे कोहिनूर की बराबरी कर सकते हैं?

आजकल प्रयोगशाला में तैयार (Lab-grown) हीरे HPHT और CVD जैसी वैज्ञानिक तकनीकों से बनाए जाते हैं। ये हीरे कोहिनूर जैसी ही शुद्धता और स्पष्टता के साथ बनाए जा सकते हैं। विज्ञान की मदद से अब कोहिनूर से भी बड़े और पसंदीदा रंगों वाले हीरे बनाना संभव हो गया है।


कोहिनूर अपनी अनूठी विशेषताओं और संरचना के कारण आज भी दुनिया का सबसे खास हीरा माना जाता है। भले ही तकनीक ने बड़े हीरे बनाना आसान कर दिया हो, लेकिन कोहिनूर का ऐतिहासिक मूल्य और इसकी 'माउंटेन ऑफ लाइट' वाली पहचान हमेशा अद्वितीय रहेगी।