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बाजीराव से छावा तक: जब बॉलीवुड के सितारों ने इतिहास को पर्दे पर जिंदा कर दिया

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भारतीय सिनेमा में ऐतिहासिक किरदार निभाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। ये सिर्फ अभिनय नहीं होता, बल्कि उस दौर को जीने जैसा अनुभव होता है। जब कोई अभिनेता किसी ऐतिहासिक शख्सियत को पर्दे पर उतारता है, तो दर्शकों की उम्मीदें भी उतनी ही बढ़ जाती हैं। यही वजह है कि कुछ किरदार समय के साथ सिर्फ फिल्म का हिस्सा नहीं रहते, बल्कि यादगार बन जाते हैं।
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ऐसा ही कुछ देखने को मिला जब Ranveer Singh ने फिल्म Bajirao Mastani में पेशवा बाजीराव का किरदार निभाया। उनकी ऊर्जा, संवाद अदायगी और बॉडी लैंग्वेज ने इस किरदार को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया। इस फिल्म में उनकी मौजूदगी इतनी प्रभावशाली थी कि आज भी लोग उस परफॉर्मेंस को याद करते हैं।

दूसरी तरफ, हाल के समय में Vicky Kaushal ने फिल्म Chhaava में छत्रपति संभाजी महाराज का किरदार निभाकर लोगों का ध्यान खींचा। यह फिल्म मराठा इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को सामने लाती है और विक्की कौशल ने इस भूमिका में पूरी मेहनत झोंक दी।

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लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जैसे ही छावा का ट्रेलर सामने आया, दर्शकों ने दोनों अभिनेताओं की तुलना शुरू कर दी। कई लोगों का मानना है कि ऐतिहासिक किरदारों में संवाद और उच्चारण की बारीकियां बहुत मायने रखती हैं, और इसी मामले में रणवीर सिंह ने एक ऊंचा मानदंड स्थापित किया है।


यह तुलना सिर्फ अभिनय की नहीं है, बल्कि उस गहराई की भी है जो एक अभिनेता अपने किरदार में लेकर आता है। रणवीर सिंह ने बाजीराव के किरदार में जिस तरह की आक्रामकता और संवेदनशीलता का संतुलन दिखाया, वह दर्शकों के दिल में बस गया। वहीं विक्की कौशल ने संभाजी महाराज के संघर्ष और साहस को पूरी ईमानदारी से पर्दे पर उतारने की कोशिश की।


ऐतिहासिक फिल्मों की खास बात यह होती है कि उनमें सिर्फ कहानी नहीं होती, बल्कि एक पूरा दौर, संस्कृति और भावना जुड़ी होती है। ऐसे में कलाकार का हर हावभाव, हर संवाद और हर नजर बहुत मायने रखती है। यही वजह है कि जब भी कोई नया अभिनेता इस तरह के किरदार में नजर आता है, तो उसकी तुलना पहले के यादगार किरदारों से होना लगभग तय होता है।

अगर गौर करें तो दोनों ही अभिनेताओं की अपनी अलग ताकत है। रणवीर सिंह जहां अपने किरदार में पूरी तरह घुल जाने के लिए जाने जाते हैं, वहीं विक्की कौशल अपनी सादगी और गहराई से दर्शकों को जोड़ते हैं। यही विविधता भारतीय सिनेमा को और भी खास बनाती है।

अंत में यह कहना गलत नहीं होगा कि चाहे बाजीराव हो या संभाजी महाराज, इन किरदारों ने हमें सिर्फ इतिहास नहीं दिखाया, बल्कि उन भावनाओं से भी जोड़ा जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। और शायद यही वजह है कि ऐसे किरदार हमेशा याद रखे जाते हैं।




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