West Bengal Elections 2026: क्या 5 ‘M’ तय करेंगे सत्ता का भविष्य? दीदी का गढ़ या मोदी का करिश्मा, किसकी होगी जीत?
बंगाल की राजनीति के बारे में एक मशहूर कहावत है कि यहाँ की जनता की नब्ज पकड़ना बड़े-बड़े दिग्गजों के बस की बात नहीं है। राज्य के पहले चरण में हुई ऐतिहासिक वोटिंग ने बड़े-बड़े दिग्गज को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। चुनाव प्रचार के दौरान झालमुड़ी से लेकर मछली तक के मुद्दों पर जमकर वार-पलटवार हुए हैं। लेकिन इस बार का चुनावी रण सिर्फ जुबानी जंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘5 M’ फैक्टर्स के इर्द-गिर्द सिमट गया है। ये पांच 'M' हैं- महिला, माइनॉरिटी (अल्पसंख्यक), मशीनरी, मसल (बाहुबल) और मनी, और सबसे बड़ा मुकाबला ममता बनाम मोदी। आइए जानते हैं कि ये कारक कैसे चुनाव का रुख बदल सकते हैं।
बंगाल में महिलाएं सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि एक निर्णायक शक्ति हैं। ममता बनर्जी की कल्याणकारी योजनाओं ने हमेशा महिलाओं को टीएमसी की ओर आकर्षित किया है। लेकिन इस बार भाजपा ने भी अपनी रणनीति बदल दी है। भाजपा ने महिलाओं को 3000 रुपये मासिक सहायता, गर्भवती महिलाओं को 21,000 रुपये की मदद और सरकारी नौकरियों में 33% आरक्षण जैसे लुभावने वादे किए हैं। साथ ही, संदेशखाली जैसी घटनाओं को मुद्दा बनाकर भाजपा महिला सुरक्षा के सवाल पर सरकार को घेर रही है।
राज्य में अल्पसंख्यक वोट बैंक पारंपरिक रूप से टीएमसी का अभेद्य किला रहा है। ममता बनर्जी को उम्मीद है कि यह वोट बैंक एकजुट होकर उनके पक्ष में रहेगा। हालांकि, वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन जैसे तकनीकी मुद्दों ने कुछ हद तक भ्रम पैदा किया है। अगर अल्पसंख्यक वोटों में जरा भी बिखराव होता है, तो चुनावी समीकरण पूरी तरह पलट सकते हैं।
1. महिला मतदाता: सत्ता की असली चाबी
बंगाल में महिलाएं सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि एक निर्णायक शक्ति हैं। ममता बनर्जी की कल्याणकारी योजनाओं ने हमेशा महिलाओं को टीएमसी की ओर आकर्षित किया है। लेकिन इस बार भाजपा ने भी अपनी रणनीति बदल दी है। भाजपा ने महिलाओं को 3000 रुपये मासिक सहायता, गर्भवती महिलाओं को 21,000 रुपये की मदद और सरकारी नौकरियों में 33% आरक्षण जैसे लुभावने वादे किए हैं। साथ ही, संदेशखाली जैसी घटनाओं को मुद्दा बनाकर भाजपा महिला सुरक्षा के सवाल पर सरकार को घेर रही है।
2. माइनॉरिटी (अल्पसंख्यक): वफादारी की परीक्षा
राज्य में अल्पसंख्यक वोट बैंक पारंपरिक रूप से टीएमसी का अभेद्य किला रहा है। ममता बनर्जी को उम्मीद है कि यह वोट बैंक एकजुट होकर उनके पक्ष में रहेगा। हालांकि, वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन जैसे तकनीकी मुद्दों ने कुछ हद तक भ्रम पैदा किया है। अगर अल्पसंख्यक वोटों में जरा भी बिखराव होता है, तो चुनावी समीकरण पूरी तरह पलट सकते हैं।
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